Tuesday, 6 October 2015

।। चैबीस तीर्थंकर एवं विद्यमान बीस तीर्थंकर ।। प्रश्न 1 - तीर्थंकर किसे कहते हैं? उत्तर - जो धर्म रूपी तीर्थं के कर्ता हैं धर्म रूपी तीर्थ का प्रर्वतन करते हैं वे तीर्थंकर कहलाते हैं। प्रश्न 2 - क्या तीर्थंकर धर्म के संस्थापक होते हैं? उत्तर - कोई भी तीर्थंकर धर्म के संस्थापक नहीं होते हैं अपितु उपदेशक होते हैं। प्रश्न 3 - तीर्थंकर कैसे बनते हैं? उत्तर - केवली एवं श्रुत केवली के पादमूल में मनुष्य सोलह कारण भावनाओं का चिंतवन करके तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लेते हैं वह कर्म उदय में आ जाने से तीर्थंकर बन जाते हैं। प्रश्न 4 - भावना किसे कहते हैं? उत्तर - बार-बार एक प्रकार का चिंतन करने को भावना कहते हैं। प्रश्न 5 - दर्शन विश्ुाद्धि भावना की क्या विशेषता है? उत्तर - उपरोक्त सोलह भावनाओं में दर्शन विशुद्धि भावना का होना अत्यंत आवश्यक है उसके साथ एक, दो या कितनी ही भावना हों या सभी हों तो तीर्थंकर प्रकृति का बंध हो सकता है। यदि दर्शन विशुद्धि भावना नहीं है तो तीर्थंकर प्रकृति का बंध नहीं होगा। प्रश्न 6 - दर्शन विशुद्धि भावना किसे कहते हैं? उत्तर - पच्चीस मल दोषों से रहित विशुद्ध सम्यग्दर्शन का पालन करना दर्शन विशुद्धि भावना है। प्रश्न 7 - विनयसम्पन्नता किसे कहते हैं? उत्तर - देवशास्त्र गुरू रत्नत्रय तथा इनके धारण करने वालों का आगम के अनुसार विनय करना। प्रश्न 8 - शीलव्रतों में अनतिचार भावना क्या है? उत्तर - व्रतों एवं शीलों में अतिचार नहीं लगाना। प्रश्न 9 - अभीक्षण ज्ञानोपयोग भावना क्या है? उत्तर - सदा ज्ञान के अभ्यास में लगे रहना अभीक्षण ज्ञानोपयोग भावना है। jain temple144 प्रश्न 10 - संवेगभावना क्या है? उत्तर - पापों तथा पाप के फल से डरना तथा धर्म एवं धर्म के फल में अनुराग होना संवेग है। प्रश्न 11 - शक्ति, तप भावना को बताइये। उत्तर - अपनी शक्ति के अनुसार शक्ति को न छिपा कर तप करना। प्रश्न 12 - शक्ति त्याग भावना को बताइये। उत्तर - अपनी शक्ति के अनुसार त्याग करना आहार दान आदि देना। प्रश्न 13 - साधु समाधि भावना क्या होती है? उत्तर - साधुओं का उपसर्ग आदि दूर करना या समाधि सहित मरण करना साधु समाधि भावना है। प्रश्न 14 - वैयावृत्यकरण भावना क्या है? उत्तर - वृती त्यागी आदि की सेवा वैयावृत्ति करना। प्रश्न 15 - अर्हंत भक्ति भावना क्या है? उत्तर - अर्हंत भगवान की भक्ति करना अर्हंत भक्ति है। प्रश्न 16 - आचार्य भक्ति किसे कहते हैं? उत्तर - आचार्य की भक्ति करना आचार्य भक्ति है। प्रश्न 17 - बहुश्रुत भक्ति किसे कहते हैं? उत्तर - उपाध्याय परमेष्ठी की भक्ति करने को बहुश्रुत भक्ति कहते हैं। प्रश्न 18 - प्रवचन भक्ति किसे कहते हैं? उत्तर - जिनवाणी की भक्ति करना प्रवचन भक्ति है। प्रश्न 19 - आवश्यकापरिहाणि भावना क्या है? उत्तर - छः आवश्यक क्रियाओं को सावधानी से पालना आवश्यकापरिहाणि है। प्रश्न 20 - मार्ग प्रभावना किसे कहते हैं? उत्तर - जैन धर्म के प्रभाव को लोक में प्रसारित करना। प्रश्न 21 - प्रवचन वत्सलत्व भावना क्या है? उत्तर - साधर्मीजनों में आगाध प्रेम करना। प्रश्न 22 - तीर्थंकर कितने प्रकार के होते हैं? उत्तर - तीर्थंकरों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- 1 भरत ऐरावत क्षेत्र में होने वाले तीर्थंकर, 2 विदेह क्षेत्र में होने वाले तीर्थंकर। प्रश्न 23 - भरत ऐरावत में होने वाले तथा विदेह क्षेत्रों में होने वाले तीर्थंकरों में क्या अंतर है? उत्तर - निम्न अंतर है- अ भरत ऐरावत क्षेत्र में होने वाले तीर्थंकरों के पूरे पांच कल्याणक होते हैं। विदेह क्षेत्र में होने वाले तीर्थंकरों के पांच, तीन और दो कल्याणक होते हैं। ब विदेह क्षेत्र में चतुर्थकाल विद्यमान रहने से यहां तीर्थंकरों का अभाव नहीं होता है। भरत, ऐरावत क्षेत्र में कर्मकाल में ही तीर्थंकर होते हैं। प्रश्न 24 - भगवान तीर्थंकर की माता सोलह स्वप्न क्यों देखती हैं? उत्तर - भगवान पूर्व भव में सोलह कारण भावनाओं को भा कर चिंतवन कर, तीर्थंकर प्रकृति का बंध करते हैं। प्रश्न 25 - सोलह स्वप्नों के नाम बताइये। उत्तर - 1 ऐरावत हाथी, 2 श्वेत उत्तम बैल, 3 सिंह, 4 माला युगल, 5 लक्ष्मी, 6 चन्द्रमा, 7 सूर्य, 8 कलश युगल 9 मीन युगल, 10 सरोवर, 11 समुद्र 12 सिंहासन 13 देवों का विमान, 14 नागेन्द्र 15 रत्न राशि एवं 16 धूम रहित अग्नि। प्रश्न 26 - तीर्थंकर की माता सोलह स्वप्न कब देखती है? उत्तर - पिछली रात्रि के पिछले पहर में, जब तीर्थंकर माता के गर्भ में आते हैं तब। प्रश्न 27 - स्वनों के फलों के उत्तर कौन देता है? उत्तर - स्वप्नों के फलों के उत्तर भगवान के पिता देते हैं। प्रश्न 28 - भगवान के गर्भ में आने के पूर्व में क्या होता है? उत्तर - छः महीने पहले माता के आंगन में प्रतिदिन साड़े बारह करोड़ रत्नों की वर्षा होती है। प्रश्न 29 - पहले स्वप्न में माता ने ऐरावत हाथी देखा राजा ने उसके क्या फल बताया। उत्तर - हे देवी! आपको उत्तम पुत्र की प्राप्ति होगी। प्रश्न 30 - दूसरे स्वप्न में उत्तम श्वेत बैल देखने का क्या फल है? उत्तर - आपका पुत्र संसार में सबसे बड़ा होगा महान होगा। jain temple145 प्रश्न 31 - तीसरे स्वप्न में सिंह देखने का क्या फल है? उत्तर - अपका पुत्र अनंत बल से युक्त होगा। प्रश्न 32 - चैथे स्वप्न में माला युगल देखने का क्या फल है? उत्तर - आपका पुत्र समीचीन धर्म का उपदेशक होगा। प्रश्न 33 - पांचवे स्वप्न में लक्ष्मी देखने का क्या फल है? उत्तर - आपके पुत्र का जन्म के समय मेरू पर्वत पर द्रेवों के द्वारा श्रीर समुद्र के जल से 1008 कलशों से अभिषेक होगा। प्रश्न 34 - छठे स्वप्न में चन्द्रमा देखने का राजा ने क्या फल बताया? उत्तर - हे देवी! चन्द्रमा देखने से आपका पुत्र समस्त जगत को आनन्द देने वाला होगा। प्रश्न 35 - सातवें स्वप्न में सूर्य देखने का क्या फल बताया। उत्तर - आपका पुत्र दैदीप्यमान प्रभा का धारक होगा। प्रश्न 36 - आठवें स्वप्न में कलश युगल देखने का क्या फल है? उत्तर - आपका पुत्र अनेक निधियों का स्वामी होगा। प्रश्न 37 - नौ वां स्वप्न मीन युगल देखने से क्या फल हैं? उत्तर - मीन युगल से आपका पुत्र परम सुखी होगा। प्रश्न 38 - दशवां स्वप्न, सरोवर देखने का राजा ने क्या फल बताया? उत्तर - सरोवर देखने से आपके पुत्र के शरीर में 1008 लक्षण, व्यंजन शोभित होंगे। प्रश्न 39 - ग्यारहवां स्वप्न समुद्र देखने का क्या फल है? उत्तर - समुद्र देखने से वह पुत्र केवलज्ञान रूपी जलधि से युक्त होगा। प्रश्न 40 - रानी के बारहवें स्वप्न में सिंहासन देखने का क्या फल है? उत्तर - सिंहासन देखने से आपका पुत्र जगत गुरू एवं विपुल साम्राज्य का नायक होगा। प्रश्न 41 - रानी के तेरहवें स्वप्न देवों का विमान देखने का क्या फल है? उत्तर - देवों का विमान देखने से वह स्वर्ग से अवतीर्ण होगा। jain temple146 प्रश्न 42 - रानी के चैदहवें स्वप्न नागेन्द्र भवन देखने का क्या फल है? उत्तर - नागेन्द्र भवन देखने से आपका पुत्र जन्म से ही मतिश्रुत अवधिज्ञान का धारी होगा। प्रश्न 43 - पन्द्रहवें स्वप्न रत्न राशि देखने का क्या फल है? उत्तर - आपका पुत्र गुणों की खान होगा। प्रश्न 44 - भगवान की माता के सोलहवें स्वप्न धूम रहित अग्नि देखने का क्या फल है? उत्तर - आपका पुत्र मोक्ष को प्राप्त करने वाला होगा। प्रश्न 45 - माता की सेवा करने वाली 6 देवियां कौन-कौन सी हैं? उत्तर - श्री ह्मी धृति, कीर्ति, बुद्धि लक्ष्मी ये 6 देवियां भगवान के गर्भ जन्म कल्याणक में माता की सेवा करती हैं। प्रश्न 46 - ये देवीयां कहा रहती हैं? उत्तर - ये देवियां ढाई द्वीप में मेरू के उत्तर दक्षिण में स्थित पूर्व से पश्चिम तक फैले हुए षट् कुलाचालों, हिमवान, महा हिमवान, निषध, नील रूकमी और शिखरी पर्वतों पर प्रत्येक के मध्य में स्थित, सरोवरों पद्य महापद्म तिंगिच्छ केसरी महापुंडरीक पुंडरीक सरोवरों पर बने कमलों पर निवास करती हैं। प्रश्न 47 - भगवान की माता की सेवा करने वाली दिक् कन्यायें कितनी हैं? उत्तर - भगवान की माता की सेवा करने वाली दिक् कन्यायें चवालिस हैं। प्रश्न 48 - ये दिक्कन्यायें कहां रहती है? उत्तर - ये दिक्कन्यायें तेरहवें रूचकवर द्वीप में एवं दक्षिण पश्चिम एवं उत्तर दिशाओं में बने हुए चवालिस कूटों पर रहती हैं। प्रश्न 49 - रूचक गिरि पर्वत पर बने हुए पूर्व दिशा के आठ कुटों पर कौन-कौन सी दिक्कन्यायें रहती हैं। उत्तर - इन कूटों पर रहने वाली दिक्कन्याओं के नाम हैं- 1 विजया, 2 विजयंता , 3 जयंता , 4 अपराजिता , 5 नंदा , 6 नंदवती, 7 नंदोत्तरा एवं 8 नंदीषेणा। प्रश्न 50 - ये दिक् कन्यायें जन्म कल्याण में क्या कार्य करती हैं? उत्तर - ये दिक् कन्यायें जिन जन्म कल्याणक में झारी को धारण करती हैं। प्रश्न 51 - रूचकवर पर्वत पर दक्षिण के आठ कूटों पर रहने वाली दिक् कनयाओं के नाम बताइये। उत्तर - इन कूटों पर रहने वाली दिक् कन्याओं के नाम इस प्रकार हैं- 1 इच्छा देवी , 2 समाहारादेवी , 3 सुप्रकीर्णादेवी , 4 यशोधरा देवी , 5 लक्ष्मी देवी , 6 शेषवती देवी, चित्रगुप्ता देवी एवं 8 वसुंधरा देवी। प्रश्न 52 - जिन जन्म कल्याणक में ये देवियां क्या करती हैं? उत्तर - ये अष्ट दिक् कन्यायें जिन जन्म कल्याण्क में दर्पण को धारण करती हैं। प्रश्न 53 - रूचकवर पर्वत के पश्चिम आठों कूटों की दिक्कन्याओं के नाम बताइये। उत्तर - 1- इलादेवी , 2- सुरादेवी , 3- पृथ्वीदेवी , 4- पद्मादेवी , 5- इकनावासादेवी , 6- नवमीदेवी , 7- सीतादेवी एवं 8- भद्रादेवी। प्रश्न 54 - उपरोक्त देवियां जिन जन्म कल्याणक में क्या कार्य करती हैं? उत्तर - ये उपरोक्त देवियां जिन माता के ऊपर छत्र लगाती हैं। प्रश्न 55 - रूचकवर पर्वत के ऊपर उत्तर के आठों कूटों पर रहने वाली दिक्कन्याओं के नाम बताइये। उत्तर - 1 अलंभूषा देवी , 2 मिश्रिकेशि , 3 पुंडरीकणी देवी , 4 वारूणी देवी , 5 आशा देवी , 6 सत्या देवी , 7 श्री देवी , 8 अतिरूपणि देवी। jain temple147 प्रश्न 56 - ये देवियां जिन जन्म कल्याणक में क्या कार्य करती हैं? उत्तर - ये दिक् कन्यायें जिन माता के ऊपर चंवर ढुराने का कार्य करती हैं? प्रश्न 57 - रूचकवर पर्वत के चार महाकूटों की दिक्कन्याओं के नाम बताइये। उत्तर - 1 सौदामिनी देवी , 2 कनका देवी , 3 शतपदा देवी , 4 कनक सुचित्रा। प्रश्न 58 - ये चारों दिक्देवियां जिन जन्म कल्याणक में क्या काम करती हैं? उत्तर - ये देवियां जिन जन्म कल्याणक में दश दिशाओं को निर्मल करती हैं। प्रश्न 59 - रूचकगिरि के चार अभ्यंतर कूटों पर कौन-सी देवियां रहती हैं? उत्तर - रूचकगिरि के चारों कूटों पर 1 रूचिका , 2 रूचक कीति , 3 रूचककांता , 4 रूचकप्रभा नाम की देवियां रहती हैं। प्रश्न 60 - ये देवियां जिन कल्याण में कौन-सा कार्य करती हैं? उत्तर - ये देवियां भगवान के जन्म कल्याणक में भक्तिपूर्वक जात कर्म करती हैं। प्रश्न 61 - कल्याणक किसे कहते हैं? उत्तर - भगवान के जिन उत्सवों को देवगण मनाते हैं उन्हें कल्याणक कहते हैं। प्रश्न 62 - कल्याणक कितने होते हैं? उत्तर - कल्याणक पांच होते हैं प्रश्न 63 - पांच कल्याणकों के नाम बताइये। उत्तर - 1 गर्भ कल्याणक , 2 जन्म कल्याणक , 3 तप कल्याणक , 4 केवलज्ञान कल्याणक एवं , 5 मोक्ष कल्याणक। प्रश्न 64 - दीक्षा कल्याणक का दूसरा नाम क्या है? उत्तर - दीक्षा कल्याणक को तप कल्याणक तथा निःक्रमण कल्याणक भी कहते हैं। प्रश्न 65 - मोक्ष कल्याणक का दूसरा नाम क्या है? उत्तर - मोक्ष कल्याणक का दूसरा नमा निर्वाण कल्याणक है। प्रश्न 66 - जन्म से ही भगवान कितने ज्ञान के धारक होते हैं? उत्तर - जन्म से ही भगवान मति, श्रुत, अवधि तीन ज्ञान के धारक होते हैं। प्रश्न 67 - भगवान का गर्भ कल्याणक कैसे मनाया जाता है? उत्तर - तीर्थंकर प्रकृति का बंध करने वाला जीव जब माता के गर्भ में आता है तब छः महीने पहले से इन्द्र की आज्ञा से कुबरे नगरी को सजाते हैं तथा प्रतिदिन माता के आंगन में रत्नों की वर्षा करते हैं। भगवान की माता पिछली रात्रि में 16 स्वप्न देखती हैं अपने पति से स्वप्नों के फल का उत्तर सुनकर रोमांचित हो जाती हैं। भगवान को गर्भ में आया जानकर, श्री आदि देवियां तथा चवालिस दिक्कन्यायें भगवान की माता की सेवा करती हैं मनोरंजन करती है माता से गूढ़ प्रश्न पूछती हैं तथा गर्भ में भगवान के प्रभाव से उन प्रश्नों का उत्तर माता देती हैं। प्रश्न 68 - जन्म कल्याणक कैसे मनाया जाता है? उत्तर - भगवान के जन्म के समय चतुर्निकय के देवों के यहां बिना बजाये घंटे, घडि़याल, शंख आदि बजने लगते हैं, उनके मुकुट अपने आप झुक जाते हैं। इन्द्रासन कम्पायमान होता है, कल्पवृक्षों से पुष्पों की वर्षा होने लगती हैं। अवधि ज्ञान से जन्म को जानकर, सौधर्म इन्द्र सपरिवार असंख्यातों देव-देवियों सहित ऐरावत हाथी पर चढ़कर नगर की तीन प्रदक्षिणा देते हैं। शची प्रसूति ग्रह से भगवान को लाकर इन्द्र को देती है। माता के पास मायामयी बालक को छोड़ देती है। इन्द्र भगवान को लेकर मेरू पर्वत की पांडुक शिला पर विराजमान करते हैं। वहां पर इन्द्र सभी परिवार सहित 1008 कलशों से भगवान का क्षीर समुद्र के जल से अभिषेक करते हैं। प्रश्न 69 - क्षीर समुद्र कौन-सा समुद्र हैं? उत्तर - क्षीर समुद्र लवण समुद्र से पांचवां समुद्र हैं। प्रश्न 70 - भगवान के न्हवन का कलश कितना बड़ा होता है? उत्तर - भगवान के न्हवन का कलश आठ योजन गहरा चार योजन चैड़ा एवं एक योजन विस्तृत मुख वाला होता है। प्रश्न 71 - ऐरावत हाथी कैसा होता है? उत्तर - आभियोग जाति के देव विक्रिया से ऐरावत हाथी का रूप बनाते हैं। ऐरावत हाथी का रूप एक लाख योजन विस्तरित हो जाता है इसके दिव्य मालाओं से युक्त बत्तीस मुख होते हैं एक-एक मुख में रत्नों से निर्मित 4-4 दांत होते हैं एक-एक दांत पर एक-एक सरोवर एवं सरोवर में कमल बना होता है। एक-एक कमल खंड में 32 महापद्म होते हैं जो एक-एक योजन के होते हैं इन एक-एक महाकमलों पर एक-एक नाट्यशाला होती हैं एक-एन नाट्यशाला में 32-32 अप्सराये नृत्य करती हैं। प्रश्न 72 - कौन सा देव ऐरावत हाथी बनता हैं? उत्तर - इन्द्र की आज्ञा से आभियोग जाति का बालक नाम का देव विक्रिया से ऐरावत हाथी बनता है। प्रश्न 73 - पांडुक शिला कहां पर हैं? उत्तर - प्रत्ये कमेरू के पांडुक वन की विदिशाओं में अर्धचंद्राकार शिलायें हैं उन्हें सामान्य से पांडुक शिला कहते हैं वैसे उनके अलग-अलग नाम हैं। ये ऐशानदिशा के क्रम से 1 - पांडुकशिला, 2 - पांडुकम्बला, 3 - रक्तशिला और, 4 - रक्तकम्बला प्रश्न 74 - पांडुकशिला का कितना विस्तार है? उत्तर - वह पवित्र पांडुकशिला सौ योजन लम्बी, पचास योजन चैड़ी एवं आठ योजन ऊंची है। प्रश्न 75 - तीर्थंकरों के अभिषेक का क्रम बताइये कौन-कौन से तीर्थंकर का अभिषेक कहां-कहां होता है? उत्तर - पाण्डुकशिला पर भरत क्षेत्र में जन्म लेने वाले तीर्थंकरों का, पाण्डुकम्बला शिला पर पश्चिम विदेह के तीर्थंकरों का एवं रक्त कम्बला शिला पर पूर्व विदेह क्षेत्र के तीर्थंकरों का अभिषेक होता है। प्रश्न 76 - पाण्डुकादि शिलायें कितनी होती हैं? उत्तर - पाण्डुकादि शिलायें बीस होती हैं। एक मेरू पर चार होती हैं। प्रश्न 77 - क्या सभी मनुष्यों के कल्याणक होते हैं? उत्तर - सभी मनुष्यों के कल्याणक नहीं होते हैं। जिन जीवों ने तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया है वे ही उदय आने पर तीर्थंकर होते हैं। प्रश्न 78 - क्या सभी तीर्थंकरों के पंचकल्याणक होते हैं? उत्तर - सभी तीर्थंकरों के पंचकल्याणक नहीं होते हैं दो तीन भी होते हैं। प्रश्न 79 - पांच कल्याणक कौन-कौन से तीर्थंकरों के होते हैं? उत्तर - पांच भरत एवं पांच ऐरावत दश क्षेत्रों में जन्म लेने वाले तीर्थंकरों के पांच कल्याणक होते हैं। प्रश्न 80 - दो तीन चार कल्याणक कौन-से तीर्थंकरों के होते हैं? उत्तर - एक सौ साठ विदेह क्षेत्रों में जन्म लेने वाले तीर्थंकरों के दो, तीन, चार एव पांच कल्याणक भी होते हैं। प्रश्न 81 - विदेह क्षेत्र के तीर्थंकरों से तीन कल्याणक कैसे होते हैं? उत्तर - विदेह क्षेत्र में सदा चतुर्थकाल प्रवर्तमान रहता है केवली श्रुत केवली के पाद मूल में जो मनुष्य सोलह कारण भावनाओं का चिंतवन करते हैं, उसी भव में तीर्थंकर प्रकृति का उदय आ जानेपर उनका, गर्भ एवं जन्म कल्याणक नहीं होता शेष दीक्षा, ज्ञान एवं निर्वाण कल्याणक होते हैं। प्रश्न 82 - विदेह क्षेत्र के तीर्थंकरों के दो कल्याणक कैसे होते हैं? उत्तर - जब विदेह क्षेत्र में कोई मुनिराज सोलह कारण भावनाओं का चिंतवन करते हैं, उसी भव में उदय आ जाने से उनका गर्भ, जन्म, दीक्षा कल्याणक नहीं मनाया जा सकता है। उनके ज्ञान व मोक्ष कल्याणक मनाये जाते हैं। प्रश्न 83 - दीक्षा कल्याणक कैसे मनाया जाता है। उत्तर - जब भगवान को किसी निमित्त से वैराग्य होता है तब लौकान्तिक देव आकर भगवान की वैराग्य भावना तथा भगवान की स्तुति करते हैं देवों द्वारा लाई हुई पालकी में बैठकर वन में पहुंचते हैं। रत्नशिला पर पूर्व या उत्तर मुख से बैठकर ऊँ नमः सिद्धेभ्यः मंत्र का उच्चारण कर पंचमुष्ठी केश लौंच करते हैं तथा नग्न दिगम्बर दीक्षा लेकर ध्यान में लीन हो जाते हैं। उसी समय उन्हें मनः पर्यय चैथा ज्ञान प्रकट हो जाता है। इन्द्र उनके केशों को रत्नपिटारे में रखकर क्षीर समुद्र में क्षेपण करते हैं। भगवान जन्म से मति श्रुत अवधि तीन ज्ञान के धारक होते हैं। प्रश्न 84 - क्षीर समुद्र का जल कैसा होता है? उत्तर - क्षीर समुद्र का जल जीव रहित दूध के समान सफेद धवल होता है। इसीलिए इसे क्षीर समुद्र कहते हैं। प्रश्न 85 - केवलज्ञान कल्याणक कैसे मनाया जाता है? उत्तर - जब भगवान, शुक्ल ध्यान के द्वारा धातिया कर्मों का नाश कर देते हैं तो लोकालोक को प्रकाशित करने वाला उन्हें केवलज्ञान प्रकट होता है। भगवान बीस हजार हाथ ऊपर जाकर, कुबेर द्वारा अर्धनिमिष मात्र में बनाये गये समवस्रण के मध्य गंधकुटी के कमलासन के ऊपर अधर विराजमान हो जाते हैं। समवसरण में सात भूमियों के बाद आठवीं श्री मंडप नाम की सभा भूमि में बारह सभायें लगती हैं। भगवान का एक मुख होते हुए भी चारों दिशाओं में मुख दिखते हैं, देव, देवियां, मनुष्य तिर्यंच वहां भगवान का उपदेश सुनते हैं। यद्यपि भगवान का उपदेश अर्धमगधीभाषा में होता है फिर भी सभी को अपनी अपनी भाषा में समझ में आ जाता है। प्रश्न 86 - भगवान की वाणी किस प्रकार खिरती है? उत्तर - भगवान की वाणी ऊँकार रूप में मेघगर्जन के समान खिरती है। प्रश्न 87 - प्रमुख श्रोता कौन होते हैं? उत्तर - प्रमुख चक्रवर्ती या सम्राट, भगवान के प्रमुख श्रोता होते हैं। प्रश्न 88 - भगवान की वाणी किसके बिना नहीं खिर सकती हैं? उत्तर - भगवान की वाणी गणधर के बिना नहीं खिर सकती है। प्रश्न 89 - प्रत्येक तीर्थंकर के कितने गणधर होते हैं? उत्तर - प्रत्येक तीर्थंकर के अनेक गणधर होते हैं। प्रश्न 90 - सबसे बड़े समवसरण का विस्तार कितना होता है? उत्तर - सबसे बड़े समवसरण का विस्तार 12 योजन होता है। प्रश्न 91 - सबसे छोटे समवसरण का विस्तार कितना होता है? उत्तर - सबसे छोटा समवसरण 1 योजन का होता है। प्रश्न 92 - समवसरण किसे कहते हैं? उत्तर - तीर्थंकर की धर्मसभा के स्थान को समवसरण कहते हैं। समवसरण का शाब्दिक भाव है, जो स्थान संसार के समस्त जीवों को शरण देने में समर्थ है वह समवसरण कहलाता है। प्रश्न 93 - समवसरण में स्थित भगवान का दर्शन कौन करते हैं? उत्तर - समवसरण में स्थित भगवान का दर्शन केवल सम्यग्दृष्टि जीव ही करते हैं। मिथ्यादृष्टियों की भावना ही नहीं होती है। कुछ मिथ्यादृष्टि जीव मानस्तम्भ तक पहुंचकर सम्यग्दृष्टि बन जाते हैं। प्रश्न 94 - समवसरण में कितनी सीडि़यां होती हैं? उत्तर - समवसरण में बीस हजार सीडि़यां होती हैं। प्रश्न 95 - मसवसरण की प्रत्येक सीड़ी की ऊंचाई कितनी होती है? उत्तर - समवसरण की प्रत्येक सीड़ी की ऊंचाई 1 हाथ होती है। प्रश्न 96 - समवसरण में कौन-सी गति के जीव जाकर धर्मामृत का पान करते हैं? उत्तर - नारकियों को छोड़कर शेष मनुष्य तिर्यंच, देव सभी भगवान की दिव्य ध्वनि का पान करते हैं। प्रश्न 97 - कितनी इन्द्रियों के धारक जीव समवसरण में भगवान की दिव्य ध्वनि सुनते हैं। उत्तर - केवल संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव। प्रश्न 98 - समवसरण की आठ भूमियों के नाम क्रम से बताइये। उत्तर - 1- चैत्य प्रासाद भूमि, 2- खाातिक भूमि, 3- लता भूमि, 4- उपवन भूमि, 5- ध्वज भूमि, 6- कल्पवृक्ष भूमि, 7- भवन भूमि एवं, 8- श्री मंडप भूमि। प्रश्न 99 - चैत्यप्रसाद भूमि कैसी है? उत्तर - चैत्य प्रासाद भूमि में एक-एक जिनमन्दिर के अंतराल के पांच देव प्रासाद रहते हैं ये तीर्थंकरों से 12 गुने ऊंचे होते हैं। चारों दिशाओं में एक-एक मानस्तम्भ एक-एक बाबड़ी होती है। इसमें पृथक-पृथक गलियों में दो-दो नाट्यशालायें होती हैं। प्रत्येक नाट्यशाला में 32-32 रंगभूमियां होती हैं। प्रत्येक रंग भूमि में 32-32 देवियां। नृत्य करती हुईं तीर्थंकरों का गुणगान करती हैं। प्रत्येक नाट्यशाला में दो-दो धूप घट रहते हैं। jain temple148 प्रश्न 100 - खातिका भूमि कैसी होती हैं? उत्तर - ये खातिका भूमि एक प्रकार की खाई होती है जो अपने तीर्थंकर की ऊंचाई के चतुर्थ भाग होती हैं। प्रश्न 101 - तीसरी लता भूमि कैसी होती है? उत्तर - ये एक प्रकार का लता वन है इसमें लताएं रहती हैं। प्रश्न 102 - चैथी उपवन भूमि की रचना किस प्रकार की है? उत्तर - चैथी उपवन भूमि में पूर्वदिदिशा के क्रम से, अशोक, सप्तच्छद चंपक एवं आम्रवन हैं। इनके बीचों-बीचों एक-एक चैत्य वृक्ष जिसके मूलभाग में चारों दिशाओं में जिन प्रतिमायें विराजमान हैं। इस उपवन भूमि की बाबडि़यों में लोग अपने सात भव देख लेते हैं। इस वन भूमि की गलियों के दोनों पाश्र्व भागों में दो-दो नाट्यशालयें हैं इस वन भूमि को घेरे हुए वेदी पर यक्षेन्द्र देव पहरा देते हैं। प्रश्न 103 - समवसरण की पांचवी भूमि की रचना बताइये। उत्तर - पांचवतीं भूमि में, सिंह, गज, वृषभ, गरूड़, मयूर, चन्द्र, सूर्य, हंस, कमल और चक्र दशचिन्हों से युक्त प्रत्येक चिन्ह की प्रत्येक दिशा में 108-108 ध्वजायें होती है इनमें भी प्रत्येक ध्वजा की 108-108 परिवार ध्वजायें रहती हैं इसको घेरकर चांदी के परकोटे पर द्वार रक्षक देव भवनवासी देव हैं। प्रश्न 104 - समवसरण की छठी भूमि की रचना किस प्रकार की है? उत्तर - समवसरण की छठी भूमि का नाम कल्पवृक्ष भूमि है इसमें 10 प्रकार के कल्पवृक्ष रहते हैं। ये सब नाम के अनुसार ही फल-वस्तुएं प्रदान करते हैं। इस भूमि में पूर्वादि दिशा के क्रम से नमेरू मंदार, संतानक तथा पारिजात ये चार सिद्धार्थ वृक्ष होते हैं इनमें चारो तरफ चार सिद्ध प्रतिमायें विराजमान रहती हैं। प्रश्न 105 - दश प्रकर के कल्पवृक्ष कौन-कौन से हैं? उत्तर - दश प्रकार के कल्पवृक्षों के नाम इस प्रकार हैं- 1- पानांग, 2- तूर्यांग, 3- भूषणांग, 4- वस्त्रांग, 5- भोजनांग, 6- आलयांग, 7- दीपांग , 8- भाजनांग , 9- मालांग एव, 10 तेजांग प्रश्न 106 - पानांग जाति के कल्पवृक्ष क्या फल प्रदान करते हैं? उत्तर - पानांग जाति के कल्पवृक्ष मधुर सुस्वाद छहों रसों युक्त पुष्टि कारक बत्तीस प्रकार के पेय पदार्थों को प्रदान करते हैं। प्रश्न 107 - तूर्यांग जाति के कल्पवृक्ष क्या फल प्रदान करते हैं? उत्तर - तूर्यांग जाति के कल्पवृक्ष उत्तरम बाजा, पट्, पहट, मृदंग आदि वादि यंत्रों को प्रदान करते हैं। प्रश्न 108 - भूषणांग जाति के कल्पवृक्षाों का कार्य बताइये। उत्तर - भूषणांग जाति के कल्पवृक्ष- कंकण, कटि सूत्र हार, माला मुद्रिका आदि भूषणों को प्रदान करते हैं। प्रश्न 109 - वस्त्रांग जाति के कल्पवृक्ष जीवों को क्या प्रदान करते हैं? उत्तर - वस्त्रांग जाति के कल्पवृक्ष, चीनपट्टु, क्षौमादि वस्त्रों को प्रदान करते हैं। प्रश्न 110 - भोजनांग जाति के कल्पवृक्षों का कार्य बताइये। उत्तर - भोजनांग जाति के कल्पवृक्ष सोलह प्रकार के आहार, सोलह प्रकार के व्यंजन, चैदह प्रकार की दालें, एक सौ साठ प्रकार के खाद्य पदार्थ, 363 प्रकार के स्वाद्य पदार्थ, एवं त्रेषठ प्रकार के रसों को देते हैं। प्रश्न 111 - आलयांग जाति के कल्पवृक्ष कार्य करते हैं? उत्तर - आलयांग कल्पवृक्ष, स्वास्तिक नंद्यावर्त आदि सोलह प्रकार के दिव्य भवनों को प्रदान करते हैं। प्रश्न 112 - दीपांग जाति के कल्पवृक्षों का कार्य बताइये। उत्तर - दीपांग जाति के कल्पवृक्ष शाखा, प्रवाल, फल, फूल और अंकुर आदि के द्वारा जलते हुए दीपकों के समान प्रकाश को प्रदान करते हैं। प्रश्न 113 - भाजनांग जाति के कल्पवृक्षों का कार्य बताइये। उत्तर - भाजनांग जाति के कल्पवृक्ष स्वर्ण आदि से निर्मित झारी कलश, गागर, चामर, और आसनादि देते हैं। प्रश्न 114 - मालांग कल्पवृक्ष क्या प्रदान करते हैं? उत्तर - मालांग जाति के कल्पवृक्ष, बेले, तरू, गुच्छ और लताओं से उत्पन्न हुए सोलह हजार रूप पुष्पों की मालाओं को प्रदान करते हैं। प्रश्न 115 - तेजांग जाति के कल्पवृक्षों का कार्य बताइये। उत्तर - ज्योतिरंग (तेजरांग) जाति के कल्पवृक्ष मध्य दिन के करोड़ों सूर्यों की किरणों के समान होते हुए सूर्य चन्द्र की रोशनी को फीका करते हैं। प्रश्न 116 - समवसरण की सातवीं भूमि की रचना कैसी हैं? उत्तर - सावतीं भूमि का नाम भवन भूमि हैं। यहां बने हुए भवनों में जिन प्रतिमायें विराजमान हैं तथा जिनाभिषेक होता रहता है। देव देवियां नृत्य संगीत से भक्ति करते रहते है। इसके दोनों पाश्र्वभागों की प्रत्येक गली के मध्य में नौ-नौ स्तूप हैं। जिनमें अर्हंत तथा सिद्धों की प्रतिमायें विराजमान हैं। इसके आगे स्फटिक कोट है जिसके द्वारों के रक्षक देव कल्पवासी देव हैं। प्रश्न 117 - आठवीं भूमि का नाम तथा रचना बताइये। उत्तर - आठवीं भूमि का नाम श्री मंडप भूमि है। इसके बीच-बीच में सोलह स्फटिक मणी की दीवालें हैं चार-चार गलियों के बाद दीवालों के मध्य में तीन कोठे अपने तीर्थंकर की ऊंचाई के बारह गुने ऊंचे बने हुए हैं। इन्हीं कोठों में बारह सभायें लगती हैं। भव्य जीव यहां भगवान का उपदेश ग्रहण करते हैं। jain temple149 प्रश्न 118 - समवसरण में कितनी सभायें होती हैं? उत्तर - समवसरण मंे बारह सभायें होती हैं। प्रश्न 119 - भगवान की पहली सभा में कौन जीव रहते हैं? उत्तर - भगवान की पहली सभा पूर्व दिशा में रहती है। इसमें सर्व प्रथम गणधर और मुनिगण रहते हैं। प्रश्न 120 - भगवान की दूसरी सभा में कौन-से जीव रहते हैं? उत्तर - भगवान की दूसरी सभा आग्नेय दिशा में होती है। यहां दूसरे कोठे में कल्पवासी देवियां भगवान का उपदेश ग्रहण करती हैं। प्रश्न 121 - तीसरा कोठा में कौन-से जीव रहते हैं? उत्तर - तीसरा कोठ दक्षिण में होता है तथा इसमें आर्यिकायें एवं श्राविकायें होती हैं। प्रश्न 122 - समोशरण के चैथे कौन से जीव धर्म श्रवण करते हैं। उत्तर - भगवान के समवसरण के चैथे कोठे में ज्योतिषी चन्द्र सूर्य आदि की देवियां धर्म श्रवण करती हैं। प्रश्न 123 - समवसरण के पांचवें कोठे में कौन-से जीव रहते हैं? उत्तर - पांचवे कोठे में व्यंतर देवों की देवियां रहती हैं। प्रश्न 124 - समवसरण के छठे कोठे में क्या हैं? उत्तर - समवसरण के छठे कोठे में भवनवासी देवों की देवियां धर्म श्रवण करती हैं? प्रश्न 125 - समवसरण के सातवें कोठे में कौन-से जीव बैठते हैं? उत्तर - समवसरण के सातवें कोठे में भवनवसी देव बैठते हैं। प्रश्न 126 - समवसरण के आठवे कोठे में कौन-से जीव है। उत्तर - समवसरा के आठवे कोठे में व्यंतरवासी देव रहते हैं। प्रश्न 127 - समवसरण का नौवां कोठा कौन-से जीवों से भरा रहता है? उत्तर - नौवों कोठे में ज्योतिषी देव रहते हैं। jain temple150 प्रश्न 128 - समवसरण के दसवें कोठे में क्या है? उत्तर - दशवें कोठे में कल्पवासी देव हैं। प्रश्न 129 - समवसरण के ग्यारहवें कोठे में क्या है? उत्तर - समवसरण के ग्यारहवें कोठे में चक्रवर्ती एवं मनुष्य होते हैं। प्रश्न 130 - समवसरण के बारहवें कोठे की स्थिति बताइये। उत्तर - समवसरण के बारहवें कोठे में संज्ञी पंचेन्दी्रय तिर्यंच जीव-हाथी, सिंह, व्याघ्र, हिरन आदि पशुगण बैठते हैं। प्रश्न 131 - बारह सभाओं से आगे क्या होता है? उत्तर - बारह सभाओं के अभ्यंतर निर्मल स्टफटिक की वेदी है इसके आगे पहली कटनी वैडूर्यमणी की है उस पर चढ़ने के लिए चार गली बारह कोठों के स्थान पर सोलह-सोलह सीडि़यां हैं इसके चारों दिशाओं में यक्षेन्द्र अपने मस्तक पर धर्मचक्र धारण किये हुए खड़े रहते हैं। प्रश्न 132 - समवसरण में दूसरी कटनी पर क्या है? उत्तर - दूसरी स्वर्ण कटनी पर सिंह, बैल, कमल, चक्र, माला, गरूड़, वस्त्र और हाथी इन आठ चिन्हों से युक्त ध्वजायें तथा धूपघट नव निधियां पूजन द्रव्य और मंगल द्रव्य रखे हुए हैं। प्रश्न 133 - तीसरी कटनी पर क्या है? उत्तर - तीसरी कटनी सूर्य मंडल के समान गोल हैं। इसी तीसरी कटनी पर गंध कुटी शोभायमान रहती है। प्रश्न 134 - गंध कुटि का किंचित वर्णन कीजिए। उत्तर - जिसमें जिनेन्द्र देव विराजमान रहते हैं। उसे गंध कुटी कहते हैं वह गंधकुटी, चंवर, छत्र, वंदनमाला, किंकणी मोतियों के हार दीपक धूपघट आदि से सजी रहती है। इस गध कुटी के मध्य सिंहासन पर एक लाल वर्ण का सहस्त्र दल कमल रहता है जिस पर भगवान चार अंगुल अधर विराजमान रहते हैं। प्रश्न 135 - भगवान के मोक्ष कल्याणक में क्या होता है? उत्तर - जब भगवान का आयु कर्म पूरा होने को होता है तो समवसरण विघटित हो जाता है। ध्यान में लीन भगवान अपने शेष चार अघतिया कर्मों का भी नाश कर देते हैं। वे एक समय में अथवा पंच लब्धछर समय मात्र में वे परमात्मा लोक के अग्रभाग पर अनंतानंत काल सदा के लिए सिद्ध शिला पर विराजमान हो जाते हैं। उस समय चारों प्रकार के देव बड़ी भक्ति से उनके शरीर का अग्नि संस्कार करते हैं। अग्निकुमार के इन्द्र देव अपने मुकुट के अग्रभाग से अग्नि प्रज्ज्वलित करते हैं सभी देव भस्म को ललाट में लगा कर अपना जन्म धन्य करते हैं। प्रश्न 136 - अग्नि कुमार के इन्दों के कितने भेद हैं? उत्तर - अग्नि कुमार के इन्द्र तीन प्रकार के हैं- गाह्र्यपत्य, आह्वानीय एवं दक्षिणाग्नेन्द्र। प्रश्न 137 - उपरोक्त तीनों इन्दों का क्या कार्य है? उत्तर - तीर्थंकर के शरीर का संस्कार गाह्र्यपत्य इन्द्र करते हैं, गणधर देव के शरीर का संस्कार आह्वानीय इन्द्र तथा केवली के शरीर का संस्कार दक्षिणाग्नेन्द्र करते हैं। प्रश्न 138 - तीर्थंकर गणधर तथा केवलियों के लिए किस - किस प्रकार के कुंडो की रचना होती है। उत्तर - तीर्थंकरों के लिए चैकोर कुंड, गणधरों के लिए त्रिकोण कुंड तथा केवलियों के लिए गोल कुंड की रचना होती है। प्रश्न 139 - क्या सभी मोक्ष जाने वाले जीवों के कल्याणक होते हैं? उत्तर - नहीं! जिन जीवों ने तीर्थंकर प्रकृति का आश्रव, बंधकिया है केवल उन्हीं जीवों के तीर्थंकर प्रकृति उदय में आ जाने से, कल्याणक देव मानते हैं। प्रश्न 140 - तीर्थंकर की प्रतिमाओं के चिन्हों का पता किस प्रकार चलता है? उत्तर - भगवान के न्हवन के समय, इन्द्र भगवान के दांये पैर के अंगूठे को देखते हैं जो चिन्ह होता है उसी चिन्ह से उनकी प्रतिमा की पहचान होती है। jain temple151 प्रश्न 141 - तीर्थंकरों के शरीर पर कितने चिन्ह होते हैं? उत्तर - तीर्थंकरों के शरीर पर 1008 चिन्ह होते हैं। प्रश्न 142 - इन्द्र कितने नामों से भगवान की स्तुति करते हैं? उत्तर - 1008 नामों से इन्द्र भगवान की स्तुति करते हैं? प्रश्न 143 - तीर्थंकरों के जन्म एवं मोक्ष के बारे में आगम का क्या नियम है? उत्तर - आगम के नियम के अनुसार सभी तीर्थंकर अयोध्या में ही जन्म लेते हैं तथा सम्मेद शिखर से मोक्ष जाते हैं। इसीलिए अयोध्या एवं सम्मेदशिखर शाश्वत तीर्थ माने जाते हैं। प्रश्न 144 - उपरोक्त नियम में परिवर्तन क्यों हुआ? उत्तर - हुंडवसर्पिणी काल के दोष से इस नियम में परिवर्तन हुआ इस बार न तो चैबींस तीर्थंकरों ने अयोध्या में जन्म लिया और न ही सम्मेद शिखर से मोक्ष गये। प्रश्न 145 - अयोध्या में जन्म लेने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - 1- श्री आदिनाथ जी 2- श्री अजितनाथ जी 3- श्री अभिनन्दननाथ जी 4- श्री सुमतिनाथ जी 5- श्री अनंतनाथ जी प्रश्न 146 - सम्मेद शिखर से कितने तीर्थंकर मोक्ष गये? उत्तर - बीस तीर्थंकरों ने सम्मेद शिखर से मोक्ष प्राप्त किया। प्रश्न 147 - कौन-से तीर्थंकरों ने सम्मेद शिखर से मोक्ष प्राप्त नहीं किया? उत्तर - 1 श्री आदिनाथजी 2 श्री वासुपूज्यजी 3 श्री नेमनाथजी 4 श्री महावीर भगवान इन चार तीर्थंकरों ने सम्मेद शिखर से मोख प्राप्त नहीं किया। प्रश्न 148 - अयोध्या एवं सम्मेद शिखर को छोड़कर सर्वाधिक कल्याणकों वाला तीर्थंक्षेत्र कौन-से हैं? उत्तर - वह क्षेत्र हस्तिनापुर है। कुल 12 कल्याणक हुए हैं। प्रश्न 149 - यहां 12 कल्याणक किस प्रकार हुए हैं? उत्तर - श्री शांतिनाथ, कुंथुनाथ एवं अरहनाथ इन तीर्थंकरों के गर्भ, जन्म, तप, केवलज्ञान ऐसे 4-4 कल्याणक हुए है। प्रश्न 150 - श्री शांतिनाथ कुंथुनाथ अरहनाथ इन तीर्थंकरों की विशेषता बतलाइये। उत्तर - तीनों तीर्थंकर, चक्रवर्ती, तीर्थंकर एवं कामदेव इन तीन-तीन पदो ंके धारक थे ये क्रमशः 16वे, 17वें एवं 18वें तीर्थंकर थे। प्रश्न 151 - श्री शांति, कुंथु, अरहनाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक कहां हुआ था? उत्तर - इनका मोक्ष कल्याणक श्री सम्मेद शिखर में हुआ था प्रश्न 152 - दो नामों से कौन-से तीर्थंकरों को जाना जाता है। उत्तर - ऐसे नोवें तीर्थंकर श्री पुष्पदंतजी हैं जिनका दूसरा नाम श्री सुविधनाथ जी भी है। प्रश्न 153 - ऐसे कौन से तीर्थंकर हैं, जिनके पांचों कल्याण एक ही स्थान पर हुए हैं और कहां? उत्तर - ऐसे बारहवें तीर्थंकर श्री वासुपूज्य जी हैं इनके पांचों कल्याणक चम्पापुर जी में हुए हैं। प्रश्न 154 - बालब्रह्मचारी तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - 1 - श्री वासुपूज्य जी , 2- श्री मल्लिनाथ जी , 3 - श्री नेमीनाथ जी , 4 - श्री पाश्र्वनाथ जी , 5 - श्री महावीर स्वामी। ये पांच बालब्रह्मचारी तीर्थंकर हुए हैं। प्रश्न 155 - चैबीस तीर्थंकरों के लिए कौन-से बीजाक्षर का प्रयोग किया गया है? उत्तर - चैबीस तीर्थंकरों के लिए ह्मीं बीजाक्षर का प्रयोग किा गया है। प्रश्न 156 - ह्मीं बीजाक्षर कितने वर्ण का माना गया है। उत्तर - ह्मीं बीजाक्षर में पांच वर्ण होते हैं, सफेद, नीला, लाल, हरित श्याम एवं सोने समान तपाया हुआ लालवर्ण। jain temple152 प्रश्न 157 - चैबीस तीर्थंकरों के कितने वर्ण हैं। उत्तर - चैबीस तीर्थंकर भी उपरोक्त पंच वर्णीय हुए हैंै। प्रश्न 158 - श्वेत वर्ण वाले कौन-से तीर्थंकर हैं? उत्तर - श्वेत वर्ण वाले दो तीर्थंकर हैं- चन्द्रप्रभु एवं पुष्पदंत जी। प्रश्न 159 - श्री चंदाप्रभु पुष्पदंत जी ह्मीं में कहां स्थित है? उत्तर - श्री चंदा प्रभु पुष्पदंत जी ह्मीं बीजाक्षर में श्वेत चन्द्रकार स्थान पर स्थित हैं। प्रश्न 160 - लाल वर्ण के कौन से तीर्थंकर हैं? उत्तर - श्री वासुपूज्य एवं पद्मप्रभु लाल वर्ण के तीर्थंकर हैं। प्रश्न 161 - उपरोक्त तीर्थंकर ह्मीं बीजाक्षर में कहां विराजमान हैं? उत्तर - श्री वासुपूज्य एवं पद्मप्रभु भगवान ह्मीं बीजाक्षर में ह्मीं मस्तक जोकि लाल वर्ण है उस स्थान पर विराजमान हैं। प्रश्न 162 - नील वर्ण वाले तीर्थंकरों के नाम बताओ। उत्तर - नेमनाथ जी एवं श्री मुनिसुव्रत जी नील वर्ण के तीर्थंकर हैं। प्रश्न 163 - नील वर्ण वाले तीर्थंकर ह्मीं बीजाक्षर में कहां पर विराजमान हैं? उत्तर - नील वर्ण वाले तीर्थंकर ह्मीं बीजाक्षर के नीले बिन्दु में शोभायमान हैं। प्रश्न 164 - हरित श्यामवर्ण वाले तीर्थंकर कौन-कौन से हैं? उत्तर - हरित श्यामवर्ण वाले दो तीर्थंकरा श्री सुपाश्र्वनाथ जी एवं श्री पाश्र्वनाथ जी हैं। प्रश्न 165 - उपरोक्त दोनों तीर्थंकर ह्मीं में कहां विराजमान हैं? उत्तर - उपरोक्त दोनों तीर्थंकर ह्मीं के हरित श्याम ईकारी में विराजमान हैं। jain temple153 प्रश्न 166 - पंचवर्णीय ह्मी में पंचवर्णीय चैबीस तीर्थंकर विराजमान हैं। ऐसा वर्णन कहां मिलता हैं? उत्तर - ये वर्णन श्री ऋषिमण्डल स्तोत्र तथा में आता है। प्रश्न 167 - शेष तीर्थंकर ह्मीं में कहां विराजमान हैं? उत्तर - शेष सोलह तीर्थंकर ह्मीं के ह्नकार में विराजनाम हैं? प्रश्न 168 - ये सोलह शेष तीर्थंकर किस वर्ण वाले हैं। उत्तर - ये शेष सोलह तीर्थंकर तपाये हुए स्वर्ण के समान आभा वाले हैं। प्रश्न 169 - उपरोक्त सोलह तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - 1- श्री आदिनाथ जी , 2- श्री अजितनाथ जी , 3 - श्री सम्भवनाथजी , 4- श्री अभिनंदननाथ जी , 5- श्री समुतिलनाथ जी , 6 - श्री शतलनाथजी , 7- श्रे श्रेयांसनाथ जी , 8- श्री विमलनाथ जी , 9 - श्री अनंतनाथ जी , 10- श्री धर्मनाथ जी , 11- श्री शांतिनाथ जी , 12- श्री कुंथुनाथजी , 13- श्री अरहनाथ जी , 14- श्री मल्लिनाथ जी , 15- श्री नमिनाथ जी , 16- श्री महावीर स्वामी। प्रसिद्ध पंच वर्णीय चैबीसी तीर्थ क्षेत्र चंदेरी में विराजमान है, वैसे श्री शांतिवीर नगर महावीरजी, नसियां जी भिण्ड (म0 प्र0) में, सम्मेदशिखर जी में विराजमान हैं। प्रश्न 170 - वर्तमान काल के पच्चीसवें तीर्थंकर का नाम बताइये। उत्तर - भरत ऐरावत क्षेत्रों में कर्मकाल में केवल चैबीस ही तीर्थंकर होते हैं। न तेइस न पच्चीस। प्रश्न 171 - तीर्थंकर के शरीर की सर्वाधिक ऊंचाई कितनी होती है? वर्तमान में किसकी है? उत्तर - तीर्थंकरों के शरीर की सबसे अधिक ऊंचाई पांच सौ धनुष (2000) होती है, जो श्री आदिनाथ की थी। प्रश्न 172 - तीर्थंकरों के शरीर की ऊंचाई सबसे कम कितनी होती है? उत्तर - तीर्थंकरों के शरीर की ऊंचाई सबसे कम सात हाथ होती है। प्रश्न 173 - सबसे कम ऊंचाई वाले तीर्थंकरा का नाम बताइये। उत्तर - भगवान महावीर स्वामी। प्रश्न 174 - बाहुबली को भगवान क्यों कहते हैं? जबकि वे तीर्थंकर नहीं थे? उत्तर - भगवान बनने के लिए तीर्थंकर बनना आवश्यक नहीं हैं, मोक्षगामी प्रत्येक भव्य आत्म जीव भगवान हैं। प्रश्न 175 - जब भगवान बाहुबली तीर्थंकर नहीं थे तो उनकी प्रतिमा की पूजा क्यों की जाती है? उत्तर - पंचपरमेष्ठी तीनों लोकों में पूज्य कहे गये हैं इसीलिए पंच परमेष्ठियों की प्रतिमायें अनादिकाल से पूजनीय, वंदनीय हैं। भगवान बाहुबली की गणना अरिहंत, सिद्ध की जाती है; अतः उनकी प्रतिमा भी पूज्य है। इसी प्रकार सभी मोक्षगामी जीवों की प्रतिमओं को समझना चाहिए। जैसे -राम, हनुमान आदि। प्रश्न 176 - भगवान आदिनाथ तथा महावीर भगवान का पूर्व सम्बंध बताइये। उत्तर - भगवान आदिनाथ पूर्व भव में भगवान महावीर के बाबा थे? प्रश्न 177 - भगवान महावीर का भरत चक्रवर्ती का पूर्व सम्बंध बताइये। उत्तर - पूर्व भव में भरत चक्रवर्ती भगवान महावीर के पिता थे। प्रश्न 178 - भगवान बाहुबली एवं भगवान महावीर की पूर्व पर्याय का सम्बंध बताइये। उत्तर - भगवान बाहुबली पूर्व भव में भगवान महावीर के चाचा थे। प्रश्न 179 - हमारेदेश्ज्ञ का नाम भारत कैसे पड़ा? उत्तर - भगवान आदिनाथ के प्रथम पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। प्रश्न 180 - इस कर्म युग में सर्वप्रथम मोक्ष जाने वाले कौन-से महापुरूष थे? उत्तर - भगवान आदिनाथ के पुत्र अनंतवीर्य। प्रश्न 181 - कितने तीर्थंकरों का जन्म उत्तर भारत में हुआ है? उत्तर - सभी तीर्थंकरों का। प्रश्न 182 - तीर्थंकर कौन से वर्ण वाले होते हैं? उत्तर - सभी तीर्थंकर क्षत्रीय वर्ण वाले होते हैं। प्रश्न 183 - कौन से तीर्थंकर के पांचों कल्याणक एक ही स्थान पर हुए और कहां? उत्तर - चम्पापुर में श्री वासुपूज्य भगवान के। प्रश्न 184 - कौन-से ऐसे तीर्थंकर हैं जिनकी प्रतिमा के चिन्ह मंगलकारी जाने जाते हैं। उत्तर - (1) श्री आदिनाथ भगवान का बैल, (2) श्री अजितनाथ भगवान का हाथी, (7) श्री सुपाश्र्वनाथ का स्वास्तिक, (10) श्री शीतलनाथ का कल्पवृक्ष (17) श्री अरहनाथ की मछली, (19) श्री मल्लिनाथ का कलश, इन तीर्थंकरों के चिन्ह लोक में मंगलकारी जाने जाते हैं। प्रश्न 185 - इस कर्मयुग के अंत में मोक्ष जाने वाले महापुरूष का नाम बताइये। उत्तर - श्री जम्बूस्वामी मथुरा से। प्रश्न 186 - श्री जम्बूस्वामी के बारे में प्रचलित लोकोक्ति क्या है? उत्तर - जम्बूस्वामी मोक्ष गये ताला दे चाबी ले गये। प्रश्न 187 - कौन से तीर्थंकरों के चिन्ह पालतु पशु जीव हैं? उत्तर - (1) श्री आदिनाथ भगवान का बैल, (2) श्री अजितनाथ भगवान का हाथी, (3) श्री सम्भव नाथ जी का घोड़ा, (12) श्री वासूपूज्य जी का भैंसा, (24) श्री कुंथुनाथ जी का बकरा। प्रश्न 188 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिनकी प्रतिमा के चिन्ह पशु हैं। उत्तर - (1) श्री आदिनाथ भगवान का बैल, (2) श्री अजितनाथ भगवान का हाथी, (3) श्री सम्भव नाथ जी का घोड़ा, (4) श्री अभिनन्दन जी का बंदर, (9) श्री पुष्पदंत जी का मगर (11) श्री श्रेयासंसानाथ जी का गैंडा (12) श्री वासुपूज्य जी का भैंसा (13) श्री विमलनाथ जी का सूकर (14) श्री अनंतनाथ जी का सेही (16) श्री शांतिनाथ जी का हिरण (17) श्री कुंथुनाथ जी का बकरा (18) श्री अरहनाथ जी का मछली (20) श्री मुनिसुव्रतनाथ जी का कछुआ (23) श्री पाश्र्वनाथ जी का सर्प एवं (24) श्री महावीर स्वामी का सिंह। प्रश्न 189 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिनकी प्रतिमा के चिन्ह बोझा ढोने वाले पशु हैं? उत्तर - (1) श्री आदिनाथजी का बैल (2) श्री अजितनाथजी का हाथी (3) श्री सम्भवनाथ जी का घोडा एव (12) श्री वासुपूज्य जी का भैंसा। प्रश्न 190 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिनकी प्रतिमा के चिन्ह जल में रहने वाले जीव हैं? उत्तर - (6) श्री पद्मप्रभु का लाल कमल (9) श्री पुष्पदंत जी का सागर (19) श्री अरहनाथजी की मछली (20) श्री मुनिसुव्रत जी का कुछआ (21) श्री नमिनाथजी का नीलकमल। प्रश्न 191 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिनकी प्रतिमा के चिन्ह निर्जीव वस्तुएं हों? उत्तर - (7) श्री सुपाश्र्वनाथ जी का स्वास्तिक (15) श्री धर्मनाथजी का वज्रदंड (16) श्री मल्लिनाथजी का कलश। प्रश्न 192 - उन तीर्थंकर का नाम बताइये जिनकी प्रतिमा का चिन्ह पक्षी है? उत्तर - (5) श्री मुमतिनाथ जी का चकवा। प्रश्न 193 - उन तीर्थंकर का नाम बताइये जिनकी प्रतिमा का चिन्ह ऐसा जीव है जिसके शरीर पर कांटे होते हैं? उत्तर - (14) श्री अनंतनाथ जी की सेही। प्रश्न 194 - ऐसे तीर्थंकर का नाम बताइये जिनकी प्रतिमा का चिन्ह ऐसा जीव है जिसका ऊपर भाग पत्थर के समान कठोर होता है? उत्तर - (20) श्री मुनि सुव्रतनाथ जी का कछुआ। प्रश्न 195 - ऐसे तीर्थकर का नाम बताइये जिनकी प्रतिमा का चिन्ह रेंगने वाला जीव है? उत्तर - (23) श्री पाश्र्वनाथ जी का सर्प प्रश्न 196 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिनकी प्रतिमा के चिन्ह एक इन्द्रीय जीव हो? उत्तर - (6) श्री पद्मप्रभुजी का लाल कमल (10) श्री शीतलनाथ जी का कल्पवृक्ष (21) नमिनाथजी का नीलकमल। प्रश्न 197 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिनकी प्रतिमा के चिन्ह दो इन्द्रीय जीव हों? उत्तर - (22) श्री नेमिनाथजी का शंख। प्रश्न 198 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिनकी प्रतिमा के चिन्ह पंचेन्द्रिय जीव हों? उत्तर - (1) श्री आदिनाथजी का बैल (2) श्री अजितनाथ जी का हाथी (3) श्री सम्भवनाथजी का घोड़ा (4) श्री अभिनंदनजी का बंदर (5) श्री सुमतिनाथ जी का चकवा (9) पुष्पदंत जी का मगर (11) श्रेयांसनाथजी का गैंडा (12) वासुपूज्य जी का भैंसा (13) श्री विमलनाथजी का सूकर (14) श्री अनंतनाथ जी का सेही (16) श्री शांतिनाथजी का हिरण (17) श्री कुंथुनाथजी का बकरा (18) श्री अरहनाथजी का मछली (20) श्री मुनिसुव्रतनाथ का कछुआ (23) श्री पाश्र्वनाथ जी का सर्प एवं (24) श्री महावीरस्वामी का सिंह। प्रश्न 199 - ऐसे तीर्थंकरों के नाम बताइये जिनके पिता बनारस के राजा थे? उत्तर - सातवें श्री सुपाश्र्वनाथ एवं तेइसवें श्री पाश्र्वनाथ जी। प्रश्न 200 - कौन-से तीर्थंकर का समवसरण सबसे बड़ा था और कितना? उत्तर - श्री आदिनाथ जी का समवसरण 12 योजन (96) विस्तृत था। प्रश्न 201 - कौन से तीर्थंकर का समवसरण सबसे छोटा था और कितना? उत्तर - 24वें श्री महावीर स्वामी का समवसरण 1 योजन अर्थात 4 कोश का था। प्रश्न 202 - तीर्थंकरों के लिए वस्त्रादि एवं भोजन की व्यवस्था कहां से होती हैं? उत्तर - तीर्थंकरों के भोजन एवं वस्त्रादि की व्यवस्था स्वर्ग से होती है। प्रश्न 203 - क्या तीर्थकर अपनी माता का दूध पीते हैं? उत्तर - तीर्थंकर अपनी माता का दूध नहीं पीते हैं। प्रश्न 204 - क्या तीर्थंकर अपने माता-पिता को नमस्कार करते हैं? उत्तर - तीर्थंकर अपने माता-पिता केा भी नमस्कार नहीं करते हैं। प्रश्न 205 - श्री सुपाश्र्वनाथ एवं पाश्र्वनाथ जी में किन-किन बातों में समानता पायी जाती है? उत्तर - निम्न बातों में समानता पायी जाती है- 1 - दोनों तीर्थंकरों का गर्भ - जन्म कल्याणक बनारस में हुआ था। 2 - दोनों तीर्थंकरों का हरित श्याम वर्ण था। 3 - दोनों तीर्थंकरों की प्रतिमाओं पर सर्प का फण पाया जाता है। 4 - दोनों तीर्थंकरों का गर्भ, जन्म, तप एवं केवलज्ञान कल्याणक विशाखा नक्षत्र में हुआ था। 5 - दोनों तीर्थंकरों ने पूर्वाण्ह काल में दीक्षा ली थी। 6 - दोनों तीर्थंकरों को मोक्ष सप्तमी तिथि को हुआ था। 7 - दोनों तीर्थंकरों को मोक्ष सम्मेदशिखर से हुआ था। jain temple154 प्रश्न 206 - मिथला नगरी में जन्म लेने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - 19 वें श्री मल्लिनाथ जी एवं 21 वें नमिनाथ जी। प्रश्न 207 - इक्ष्वाकुवंश में जन्म लेने वाले कितने तीर्थंकर थे? उत्तर - सत्रह तीर्थंकर। प्रश्न 208 - इक्ष्वाकु वंश में जन्म लेने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये? उत्तर - (1) श्री आदिनाथ जी से लेकर अनंतनाथजी, शांतिनाथजी, श्री मल्लिनाथ जी, श्री नमिनाथ जी। प्रश्न 209 - कुरूवंश में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने जन्म लिया है? उत्तर - 25वें श्री धर्मनाथजी, 17वें श्री कुंथुनाथजी, 18 वें श्री अरहनाथ जी इन तीन तीर्थंकरों ने कुरू वंश में जन्म लिया है। प्रश्न 210 - यादव वंश में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने जन्म लिया है? उत्तर - 20 वें मुनिसुव्रतनाथ जी एवं 22वे श्री नेमिनाथजी। प्रश्न 211 - उग्र वंश में कौन से तीर्थंकर ने जन्म लिया था? उत्तर - 23वें श्री पाश्र्वनाथ जी ने। प्रश्न 212 - श्री महावीर भगवान ने कौन से वंश में जन्म लिया था? उत्तर - नाथ वंश में। प्रश्न 213 - चैबीसों तीर्थंकरों के कुल कितने गणधर थे? उत्तर - चैबीस तीर्थंकरों के कुल चैदह सौ उनसठ गणधर थे। प्रश्न 214 - गणधर किसे कहते हैं? उत्तर - जो मुनि, भगवान की बारह सभाओं रूपी इन बारह गणों के स्वामी माने जाते हैं वे गणनायक, गणधर, गणपति, विनायक आदि नामों से जाने जाते हैं उन्हें गणधर कहते हैं। प्रश्न 215 - बारह गण कौन-कौन से हैं? उत्तर - भगवान के समवसरा में जो बारह सभायें बारह कोठे होते हैं उन्हें ही बारह गण कहते हैं। प्रश्न 216 - अशोक वृक्ष किसे कहते हैं? उत्तर - तीर्थंकर को जिस वृक्ष के नीचे केवलज्ञान होता है उसे अशोक नाम से जाना जाता है? प्रश्न 217 - अशोक नाम की सार्थकता बताइये। उत्तर - समस्त प्राणियों का शोक हरने से इस वृक्ष का अशोक नाम सार्थक है। jain temple155 प्रश्न 218 - शाल वृक्ष के नीचे कौन-कौन से तीर्थंकरों को केवलज्ञान हुआ है? उत्तर - श्री मुमतिनाथ जी व श्री पद्मप्रभु जी। प्रश्न 219 - पीपल वृक्ष के नीचे कौन-से भगवान को केवलज्ञान हुआ था? उत्तर - श्री अनंतनाथ जी को। प्रश्न 220 - आम्रवृक्ष के नीचे कौन-से तीर्थंकर को केवलज्ञान हुआ था? उत्तर - श्री अरहनाथजी को। प्रश्न 221 - तीर्थंकरों के सबसे अधिक कल्याणक कौन-से महीने में आते हैं और कितने? उत्तर - चैत्र के महीने में सत्रह कल्याणक। प्रश्न 222 - तीर्थंकर के सबसे कम कल्याणक कौन-से महीने में आते और कितने? उत्तर - आश्विन के महीने में केवल तीन कल्याणक। प्रश्न 223 - श्री सुमतिनाथ भगवान के कौन-से तीन कल्याणक एक ही तिथि को हुए हैं? उत्तर - चैत्र शुक्ला ग्यारस को जन्म ज्ञान व मोक्ष कल्याणक। प्रश्न 224 - कौन से तीर्थंकरों के तीन कल्याणक एक ही तिथि को हुए हैं? उत्तर - (1) श्री कुंथुनाथजी के जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक वैशाख शुक्ला प्रतिपदा को हुए हैं। (2) श्री शांतिनाथ जी का जन्म तप एवं मोक्ष कल्याणक ज्येष्ठ चैदस को हुए हैं। (3) श्री सुमतिनाथ जी के जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक चैत्र शुक्ला एकादशी को हुए हैं। प्रश्न 225 - ऐसे तीर्थंकरों के नाम व तिथि बताइये जिनके जन्म व तप कल्याणक एक ही तिथि को हुए हों? jain temple156 उत्तर - नाम तिथि (1) श्री आदिनाथ जी - चैत्र कृष्णा 9 (2) श्री अनंतनाथ जी - ज्येष्ठ कृष्णा 12 (3) श्री सुपाश्र्वनाथ जी - ज्येष्ठ शुक्ला 12 (4) श्री नमिनाथ जी - आषाढ कृष्णा 10 (5) श्री नेमिनाथ जी - श्रावण शुक्ला 6 (6) श्री पद्प्रभु जी - ज्येष्ठ कृष्णा 12 (7) श्री पुष्पदंत जी - मंगसिर शुक्ला 1 (8) श्री मल्लिनाथ जी - मंगसिर शुक्ला 11 (9) श्री चंदा प्रभु जी - पौष कृष्णा 11 (10) श्री पाश्र्वनाथ जी - पौष कृष्ण 11 (11) श्री शीतलनाथ जी - माघ कृष्णा 12 (12) श्री धर्मनाथ जी - माघ शुक्ला 13 (13) श्री श्रेयांसनाथ जी - फाल्गुन कृष्णा 11 (14) श्री वासुपूज्य जी - फाल्गुन कृष्णा 14 प्रश्न 226 - उन तीर्थंकर का नाम बताइये जिनके ज्ञान और मोक्ष कल्याणक एक ही तिथि को हुए हैं। उत्तर - श्री अनंत नाथ जी - चैत्र कृष्णा 30 प्रश्न 227 - उन तीर्थंकर का नाम बताइये जिनका गर्भ व मोक्ष कल्याणक एक ही तिथि को हुआ हो? उत्तर - श्री अभिनंदननाथ जी - बैशाख शुक्ला 6 प्रश्न 228 - वे कौन सी तिथियां हैं जिसमें दो तीर्थंकरों के चार कल्याणक हुए हों? उत्तर - पौष शुक्ला 11 वे चन्द्रप्रभु एवं पाश्र्वनाथ जी के जनम व तप कल्याणक हुए हैं। प्रश्न 229 - वे कौन सी तिथियां हैं जिनमें दो तीर्थंकरों के तीन कल्याणक हुए हैं? उत्तर - 1 - चैत्र कृष्णा 30 श्री अनंतनाथजी के ज्ञान व मोक्ष तथा अरहनाथ भगवान को मोक्ष हुआ था। 2 - मगसिर कृष्णा 1 मल्लिनाथ जी के जन्म व तप तथा नमिनाथ जी को केवलज्ञान हुआ था। 3 - फाल्गुन कृष्णा 1 श्री आदिनाथ जी को केवलज्ञान तथा श्रेयांसनाथ जी का जन्म व तपक ल्याणक हुआ था। प्रश्न 230 - चैबीस तीर्थंकरों के नाम व चिन्हों को बतलाने वाली पद्य बताइये। उत्तर - पद्य निम्न प्रकार है- वृषभ चिन्ह आदीश का हाथी अजित जिनेश। घोड़ा सम्भवनाथ का बन्दर अभिनदेश।।1।। चकतवा सुमति जिनेश का कमल पद्म का जान। स्वास्तिक चिन्ह सुपाश्र्व का चन्द्र चन्द्रप्रभुमान।।2।। पुष्पदंत का मगर है, शीतल कल्पवृक्षांक। गौंड जिन श्रेयांश का वासुपुज्य भैसांक।।3।। शूकरा विमल जिनेश का सेही अनंत जिनेश। धर्मनाथ का बज्र है, हिरन शांति देवेश।।4।ं। बकरा कुन्थु जिनेश का अरहनाथ की मच्छ। मलल्लिनाथ का कलश है, मुनिसुव्रत का कच्छ।।5।। नीलकमल नमिनाथ का, शंख नेमि का मान। पाश्र्वनाथ का सर्प है, सिंह वीर का मान।।6।। प्रश्न 231 - श्री ऋषभदेव की पुत्री ब्राह्मी सुन्दरी ने आर्यिका दीक्षा क्यों ली थी? उत्तर - अगले भव में स्त्री पर्याय को समाप्त करने हेतु तथा परम्परा से मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा से तीव्र वैराग्य भाव धारण कर उन कन्याओं ने आर्यिका दीक्षा ग्रहण की थी। प्रश्न 232 - भगवान ऋषभदेव को प्रथम आहार कितने दिन के उपवास के बाद प्राप्त हुआ था? उत्तर - एक वर्ष 39 दिनों के उपवास के पश्चात्। प्रश्न 233 - महावीर स्वामी ने कितने वर्ष की आयु में दीक्षा ली थी? उत्तर - 30 वर्ष की आयु में। प्रश्न 234 - भगवान महावीर को केवलज्ञान होने के बाद उनकी दिव्यध्वनि कितने दिनों बाद खिरी थी? उत्तर - 66 दिन बाद श्रावण्या बदी एकम को उनकी दिव्यध्वनि खिरी थी। प्रश्न 235 - चैबीस तीर्थंकरों की निर्वाणभूमि के क्या नाम हैं? उत्तर - कैलाशपर्वत, चंपापुरी, पावापुरी, गिरनार और सम्मेद शिखर पर्वत से निर्वाण प्राप्त किया है। प्रश्न 236 - वह तिथि बताइये जिनमें विभिन्न तीर्थंकरों के दो कल्याणक हुए हैं। उत्तर - फाल्गुन कृष्णा 7 को श्री सुपाश्र्वनाथ तथा चन्दाप्रभु भगवान को केवलज्ञान हुआ था। प्रश्न 237 - कौन से तीर्थंकर ने पूर्व भव में कौवे के मांस का त्याग किया था? उत्तर - भगवान श्री महावीर स्वामी के जीव ने। प्रश्न 238 - कौन से तीर्थंकर का भाई कमठ था? उत्तर - भगवान श्री पाश्र्वनाथ का भाई कमठ था। प्रश्न 239 - कौन से तीर्थकर शाकाहार धर्म के प्रवर्तक थे? उत्तर - श्री आदिनाथ जी। प्रश्न 240 - कौन से तीर्थंकर ने जैन धर्म चलाया था? उत्तर - जैन धर्म अनादिनिधन है किसी तीर्थंकर ने नही चलाया। तीर्थंकर धर्म का उपदेश देते हैं। प्रश्न 241 - कौन से तीर्थंकर को बंधे हुए पशुओं को देखकर वैराग्य हुआ था ? उत्तर - भगवान श्री नेमिनाथ को। प्रश्न 242 - कौन से तीर्थंकर को क्षमा में अग्रणीय माना जाता है? उत्तर - भगवान पाश्र्वनाथ को। प्रश्न 243 - कौन से तीर्थंकरों को उल्कापात देखकर वैराग्य हुआ था? उत्तर - चार तीर्थंकरों को- 1 - श्री अजितनाथ जी 2 - श्री पुष्पदंत जी 3 - श्री अनंतनाथ जी 4 - श्री धर्मनाथ जी। प्रश्न 244 - कौन से तीर्थंकरों को जाति स्मरण से वैराग्य हुआ था? उत्तर - नौ तीर्थंकरों को जाति स्मरण से वैराग्य हुआ था- (1) श्री सुमतिनाथ जी , (2) श्री पद्मप्रभु जी , (3) श्री वासुपूज्य जी , (4) श्री शांतिनाथ जी , (5) श्री कुंथुनाथ जी , (6) श्री मुनि सुव्रतनाथजी , (7) श्री नेमिनाथ जी , (8) श्री पाश्र्वनाथ जी , (9) श्री महावीर स्वामी। प्रश्न 245 - अनित्यादि भावनाओं के चिंतवन से कौन से तीर्थंकरों को वैराग्य हुआ था? उत्तर - दो तीर्थंकरों को- (1) श्री चन्द्रप्रभु जी एवं , (2) श्री मल्लिकानाथ जी। प्रश्न 246 - मेघों का नाश देखने से कौन-से तीर्थंकरों को वैराग्य हुआ था? उत्तर - तीन तीर्थंकरों को- (1) श्री सम्भवनाथ जी , (2) श्री विमलनाथ जी , (3) श्री अरहनाथ जी। प्रश्न 247 - बसंत लक्ष्मी का नाश देखकर वैराग्य प्राप्त करने वाले तीर्थंकर कौन-कौन से हैं? उत्तर - दो तीर्थंकर- (1) श्री सुपाश्र्वनाथ जी , (2) श्री श्रेयांस नाथ जी। प्रश्न 248 - गंधर्वनगर का नाश देखकर कौन-से तीर्थंकर को वैराग्य हुआ था? उत्तर - श्री अभिनंदननाथ जी को। प्रश्न 249 - कौन से तीर्थंकर की दिव्य ध्वनि 66 दिन बाद खिरी? उत्तर - भगवान महावीर की। प्रश्न 250 - मानस्तम्भ को देखकर किसका मान गलित हुआ था? उत्तर - भगवान महावीर स्वमी के समवसरण को देखकर इन्द्रभूति गौतम का मान गलित हुआ था। प्रश्न 251 - सभी धर्मों के आराध्य तीर्थंकर कौन-से हैं और कैसे? उत्तर - भगवान श्री आदिनाथ जी इस्लाम धर्म में आदम बाबा, वैदिक धर्म में अष्टम अवतार तथा जैन धर्म में प्रथम अवतार माने हैं। jain temple158 प्रश्न 252 - सबसे अधिक तप कौन-से तीर्थंकर ने किया था कितना? उत्तर - भगवान श्री आदिनाथ ने एक हजार वर्ष तक। प्रश्न 253 - सबसे कम तप कौन-से तीर्थंकर ने किया और कितना? उत्तर - भगवान श्री मल्लिनाथ जी ने केवल 6 दिन तक। प्रश्न 254 - भगवान बाहुबली ने कितना तप किया? उत्तर - 1 वर्ष तक। प्रश्न 255 - भरत चक्रवर्ती ने कितना तप किया? उत्तर - अन्तमुहूर्त तक। प्रश्न 256 - भगवान पाश्र्वनाथ के केवलज्ञान क्षेत्र को अहिक्षत्र क्यों कहते हैं? उत्तर - क्योंकि धरणेन्द्र पद्मावती ने कमठ उपर्सग निवारण करने के लिए अहि अर्थात नाग का छत्र भगवान के ऊपर लगाया था इसीलिए इस स्थान को अहिछत्र कहते हैं। प्रश्न 257 - कौन-कौन से तीर्थंकर ने रोहणी नक्षत्र में गर्भ धारण किया? उत्तर - श्री आदिनाथ जी, अजितनाथ जी दो तीर्थंकरों ने। प्रश्न 258 - श्रवण नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने गर्भ धारण किया? उत्तर - श्री श्रेयांसनाथ जी, श्री मुनिसुव्रतनाथ जी इन दो तीर्थंकरों ने। प्रश्न 259 - रेवती नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने गर्भधारण किया? उत्तर - तीन तीर्थंकरों ने, श्री अनंतनाथ जी, श्री धर्मनाथ जी, श्री अरहनाथ जी। प्रश्न 260 - अश्वनी नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने गर्भ धारण किया? उत्तर - श्री मल्लिनाथजी, श्री नमिनाथजी इन दो तीर्थंकरों ने। प्रश्न 261 - विशाखानक्ष में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने गर्भ धारण किया? उत्तर - श्री सुपाश्र्वनाथजी, श्री पाश्र्वनाथ जी इन दो तीर्थंकरों ने। प्रश्न 262 - उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने गर्भ धारण किया? उत्तर - नेमिनाथ जी, श्री महावीर स्वामी जी इन दो तीर्थंकरों ने। प्रश्न 263 - कौन से तीर्थंकर सर्वार्थ सिद्धि से गर्भ में आये? उत्तर - श्री आदिनाथजी, श्री धर्मनाथजी, श्री शांतिनाथजी, श्री कुंथुनाथजी। प्रश्न 264 - विजय नाम के पहले अनुत्तर विमान से कौन-कौन से तीर्थंकरा गर्भ में आये। उत्तर - श्री अजितनाथ जी, श्री अभिनंदननाथजी। प्रश्न 265 - पुष्पोत्तर विमान से कौन-कौन से तीर्थंकर गर्भ में आये? उत्तर - श्री श्रेयांसनाथजी, श्री अनंतनाथजी। प्रश्न 266 - चैथे अपराजित अनुत्तर विमान से कौन-कौन से तीर्थंकर गर्भ में आये? उत्तर - श्री अरहनाथजी, श्री मल्लिनाथजी, श्री नमिनाथजी, श्रीनेमिनाथ ये चार तीर्थंकर। प्रश्न 267 - रोहिणी नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों का जन्म हुआ? उत्तर - (1) श्री अजितनाथ जी , (2) श्री अरहनाथ जी। प्रश्न 268 - चित्रा नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों का जन्म हुआ? उत्तर - (1) श्री पद्मप्रभुजी , (2) श्री नेमिनाथजी। jain temple159 प्रश्न 269 - विशाखा नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों का जन्म हुआ? उत्तर - (1) श्री सुपाश्र्वनाथ जी , (2) श्री वासुपूज्य जी , (3) श्री पाश्र्वनाथजी, इन तीन तीर्थंकरों का। प्रश्न 270 - श्रवण नक्षत्र में कौन से तीर्थंकरों ने जन्म लिया? उत्तर - (1) श्री श्रेयांस नाथजी , (2) श्री मुनिसुव्रतनाथजी। प्रश्न 271 - कितने तीर्थंकरों ने इक्ष्वांकु वंश में जन्म धारण किया? उत्तर - सोलह तीर्थंकरों ने। प्रश्न 272 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिन्होंने इक्ष्वाकु वंश में जन्म धारण किया? उत्तर - पहले श्री आदिनाथ जी से लेकर चैदहवें अनंतनाथ जी तक 14 तीर्थंकरा, (14) श्री मल्लिनाथजी , (16) नमिनाथ जी। प्रश्न 273 - कुरू वंश में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने जन्म लिया? उत्तर - (1) श्री धर्मनाथ जी , (2) श्री कुंथुनाथजी , (3) श्री अरहनाथजी ने। प्रश्न 274 - यादव वंश में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने जन्म लिया? उत्तर - श्री मुनिसुव्रतनाथजी, श्री नेमनाथजी ने। प्रश्न 275 - चित्रा नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने दीक्षा ग्रहण की? उत्तर - छठवें पद्मप्रभु जी, बाइसवें श्री नेमिनाथ जी ने। प्रश्न 276 - विशाखा नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने दीक्षा ली? उत्तर - सातवें श्री सुपाश्र्वनाथजी, बारहवें श्री विमलनाथ जी, तेइसवें श्री पाश्र्वनाथ जी ने। प्रश्न 277 - अनुराधा नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने दीक्षा ली? उत्तर - आठवें श्री चन्दा प्रभु जी, नौवें पुष्पदंत जी ने। प्रश्न 278 - श्रवण नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने दीक्षा ली? उत्तर - ग्यारहवें श्री श्रेयांसनाथजी, बीसवें श्री मुनिसुव्रतनाथजी ने। jain temple160 प्रश्न 279 - रेवती नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने दीक्षा ली? उत्तर - चैदहवें श्री अनंतनाथजी, अठारहवें श्री अरहनाथ जी ने। प्रश्न 280 - अश्वनी नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने दीक्षा ली? उत्तर - उन्नीसवें श्री मल्लिकानाथ जी, इक्कीसवें श्री नमिनाथ जी ने। प्रश्न 281 - सहेतुक वन में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने दीक्षा ली? उत्तर - दूसरे श्री अजितनाथ जी, तीसरे श्री अभिनंदन नाथ जी, पांचवें श्री सुमतिनाथजी, सातवें श्री सुपाश्र्वनाथजी, दसवें श्री शीतलनाथ जी, तेरहवें श्री विमलनाथ जी, चैदहवें श्री अनंतनाथ जी, सत्रहवें श्री कुंथुनाथ जी, अठारहवें श्री अरहनाथ जी ने। प्रश्न 282 - मनोहर वन में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने दीक्षा ली? उत्तर - छटवें श्री पद्मप्रभु जी, ग्यारहवें श्री शीतलनाथ जी, बाहरवें श्री वासुपूज्य जी ने। प्रश्न 283 - शाल वन में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने दीक्षा ली? उत्तर - पन्द्रहवें श्री धर्मनाथ जी, उन्नीसवें श्री मल्लिनाथ जी ने। प्रश्न 284 - कितने तीर्थंकरों को जाति स्मरण से वैराग्य हुआ था? उत्तर - दस तीर्थंकरों को। प्रश्न 285 - उन तीर्थकरों के नाम बताओ जिन्हें जाति-स्मरण से वैराग्य हुआ था? jain temple161 उत्तर - 1 - पांचवें श्री सुमतिनाथजी 2 - छठवें श्री पद्मप्रीाु जी 3 - बारहवें श्री वासुपूज्य जी 4 - सोलहवें श्री शांतिनाथ जी 5 - स्वत्रहवें श्री कुंथुनाथ जी 6 - बीसवें श्री मुनिसुव्रत जी 7 - इक्कीसवें श्री नमिनाथ जी 8 - बाइसवें श्री नेमनाथ जी 9 - तेइसवें श्री पाश्र्वनाथ जी 10 - चैबीसवें श्री वर्द्धमान जी। प्रश्न 286 - उन तीर्थंकारों के नाम बताइये जिन्हें बसंत वन लक्ष्मी के नाश से वैराग्य हुआ था? उत्तर - सातवें श्री सुपाश्र्वनाथ जी, ग्यारहवें श्री श्रेयांसनाथजी ने। प्रश्न 287 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिन्हें अधुवादि भावना से वैराग्य हुआ था? उत्तर - (1) आठवें श्री चंदा प्रभू जी , (2) उन्नीसवें श्री मल्लिनाथ जी। प्रश्न 288 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिन्हें बिजली गिरने (उल्कापात) से वैराग्य हुआ था? उत्तर - (1) नौवें श्री पुष्पदंत जी , (2) चैदहवें श्री अनंतनाथ जी (3) पन्द्रहवें श्री धर्मनाथ जी। प्रश्न 289 - मेघनाश से कौन-कौन से तीर्थंकरों को वैराग्य हुआ था? उत्तर - 1 - तीसरे श्री सम्भवनाथ जी 2 - तेरहवें श्री विमलनाथ जी 3 - अठारहवें श्री अरहनाथ जी को। प्रश्न 290 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिन्होंने अपराह्न काल में दीक्षा धारण की? उत्तर - (1) प्रथम श्री आदिनाथ जी , (2) दूसरे श्री अजितनाथ जी , (3) तीसरे श्री सम्भवनाथ जी , (4) छठे श्री पद्मप्रभु जी , (5) आठवें श्री चंदा प्रभू जी , (6) नोवें श्रीपुष्पदंत जी , (7) दसवें श्री शीतलनाथ जी , (8) बारहवें श्री वासुपूज्य जी , (9) तेरहवे श्री विमलनाथ जी , (10) चैदहवें श्री अनंतनाथ जी , (11) पन्द्रहवें श्री धर्मनाथ जी , (12) सोलहवें श्री शांतिनाथ जी , (13) सत्रहवें श्री कुंथुनाथ जी , (14) अठारहवें श्री अरहनाथ जी , (15) बीसवें श्री मुनिसुव्रत जी , (16) इक्कीसवें श्री नमिनाथ जी , (17) बाइसवें श्री नेमिनाथ जी , (18) चैबीसवें श्री महावीर स्वामी जी। , प्रश्न 291 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिन्होंने पूर्वाह्न काल में दीक्षा ली? उत्तर - (1) चैथे श्री अभिनंदननाथ जी , (2) पांचवें श्री सुमतिनाथजी , (3) सातवें श्री सुपाश्र्वनाथ जी , (4) ग्यारहवें श्री श्रेयांसनाथ जी , (5) श्री उन्नीसवें श्री मल्लिनाथ जी , (6) तेइसवें श्री पाश्र्वनाथ जी। प्रश्न 292 - कौन से तीर्थंकर ने अकेले दीक्षा ली। उत्तर - श्री महावीर स्वामी ने। प्रश्न 293 - चार हजार राजाओं के साथ कौन-से तीर्थंकर ने दीक्षा ली? उत्तर - भगवान श्री आदिनाथ ने। प्रश्न 294 - एक हजार राजाओं के साथ कितने तीर्थंकरों ने दीक्षा ली? उत्तर - उन्नीसवें तीर्थंकरों ने। प्रश्न 295 - उन तीर्थंकरों के नाम बताइये जिन्होंने एक हजारा राजाओं के साथ दीक्षा ली? उत्तर - श्री अजितनाथ से श्रेयांसनाथ तक, श्री विमलनाथ से अरहनाथ तक, श्री मुनिसुव्रतनाथ से नेमिनाथ तक सभी तीर्थंकरों ने। प्रश्न 296 - तीन सौ राजाओं के साथ कौन-कौन से तीर्थंकरों ने दीक्षा ली? उत्तर - (1) उन्नीसवें श्री मल्लिनाथ जी (2) तेइसवें श्री पाश्र्वनाथ जी। प्रश्न 297 - सबसे अधिक तपस्या कौन से तीर्थंकर ने की? उत्तर - श्री आदिनाथ जी ने एक हजार वर्ष तक। jain temple162 प्रश्न 298 - सबसे कम तपस्या कौन-से तीर्थंकर ने की। उत्तर - श्री मल्लिनाथ जी ने छः दिन तक। प्रश्न 299 - तीन वर्ष तक तपस्या करने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - श्री शीतलनाथ जी, श्री विमलनाथ जी। प्रश्न 300 - सोलह वर्ष तक तप करने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - श्री शांतिनाथ जी, श्री कुंथुनाथ जी, श्री अरहनाथ जी। प्रश्न 301 - बारह वर्ष तक तपकरने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - श्री अजितनाथ जी, श्री महावीर स्वामी। प्रश्न 302 - एक दीक्षोपवास कौन-से तीर्थंकर ने किया था? उत्तर - भगवान श्री वासुपूज्य ने। प्रश्न 303 - तीन दीक्षोपवास करने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - श्री सम्भवनाथ जी, श्री अभिनंदननाथ जी, श्री सुमतिनाथ जी, श्री चंदाप्रभू जी, श्री शीतलनाथ जी, श्री विमलनाथ जी, श्री शांतिनाथ जी, श्री मुनिसुव्रतनाथ जी। प्रश्न 304 - तीन भक्त करने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - श्री पद्मप्रभु जी, श्री सुपाश्र्वनाथ जी, श्री पुष्पदंत जी, श्री श्रेयांसनाथ जी, श्री अनंतनाथ जी, श्री धर्मनाथ जी, श्री कुंथुनाथ जी, श्री अरहनाथ जी, श्री नमिनाथ जी, श्री नेमिनाथ जी, श्री महावीर स्वामी जी। प्रश्न 305 - षष्ठोपवास करने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - श्री आदिनाथ जी। प्रश्न 306 - षष्ठ भक्त करने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - श्री अरहनाथ जी, श्री पाश्र्वनाथ जी। प्रश्न 307 - अष्टम भक्त करने वाले तीर्थंकर का नाम बताइये। उत्तर - श्री अजितनाथ जी। प्रश्न 308 - कौन-कौन से तीर्थंकरों को पूर्वाह्न काल में केवलज्ञान हुआ? उत्तर - श्री आदिनाथ जी, श्री मुनिसुव्रतनाथ जी, श्री नेमिनाथ जी, श्री पाश्र्वनाथ जी, श्री वर्धमान जी। प्रश्न 309 - अपराह्न काल में केवलज्ञान प्राप्त करने वाले कौन-से तीर्थंकर थे? उत्तर - श्री अजितनाथ से मल्लिनाथ तक 18 तीर्थंकर तथा श्री नमिनाथ जी ऐसे उन्नीस तीर्थंकरों को उपराह्न काल में केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। प्रश्न 310 - सहेतुकवन में केवलज्ञान प्राप्त करने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - श्री अजितनाथ जी, श्री सम्भवनाथ जी, श्री सुमतिनाथ जी, श्री सुपाश्र्वनाथ जी, श्री शीतलनाथ जी, श्री विमलनाथ जी, श्री अनंतनाथ जी, श्री धर्मनाथ जी, श्री कुंथुनाथ जी, श्री अरहनाथ जी, इन दश तीर्थंकरों को सहेतुक वन में केवलज्ञान हुआ था। प्रश्न 311 - मनोहर वन में केवल ज्ञान प्राप्त करने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - श्री पद्मप्रभु जी, श्री श्रेयांसनाथ जी, श्री वासुपूज्य जी, श्री मल्लिनाथ जी। प्रश्न 312 - उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में केवलज्ञान प्राप्त करने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - श्री आदिनाथ जी, श्री विमलनाथ जी। प्रश्न 313 - चित्रानक्षत्र में कौन-से तीर्थंकर को केवलज्ञान हुआ था? उत्तर - श्री पद्मप्रभु जी, श्री नेमिनाथ जी। प्रश्न 314 - विशाखा नक्षत्र में कौन-कौन से तीर्थंकरों को केवलज्ञान हुआ था? उत्तर - श्री सुपाश्र्वनाथ जी, श्री वासुपूज्य जी, श्री पाश्र्वनाथ जी। प्रश्न 315 - श्रवण नक्षत्र में केवलज्ञान प्राप्त करने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। jain temple164 उत्तर - श्री श्रेयांसनाथ जी, श्री मुनिसुव्रतनाथ जी। प्रश्न 316 - रेवती नक्षत्र में कौन से तीर्थंकरों को केवलज्ञान हुआ था? उत्तर - श्री अनंतनाथ जी तथा श्री अरहनाथ जी को। प्रश्न 317 - अश्वनी नक्षत्र में केवलज्ञान प्राप्त करने वाले कौन से तीर्थंकर थे? उत्तर - श्री मल्लिनाथ जी, एवं श्री नमिनाथ जी। प्रश्न 318 - शाल वृक्ष के नीचे कौन-से तीर्थंकर को केवलज्ञान हुआ था? उत्तर - श्री सम्भव नाथ जी एवं श्री महावीर भगवान को। प्रश्न 319 - प्रियंगु वृक्ष के नीचे कौन-से तीर्थंकर को केवलज्ञान हुआ था? उत्तर - श्री सुमतिनाथ जी एवं श्री पद्मप्रभु जी को। प्रश्न 320 - अशोक वृक्ष के नीचे कौन से तीर्थंकर ने केवलज्ञान प्राप्त किया? उत्तर - श्री मल्लिनाथ जी ने। प्रश्न 321 - पूर्वाह्न काल में कितने तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया था? उत्तर - आठ तीर्थंकरों ने। प्रश्न 322 - पूर्वाह्न काल में कौन-कौन से तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया? उत्तर - (1) श्री आदिनाथ जी , (2) श्री अजितनाथ जी , (3) श्री अभिनंदननाथ जी , (4) श्री सुमतिनाथ जी , (5) सुपाश्र्वनाथ जी , (6) श्री चंदाप्रभु जी , (7) श्री शीतलनाथ जी , (8) श्री श्रेयांसनाथ जी ने। प्रश्न 323 - अपराह्न काल में कितने तीर्थंकर मोक्ष गये? उत्तर - चार तीर्थंकर। प्रश्न 324 - उपराह्न काल में मोक्ष प्राप्त करने वाले कौन-कौन से तीर्थंकर थे? उत्तर - श्री सम्भवनाथ जी, श्री पद्मप्रभु जी, श्री पुष्पदंत जी, श्री वासुपूज्य जी। प्रश्न 325 - प्रदोष काल में कितने तीर्थंकर मोक्ष गये? उत्तर - आठ तीर्थंकर। प्रश्न 326 - प्रदोषकाल में मोक्ष जाने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री विमलनाथ जी , (2) श्री अनंतनाथ जी , (3) श्री शांतिनाथ जी , (4) श्री कुंथुनाथ जी , (5) श्री मल्लिनाथ जी , (6) श्री मुनिसुव्रतनाथ जी , (7) श्री नेमनाथ जी , (6) श्रीपाश्र्वनाथ जी। प्रश्न 327 - प्रत्यूष अर्थात् ऊषाकाल में कितने तीर्थंकर मोक्ष गये? उत्तर - चार तीर्थंकर। प्रश्न 328 - चारों तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - 1. श्री धर्मनाथ जी , 2. श्री अरहनाथ जी , 3. श्री नमिनाथ जी , 4. श्री वीर जी। प्रश्न 329 - भरणीनक्षत्र में मोक्षगामी तीर्थंकरों के नाम बताइये? उत्तर - श्री अजितनाथ, श्री शांतिनाथ जी, श्री मल्लिनाथ जी। प्रश्न 330 - ज्येष्ठा नक्षत्र में मोक्षगामी तीर्थंकरों के नाम बताओ। उत्तर - (1) श्री सम्भवनाथ जी , (2) श्री चंदाप्रभु जी। प्रश्न 331 - चित्रा नक्षत्र में मोक्ष प्राप्त करने वाले तीर्थंकरों के नाम बताओ। उत्तर - श्री पद्मप्रभु जी एवं श्री नेमिनाथ जी। प्रश्न 332 - अश्वनी नक्षत्र में मोक्ष जाने वाले तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - श्री वासुपूज्य जी, श्री नमिनाथ जी। प्रश्न 333 - पुष्य नक्षत्र में मोक्ष जाने वाले तीर्थंकरों के नाम क्या हैं? उत्तर - श्री धर्मनाथ जी। प्रश्न 334 - कितने तीर्थंकरों एक हजार मुनियों के साथ मोक्ष गये? उत्तर - बारह तीर्थंकर प्रश्न 335 - कौन-कौन से तीर्थंकर एक हजार मुनियों के साथ मोक्ष गये? उत्तर - श्री अजितनाथ जी से सुमतिनाथ जी तक सभी। चंदाप्रभु जी से लेकर श्रेयांसनाथ तक सभी, श्री कुंथुनाथ जी, श्री अरहनाथ जी, श्री मुनिसुव्रतजी, श्री नमिनाथ जी। प्रश्न 336 - पांच सौ मुनियों के साथ मोक्ष जाने वाले कौन-से तीर्थंकर थे? उत्तर - श्री सुपाश्र्वनाथ जी, श्री मल्लिकानाथ जी। प्रश्न 337 - कौन से तीर्थंकर अकेले मोक्ष गये? उत्तर - श्री महावीर स्वामी। प्रश्न 338 - एक महीने पहले भोग निवृत्ति कौन से तीर्थंकरों की हुई? उत्तर - श्री अजितनाथ से लेकर पाश्र्वनाथ तक सभी की। प्रश्न 339 - चैदह दिन पूर्व भोग निवृत्ति कौन-से तीर्थंकर की हुई थी? उत्तर - श्री आदिनाथ जी की। प्रश्न 340 - दो दिन पूर्व भोगवृत्ति वाले तीर्थंकर कौन थे? उत्तर - श्री महावीर भगवान।
।। नव देवता ।। प्रश्न 1 - नव देवता कौन-कौन से हैं? उत्तर - 1 - अरिहंत , 2 - सिद्ध , 3 - आचार्य , 4 - उपाध्याय , 5 - साधु , 6 - जिनधर्म , 7 - जिन चैत्य एवं जिन चैत्यालय jain temple136 प्रश्न 2 - जिन धर्म किसे कहते हैं? उत्तर - जिनेन्द्र भगवान की ध्वनि (वाणी) को जिन धर्म कहते हैं। प्रश्न 3 - जिन आगम किसे कहते हैं? उत्तर - भगवान की वाणी के अनुसार गणधर एवं आचार्यों के वचनों के अनुसार जिन शास्त्रों की रचना होती है। उन शास्त्रों को जिनआगम कहते हैं। प्रश्न 4 - जिन आगम को कितने भागों में विभाजित किया गया है? उत्तर - वैसे तो जिन आगम को ग्यारह अंगों तथा चैदह पूर्वों में विभाजित किया गया है। फिर भी चार अनुयोगों में भी जिनागम को कहा गया है। प्रश्न 5 - जिन चैत्य किसे कहते हैं? उत्तर - जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा को जिन चैत्य कहते हैं। प्रश्न 6 - जिन चैत्यालय किसे कहते हैं? उत्तर - जिन प्रतिमा जिस स्थान पर रहती है उस स्थान को चैत्यालय कहते हैं। प्रश्न 7 - जिन चैत्यालय के कुछ अन्य नाम बताइये। उत्तर - घर वाचक शब्दों के आगे जिन शब्द जोड़ देने से जिन सदन चैत्यालय के नाम बन जाते हैं जैसे - जिनगृह, जिन सदन, जिन चैत्यालय, जिन मंदिर, जिन भवन, जिन गेह, जिन आलय आदि। प्रश्न 8 - जिन चैत्यालय कितने प्रकार के होते हैं? उत्तर - अकृत्रिम शास्वत जिनालय, देवकृत जिलानय एवं मानव निर्मित जिनालय इस प्रकार जिन चैत्यालय तीन प्रकार के होते हैं? प्रश्न 9 - अकृत्रिम जिनालय कहां-कहां हैं? उत्तर - तीनों लोकों में अकृत्रिम जिनालय हैं। प्रश्न 10 - तीनों लोकों में कितने अकृत्रिम जिनालय माने गये हैं? उत्तर - तीनों लोकों में आठ करोड़ छप्पन लाख सतानवे हजार चार सौ इक्यासी अकृत्रिम जिन मंदिर हैं। प्रश्न 11 - तीनों लोकों के अकृत्रिम जिनमन्दिरों में प्रतिमाओं की संख्या कितनी है? उत्तर - तीनों लोकों में नौ सौ पच्चीस करोड़ त्रेपनलाख सत्ताइस हजार नौ सौ अड़तालिस जिन प्रतिमायें हैं। प्रश्न 12 - प्रत्येक अकृत्रिम जिनालय में कितनी प्रतिमायें होती हैं? उत्तर - प्रत्येक अकृत्रिम जिनालय में एक सौ आठ जिन प्रतिमायें होती हैं। jain temple137 प्रश्न 13 - अकृत्रिम प्रतिमाओं का क्या प्रमाण है? उत्तर - अकृत्रिम जिनालयों में पांच सौ धनुष ऊंची पद्मासन प्रतिमायें विराजमान रहती हैं। प्रश्न 14 - पांच सौ धनुष में कितने हाथ होते हैं? उत्तर - पांच सौ धनुष में दो हजार हाथ होते हैं। प्रश्न 15 - अकृत्रिम जिनालयों में कौन-से भगवान की प्रतिमायें विराजमान रहती हैं? उत्तर - अकृत्रिम जिनालयों में विराजमान प्रतिमाओं को सिद्ध संज्ञा क्यों है? प्रश्न 16 - अकृत्रिम जिनालयों में विराजमान प्रतिमओं को सिद्ध संज्ञा क्यों है? उत्तर - क्योंकि ये प्रतिमायें अनादि निधन शाश्वत सिद्ध हैं कभी किसी ने बनाई नहीं कभी नष्ट भी नहीं होगी। इसीलिए उन्हें सिद्ध संज्ञा है। प्रश्न 17 - अकृत्रिम मंदिर किसे कहते हैं? उत्तर - जो मन्दिर अनादि काल से बने हुए हैं अनंत काल तक रहेंगे कभी किसी ने उन्हें बनाया नहीं उन्हें अकृत्रिम जिनालय कहते हैं। प्रश्न 18 - अधो लोक में अकृत्रिम जिन मंदिरों की संख्या सताइये। उत्तर - अधो लोक में सात करोड़ बहत्तर लाख जिन मंदिर हैं जो भवनवासी देवों के हैं। प्रश्न 19 - पाताल (अधोलोक) में जिन प्रतिमाओं की संख्या बताइये। उत्तर - अधो लोक में आठा अरब तैंतीस करोड़ छियत्तर लाख जिन बिम्ब विराजमान हैं। प्रश्न 20 - मध्यलोक में कितने अकृत्रिम जिनालय हैं? उत्तर - मध्यलोक में चार सौ अट्ठावन अकृत्रिम जिनालय है। प्रश्न 21 - मध्यलोक में ये जिनालय कहां तक फैले हुए हैं? उत्तर - मध्यलोक में ये चार सौ अट्ठावन जिनालय तेरह द्वीपों तक फैले हुए हैं। प्रश्न 22 - जम्बूद्वीप में कितने अकृत्रिम जिनालय हैं। उत्तर - जम्बूद्वीप में अट्ठत्तर अकृत्रिम जिनालय हैं। प्रश्न 23 - जम्बूद्वीप में अठत्तर जिनालय किस प्रकार हैं? उत्तर - जम्बूद्वीप में अठत्तर जिनालययों की गणना निम्न प्रकार है- सुमेरू पर्वत के 16, गजदन्तों के 4, जम्बूशाल्मलि वृक्ष के 2, वक्षार पर्वतों के 16, विजयार्ध पर्वतों के 34, तथाा छः कुलाचलों के 6 इस प्रकार जम्बूद्वीप में कुल 78 जिनालय होते हैं। प्रश्न 24 - घातकी खंड में कुल कितने जिनालय होते हैं? उत्तर - घात की खंड में कुल 158 जिनालय होते हैं। jain temple138 प्रश्न 25 - घात की खंड में 158 जिनालय किस प्रकार हैं? उत्तर - घातकी खंड में 2 मेरू हैं विजय मेरू एवं अचल मेरू एक मेरू सम्बंधित 78 जिनालय होते हैं; अतः दो मेरूओं के 156 जिनालय हुए तथा दो जिनालय इष्वाकार पर्वतों के होते हैं। प्रश्न 26 - पुष्करवर द्वीप में कितने जिनालय हैं? उत्तर - तीसरे पुष्करार्ध द्वीप में भी घातकी खंड द्वीप के समान 158 अकृत्रिम जिनालय हैं। प्रश्न 27 - मानषोत्तर पर्व पर कितने जिनालय होते हैं? उत्तर - मानषोत्तर पर्व की चारों दिशाओं में एक-एक जिनालय कुल चार जिनालय हैं। प्रश्न 28 - नंदीश्वर द्वीप में कितने अकृत्रिम जिनालय होते हैं? उत्तर - नंदीश्वर द्वीप की चारों दिशाओं 13, 13 के हिसाब से 13 गुण 4 = कुल बावन जिनालय होते हैं। प्रश्न 29 - नंदीश्वर द्वीप के जिनालयों की गणना किस प्रकार की जाती है? उत्तर - नंदीश्वर द्वीप की एक दिशा के जिनालयों की गणना इस प्रकार है। 1 अंजन गिरी, 4 रतिकर एवं 8 दधि मुख पर्वतों पर प्रत्येक पर एक-एक जिन मंदिर विराजमान है। इस प्रकार 1 दिशा में 13 जिनालय हैं। इसी प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण प्रत्येक दिशा में 13-13 जिन मंदिर हैं कुछ 52 जिन मंदिर नंदीश्वर द्वीप में हैं। प्रश्न 30 - कुंडलगिरि पर्वत पर कितने अकृत्रिम जिनमन्दिर हैं? उत्तर - कुंडलगिरि पर्वत पर केवल चार जिनालय हैं। प्रश्न 31 - रूचक गिरि पर्वत पर कुल कितने जिनालय हैं? उत्तर - रूचकगिरि पर भी केवल चार जिनालय हैं। प्रश्न 32 - मध्यलोक के चार सौ अट्ठावन जिन मंदिरों की गणना कराइये। उत्तर - जम्बूद्वीप में 78, पूर्व धातकी द्वीप में 78, पश्चिम धातकी द्वीप में 78, इष्वाकार के 2, पूर्व पुष्करार्ध के 78, पश्चिम पुष्करार्ध के 78, इष्वाकार के 2, मानषोत्तर पर्वत के 4, नंदीश्वर द्वीप के 52, कुंडलगिरि के 4, रूचक गिरी के 4, कुल 458 जिन मंदिर। प्रश्न 33 - मेरू पर्वत किसे कहते हैं? उत्तर - जो पर्वत मध्य में विराजमान रहते हैं उन्हें मेरू पर्वत कहते हैं। प्रश्न 34 - मेरू पर्वतों की विशेषता बताइये। उत्तर - मेरू पर्वतों की सर्वोच्च पांडुक वन में जो अर्ध चन्द्रकार पांडुक शिालायें हैं उन पर पांच पांच ऐरावत एवं एक सौ साठ विदेह क्षेत्रों में जन्में तीर्थंकरों का जन्माभिषेक देवों द्वारा होता है। प्रश्न 35 - मेरू पर्वत कितने हैं? उत्तर - मेरू पर्वत पांच हैं। प्रश्न 36 - कौन-सा मेरू पर्वत कहां कहां स्थित है? उत्तर - सुदर्शन मेरू पर्वत जम्बूद्वीप में, विजय मेरू पर्वत पूर्वी धातकी द्वीप में, अचल मेरू पश्चिम धातकी द्वीप में, मन्दर मेरू पूर्वी पुष्करार्धद्वीप में, एवं विद्युन्माली मेरू पश्चिम पुष्करार्ध द्वीप में स्थित है। jain temple139 प्रश्न 37 - एक मेरू से सम्बंधित कितने जिनालय होते हैं? उत्तर - एक मेरू से सम्बन्धित 78 जिनालय होते हैं। प्रश्न 38 - ढाई द्वीप में कितने जिनालय हैं। उत्तर - ढाई द्वीप में 398 जिनालय हैं। प्रश्न 39 - अधोलोक में असुर कुमार देवों के कितने जिनालय हैं? उत्तर - अधोलोक में असुर कुमार देवों के चैसठ लाख जिनालय हैं। प्रश्न 40 - नाग कुमाार देवों के जिनालयों की संख्या बताइये। उत्तर - नाग कुमार देवों के 84 लाख जिनालय हैं। प्रश्न 41 - सुपर्ण कुमार देवों के जिनायों की संख्या बताइये। उत्तर - सुपर्ण कुमार देवों के 72 लाख जिनालय हैं। प्रश्न 42 - द्वीप कुमार देवें के यहां कितने जिनालय हैं? उत्तर - द्वीप कुमार देवों के यहां 76 लाख जिनालय हैं। प्रश्न 43 - उदधि कुमार देवों के यहां कितने जिनालय हैं? उत्तर - उदधि कुमार देवचों के यहां 76 लाख जिनालय हैं। प्रश्न 44 - स्तनित कुमार देवों के यहां कितने जिनालय हैं? उत्तर - स्तनित कुमार देवों के यहां 76 लाख जिलालय हैं। प्रश्न 45 - विद्युत कुमार देवों के यहां कितने जिनालय है? उत्तर - विद्युत कुमार देवों के यहां 76 लाख जिनालय हैं। प्रश्न 46 - दिक् कुमार देवों के यहां कितने जिनालय हैं? उत्तर - दिक् कुमार के यहां 76 लाख जिनालय हैं। प्रश्न 47 - अग्नि कुमार देवों के यहां कितने जिनालय हैं? उत्तर - अग्नि कुमार देवों के यहां 76 लाख जिनालय है। jain temple140 प्रश्न 48 - वायु कुमार देवों के यहां के जिनालयों की संख्या बताइये। उत्तर - वायु कुमार देवों के यहां 93 लाख जिनालय हैं। प्रश्न 49 - ज्योतिषी देव कितने प्रकार के होते हैं? उत्तर - ज्योतिषी देव पांच प्रकार के होते हैं। प्रश्न 50 - ज्योतिषी देवों के पांच प्रकार कौन-कौन से हैं? उत्तर - सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र एवं तारे ये पांच प्रकार हैं। प्रश्न 51 - ज्योतिषी देवों के कितने विमान हैं? उत्तर - प्रतयेक ज्योतिषी देवों के असंख्यात विमान हैं। प्रश्न 52 - ज्योतिषी देवों के विमान कहां-कहां स्थित हैं? उत्तर - मध्यलोक में असंख्यात द्वीप समुद्र हैं उन असंख्यात द्वीप समुद्रों के ऊपर 790 योजन की ऊंचाई से लेकर 900 योजन की ऊंचाई तक ज्योतिषी देवों के विमान हैं। प्रश्न 53 - ज्योतिषी देवों के विमानों की विशेषता बताइये। उत्तर - ढाई द्वीपों तक ज्योतिषी विमान पांच मेरूओं की परिक्रमा करते हैं, जिससे दिन-रात होते हैं, ढाई द्वीप के बाहर ये विमान चलते नहीं हैं स्थिर हैं। प्रश्न 54 - इन विमानों को ज्योतिषी क्यों कहते हैं? उत्तर - ये विमान सूर्य और चन्द्रमा आदि चमकते हैं जिनसे प्रकाश निकलता है इसीलिए इन्हें ज्योतिषी संज्ञा है। प्रश्न 55 - ज्येातिषी देवों के यहां कितने अकृत्रिम जिनायल हैं? उत्तर - प्रत्येक ज्योतिषी देवों के असंख्यात द्वीपों में ऊपर स्थित असंख्यातों विमानों में असंख्यात जिनालय हैं। प्रश्न 56 - ढाई द्वीप में कितने चन्द्र विमान में कितने जिनालय हैं? उत्तर - ढाई द्वीप में 132 चन्द्र विमान में 132 जिनालय हैं। प्रश्न 57 - ढाई द्वीप में सूर्य विमान में कितने जिनालय हैं? उत्तर - ढाई द्वीप 132 सूर्य विमान में स्थित 132 जिनालय हैं। प्रश्न 58 - ढाई द्वीप में ग्रह विमानों में स्थित जिनालयों की संख्या बताइये। उत्तर - ढाई द्वीपों में एक-एक चन्द्र विमान के 88 ग्रह विमान होते हैं। इस प्र्रकार 132 गुण 88 = 11616 ग्रह विमानों में इतने ही जिनालय हैं। प्रश्न 59 - ढाई द्वीपों में नक्षत्र विमानों में स्थित जिनालयों की संख्या बताइये। उत्तर - ढाई द्वीपों में एक चन्द्र विमान के 28 नक्षत्र माने जाते हैं। इस प्रकार कुल 3696 नक्षत्र विमानों में इतने ही जिनालय हैं। प्रश्न 60 - ढाई द्वीपों में प्रकीर्णक विमानों में स्थित जिनालयों की संख्या बताइये। उत्तर - ढाई द्वीपों में एक-एक चन्द्र विमान के 66975 प्रर्कीणक विमान हैं। अतः 132 का गुणा करने पर 8840700 प्रकीर्णक विमान में इतने ही जिनालय हैं। jain temple141 प्रश्न 61 - व्यंतर देव कितने प्रकार के हैं? उत्तर - व्यंतर देव आठ प्रकार के हैं। प्रश्न 62 - व्यंतर देव की आठ जातियों के नाम बताइये। उत्तर - किन्नर, किंपुरूष, महोरग, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, भूत एवं पिशास। प्रश्न 63 - व्यंतर देवों के यहां कितने जिनालय हैं? उत्तर - प्रत्येक प्रकार के व्यंतर देवों के यहां असंख्यात जिनालय हैं। प्रश्न 64 - उध्र्व लोक में जिनालयों की संख्या बताइये। उत्तर - उध्र्वलोक में वैमानिक देवों के यहां चैरासी लाख सत्तानवे हजार तेइस जिनालय हैं। प्रश्न 65 - सौधर्म ऐशान कल्प विमान में कितने जिनालय हैं? उत्तर - सौधर्म ऐशान कल्प में साठ लाख जिनालय हैं। प्रश्न 66 - सानत्कुमर माहेन्द्र कल्प में कितने जिनालय हैं? उत्तर - सानत्कुमार में बारह लाख माहेन्द्र में आठ लाख कुल बीस लाख जिनालय हैं। प्रश्न 67 - ब्रह्म ब्रह्मोत्तर स्वर्ग में कितने शाश्वत जिनालय हैं। उत्तर - ब्रह्मत्तर स्वर्ग में चार लाख जिनालय हैं। प्रश्न 68 - लांतव कापिष्ठ स्वर्ग में कितने जिनगृह हैं? उत्तर - लांतव कापिष्ठ स्वर्ग में पचास हजार जिनगृह हैं। प्रश्न 69 - शुक्र महाशुक्र स्वर्ग में कितने जिनमंदिर हैं? उत्तर - शुक्र महाशुक्र स्वर्ग में चालीस हजार जिनमन्दिर हैं। प्रश्न 70 - शतार सहस्त्रार स्वर्ग में जिनालयों की संख्या बताइये। उत्तर - इन दो स्वर्गों में छः हजार जिनालय हैं। प्रश्न 71 - आनत प्राणत आरण अच्युत चार स्वर्गों में जिन मन्दिरों की संख्या बताइये। उत्तर - इन चार स्वर्गों में 700 जिनालय हैं। jain temple142 प्रश्न 72 - नव ग्रैवेयकों में जिनमन्दिरों की संख्या कितनी है? उत्तर - नव ग्रैवयकों में तीन सौ नौ जिनमंदिर हैं। प्रश्न 73 - नव अनुदिशों में कितने जिनमंदिर हैं? उत्तर - नव अनुदिशाों में केवल नौ जिनमंदिर हैं। प्रश्न 74 - पांच अनुत्तर विमानों में कितने जिनालय हैं? उत्तर - पांच अनुत्तर विमानों में केवल पांच जिनमंदिर हैं। प्रश्न 75 - नव देवताओं में से अधोलोक में कितने देवता होते हैं? उत्तर - अध्रोलोक में भवनवासी देवों के भवनों में केवल दो ही देवता जिनचैतय तथा जिन चैत्यालय होते हैं। प्रश्न 76 - उध्र्वलोक में कितने दवता होेते हैं? उत्तर - उध्र्वलोक में भी केवल जिन चैतय तथा जिन चैत्यालय ये दो देवता होते हैं। प्रश्न 77 - मध्य लोक में कितने देवता होते हैं? उत्तर - मध्य लोक में ढाई द्वीपों तक नवदेवता होते हैं ढाई द्वीप से बाहर-तेरह द्वीपों तक केवल दो जिन चैत्य, जिन चैत्यालय दो ही देवता होते हैं। प्रश्न 78 - ढाई द्वीपों में नवदेवता कहां-कहां हैं? उत्तर - ढाई द्वीप की 170 कर्म भूमियों में, पांच भरत, पांच ऐरावत तथा 160 विदेह की कर्मभूमियों में पूरे नवदेवता होते हैं। प्रश्न 79 - विदेह एवं भ्रत ऐरावत के नवदेवों में क्या अंतर है? उत्तर - विदेह क्षेत्रों में सदा चतुर्थकाल (कर्मकाल) प्रवर्तमान रहने से वहां नवदेवता सदा रहते हैं। पांच भरत, पांच ऐरावत क्षेत्रों में षट्काल परावर्तन होने से क्रमशः कर्मकाल आने से ही नवदेवता पूरे रहते हैं बाकी समयों में नहीं। प्रश्न 80 - भरत ऐरावत क्षेत्रों चतुर्थकाल को छोड़कर शेष समयों में कितने देवता रहते हैं। उत्तर - बाकी समयों में एक से तीन तक देवताओं का अभाव रहता है। पांचवें से छठे तक आचार्य, उपाध्याय साधु जिनागम, जिन चैत्य, चैत्यालय ये छः देवता रहते हैं। प्रश्न 81 - वर्तमान समय में अपने भरत क्षेत्र में नव देवताओं में से कितने है? उत्तर - इस भरत क्षेत्र में भी वर्तमान में 1 - आचार्य 2 - उपाध्याय 3 - साधु 4 - जिनधर्म 5 - जिनागम 6 - जिनचैत्य एवं चैत्यालय ये सात हैं।?
।। सिद्ध परमेष्ठी ।। प्रश्न 1 - सिद्ध परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं? उत्तर - सिद्धपरमेष्ठी के आठ मूलगुण होते हैं। प्रश्न 2 - सिद्ध परमेष्ठी के उत्तर गुण कितने होते हैं? उत्तर - सिद्ध परमेष्ठी के उत्त्र गुण अनंतानंत होते हैं। प्रश्न 3 - सिद्ध परमेष्ठी के कौन-कौन से मूलगुण होते हैं? उत्तर - 1 - क्षायिक सम्यक्त्व 2 - अनंतदर्शन 3 - अनंतज्ञान 4 - अगुरूलघुत्व 5 - अवगाहनत्व 6 - सूक्ष्मत्व 7 - अनंतवीर्य 8 - अव्याबाधत्व। प्रश्न 4 - सिद्ध परमेष्ठी के कुछ अन्य नाम बताइये। उत्तर - मुक्त जीव, निराकार, निरंजन, निकल परमात्मा, सिद्ध परमात्मा आदि। प्रश्न 5 - सिद्ध भगवान के मूलगुण का कथन किस आधार पर है? उत्तर - सिद्ध भगवान ने आठ कर्मों का नाश किया है। एक-एक कर्म के नाश होने से एक-एक गुण प्रकट होता हे, इस प्रकार कर्मों के नाश के आधार पर सिद्ध भगवान के मूल गुणों का कथन है। प्रश्न 6 - कौन से कर्म के नाश के कौन-सा गुण प्रकट होता है। उत्तर - 1 - दर्शनावरण कर्म के नाश से अनंत दर्शन 2 - ज्ञानवरण कर्म के नाश से अनंत ज्ञान 3 - मोहनीय कर्म के नाश से क्षायिक सम्यक्त्व 4 - अंतराय कर्म के नाश से अनंतवीर्य 5 - आयु कर्म के नाश से अवगाहनत्व 6 - नाम कर्म के नाश से सूक्ष्मत्व 7 - गोत्र कर्म के नाश से अगुरू लघुत्व 8 - वेदनीय कर्म के नाश से अव्याबाधत्व। प्रश्न 7 - अनंत दर्शन से क्या तात्पर्य है? उत्तर - संसार के अनंत पदार्थों को एक साथ देखना। प्रश्न 8 - अनंत ज्ञान का क्या अभिप्राय है? उत्तर - संसार के अनंत पदार्थों को एक साथ जानना। प्रश्न 9 - अवगाहनत्व किसे कहते हैं? उत्तर - जिस गुण के रहने पर एक में अनंत समा जाते हैं ऐसे गुण को अवगाहनत्व कहते हैं। प्रश्न 10 - अवगाहनत्व सिद्ध परमेष्ठी में किस प्रकार घटित होता है? उत्तर - सिद्ध शिला पर एक सिद्ध में अनंत सिद्ध रहते हैं। jain temple92 प्रश्न 11 - अगुरूलघु गुण का लक्षण बताइये। उत्तर - जिस गुण के कारण छोटे बड़े का भेद समाप्त होता है वह अगुरूलघुत्व गुण है। प्रश्न 12 - अगुरूलघुत्व गुण सिद्ध में किस प्रकार रहता है? उत्तर - गुणों की अपेक्षा सभी सिद्ध समान होते हैं किसी में दूसरे की अपेक्षा किंचित मात्र भी गुण कम या अधिक नहीं है। जिस प्रकार एक रूपये में 100 पैसे होते हैं तो रूपये के सभी सिक्कों में 100 पैसे ही रहेंगे कम ा अधिक नहीं। प्रश्न 13 - सिद्धों में किस अपेक्षा से भेद हैं? उत्तर - आसन, अवगाहना, द्रव्य, भाव, क्षेत्र काल आदि की अपेक्षा से जानने के लिए भेद किया गया है। प्रश्न 14 - कौन से आसन से सिद्ध होते हैं? उत्तर - पर्यंकासन एवं खड़गासन इन दो आसनों से ही सिद्ध होते हैं। प्रश्न 15 - अवगाहना से क्या अभिप्राय है? उत्तर - उत्तम अवगाहना, मध्यम अवगाहना एवं जघन्य अवगाहना से सिद्ध हैं। प्रश्न 16 - उत्तम अवगाहना कितनी मानी है? उत्तर - उत्तम अवगाहना कुछ कम पांच सौ पच्ची धनुष अर्थात् इक्कीस सौ हाथ में कुछ कम। प्रश्न 17 - उत्तम अवगाहना में किसका उदाहरण आता है? उत्तर - भगवान बाहुबली का। प्रश्न 18 - मध्यम अवगाहना कितनी है? उत्तर - मध्यम अवगाहना में अनेक भेद हैं। प्रश्न 19 - जघन्य अवगाहना कितनी है? उत्तर - सिद्धों की जघन्य अवगाहना साड़े तीन हाथ की मानी जाती है। प्रश्न 20 - जघन्य अवगाहना में किसका उदाहरण आता है? उत्तर - भगवान महावीर स्वामी का। प्रश्न 21 - सिद्ध परमेष्ठी का क्या स्वरूप है? उत्तर - जो आठों कर्मों का नाश हो जाने से नित्य निरंजन, अशरीरी हैं लोक के अग्र भाग पर विराजमान, वे सिद्ध परमेष्ठी कहलाते हैं इनके आठ मूल गुण होते हैं। प्रश्न 22 - सिद्ध परमेष्ठी का स्वरूप बताने वाली पद्य बताइये। उत्तर - पद्य इस प्रकार है- समकित दरसन ज्ञान अगुरूलघु अवगाहना। सूक्ष्म वीरजवान, निरावाध गुण सिद्ध के।। jain temple93 प्रश्न 23 - सिद्ध कौन से लोक से होते हैं? उत्तर - सिद्ध क ेवल मध्य लोक से होते हैं। प्रश्न 24 - मध्यलोक में सिद्ध कहां से होते हैं? उत्तर - मध्य लोक में सिद्ध केवल ढाई द्वीप से होते हैं। प्रश्न 25 - ढाई द्वीप से ही सिद्ध क्यों होते हैं। उत्तर - क्योंकि ढाई द्वीपों तक ही मनुजलोक है। इसका विस्तार भी सिद्ध शिला के समान, 45 लाख योजन है, अतः ढाई द्वीप से ही सिद्ध होते हैं। प्रश्न 26 - ढाई द्वीपों में सिद्ध कहां-कहां से होते हैं? उत्तर - ढाई द्वीपों के प्रायः सभी स्थानों से सिद्ध होते हैं। प्रश्न 27 - कौन से जीव सिद्ध हो सकते हैं? उत्तर - जीवों में केवल मनुष्य ही सिद्ध हो सकते हैं। प्रश्न 28 - जीवों में केवल मनुष्य ही सिद्ध बनने के अधिकारी क्यों? उत्तर - क्योंकि केवल मनुष्य ही पूर्ण संयम धारण करके सम्पूर्ण कर्मों का नाश करके सिद्ध बन सकते हैं। प्रश्न 29 - क्या सभी मनुष्य सिद्ध बन सकते हैं? उत्तर - केवल आर्यखण्ड में जन्में आर्य मनुष्य सिद्ध बन सकते हैं। प्रश्न 30 - कौन से काल में मनुष्य सिद्ध बन सकते हैं? उत्तर - केवल कर्मकाल जो दुःखमा नाम का चतुर्थ काल होता है उसमें ही मनुष्य सिद्ध बन सकते हैं। प्रश्न 31 - मनुष्य, पुरूष, नपुंसक स्त्री के भेद से तीन प्रकार के होते हैं क्योंकि तीनों प्रकार के मनुष्य सिद्ध बनते हैं? उत्तर - द्रव्य वेद (लिंग) से केवल पुरूष मनुष्य ही सिद्ध बन सकते हैं। स्त्री नपुंसक मनुष्य नहीं। प्रश्न 32 - भाव लिंग से कौन से मनुष्य सिद्ध बन सकते है? उत्तर - भाव लिंग से स्त्रिी पुरूष नपुंसक तीनों वेद वाले मनुष्य सिद्ध बन सकते हैं। प्रश्न 33 - भगवान आदिनाथ कौन-से काल में सिद्ध बने? उत्तर - भगवान आदिनाथ तो तीसरे काल में जन्म लेकर तीसरे काल में ही सिद्ध हो गये थे। प्रश्न 34 - क्या पंचम काल में भी मनुष्य सिद्ध बन सकते हैंत्र उत्तर - पंचम काल में कोई भी मनुष्य सिद्ध नहीं बनते हैं, किंतु चतुर्थ काल में जन्म लेकर पंचम काल में मोक्ष जा सकते हैं। प्रश्न 35 - कुछ उन स्थानों के नाम बताइये जहां से जीव मोक्ष जाते हैं। उत्तर - जल, थल, आकाश, कंदरा, गुफा, पर्वत, नगर, तालाब आदि। प्रश्न 36 - जल से जीव मोक्ष कैसे जा सकते हैं? उत्तर - तप करते हुए मुनि को केाई पूर्व भव का शत्रू उठाकर यदि नदी, समुद्र तालाब आदि में डाल दे और वहां समस्त कर्मों की निर्जरा हो जाये तो वे जल से मोक्ष चले जाते हैं। प्रश्न 37 - आकाश से जीव किस प्रकार सिद्ध होते हैं? उत्तर - पूर्वोक्त विधि से तप करते हुए मुनि को कोई उठाकर ले जाये और ऊपर छोड़ दे यदि सम्पूर्ण कर्मों की निर्जरा हो जाये तो वे आकाश से ही मोक्ष चले जाते हैं। प्रश्न 38 - ढाई द्वीप कौन से हैं? उत्तर - जम्बूद्वीप, धातकी खंड तथा आधा पुष्करवर द्वीप इन्हें मिलाकर ढाई द्वीप कहे जाते हैं। प्रश्न 39 - मनुष्य किस प्रकार से सिद्ध होते हैं? उत्तर - कुछ मनुष्य उपसर्ग से सिद्ध होते हैं तथा कुछ मनुष्य बिना उपसर्ग के सिद्ध होते हैं। प्रश्न 40 - गणुव्रत तथा महाव्रत धारण करने वालों में कौन -से मनुष्य सिद्ध होते हैं। उत्तर - केवल महाव्रती ही सिद्ध होते हैं। jain temple94 प्रश्न 41 - ध्यानों में कौन से ध्यान को धारण करने वाले जीव सिद्ध होते हैं। उत्तर - केवल शुक्ल ध्यान को धारण कर कर्म नष्ट करने वाले सिद्ध बनते हैं। प्रश्न 42 - कौन से चरित्र को धारण करने वाले जीव सिद्ध होते हैं? उत्तर - पंचम यथाख्यात नामक चारित्र को धारण करने वाले जीव सिद्ध बनते हैं। प्रश्न 43 - कौन से गुण स्थानवर्ती जीव सिद्ध होते हैं? उत्तर - तेरहवें चैदहवें गुणस्थानवर्ती जीव सिद्ध बनते हैं। प्रश्न 44 - किन कर्मों को नष्ट करने पर सिद्ध बनते हैं? उत्तर - समस्त कर्मांशों को नष्ट करने पर सिद्ध बनते हैं। प्रश्न 45 - कितने कर्मों को नष्ट करने पर सिद्ध बनने की योग्यता होती है? उत्तर - चार घातियां कर्मों को नष्ट करने पर सिद्ध बनने की योग्यता हो जाती है। चार घातिया कर्मों के नष्ट हो जाने पर केवल ज्ञान हो जाता है। केवल ज्ञान होने पर भाव मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। ये केवलज्ञानी ही समस्त कर्मों से दूटकर मुक्त हो जाते हैं। प्रश्न 46 - कर्मों की कितनी प्रकृतियां नष्ट होने पर मुक्त होने की योग्यता होती है? उत्तर - कर्मों की 63 (तरेसठ) प्रकृतियां नष्ट होने पर मुक्त पद प्राप्त करने की योग्यता होती है। प्रश्न 47 - जीवन मुक्त जीव को कितने कर्म तथा कर्मों की कितनी प्रकृर्तियां नष्ट होती हैं? उत्तर - जीवन मुक्त जीव अर्थात अरिहंत भगवान के चार घातिया कर्म तथा त्रेसठ प्रकृतियां नष्ट होती हैं। प्रश्न 48 - जीवों के सिद्ध बनने में क्या अंतर है? उत्तर - कोई जीव तीर्थंकर बनकर सिद्ध होते हैं तथा कोई जीव बिना तीर्थंकर बने केवली, मूक केवली बनकर सिद्ध बन जाते हैं। प्रश्न 49 - तीर्थंकर तथा केवली में क्या अंतर है? उत्तर - सभी केवली तीर्थकर नहीं होते, सभी तीर्थंकर केवली होते हैं। तीर्थंकरों का समवसरण बनता है, केवलियों की गंध कुटी, तीर्थंकरों के कल्याणक देव मानते हैं। केवललियों के पंच कल्याणकादि तीर्थंकरों की भांति नहीं होते हैं। सामान्य केवली के जन्म समय अतिश्य नहीं होते हैं। प्रश्न 50 - तीर्थंकर तथा सामान्य केवली को उदाहरण द्वारा बताइये। उत्तर - भगवान बाहुबली, भरत, राम, हनुमान आदि केवली तो थे किन्तु तीर्थंकर नहीं थे। प्रश्न 51 - केवली तथा मुक्त केवली में क्या अंतर है? उत्तर - सभी केवलियों की दिव्य ध्वनि खिरती है जबकि मूक केवलियों की दिव्य ध्वनि नहीं खिरती है। jain temple95 प्रश्न 52 - केवली को सिद्ध बनने के लिए कितना समय लगता है? उत्तर - पंचलक्षर उच्चारण के बाराबर समय लगता है। प्रश्न 53 - वे पंचलब्धक्षर कौन - से हैं? उत्तर - अ इ उ ऋ लृ प्रश्न 54 - कर्मनष्ट करके सिद्ध कहां जाते हैं? उत्तर - लोक अग्र भाग पर। प्रश्न 55 - जीव सिद्ध होकर अग्र भाग से ऊपर क्यों नहीं जाते? उत्तर - जीव व पुद्गलों की गति धर्मास्तिकाय के कारण से होती है लोक के अग्रभाग से ऊपर धर्मास्तिकाय द्रव्य नहीं है। प्रश्न 56 - मुक्त जीव मध्य लोक के ढाई द्वीप से ऊपर ही क्यों जाते हैं नीचे क्यों नहीं? उत्तर - मुक्त जीव का स्वभाव ऊपर जाने का ही है इसीलिए। प्रश्न 57 - मुक्त जीव के उध्र्व गमन के लिए आचार्यों ने क्या उदाहरण लिया है? उत्तर - ऐरण्ड बीज का, अग्नि शिखा का कुम्हार के चक्र का। प्रश्न 58 - समुदघात् सिद्ध किन्हें कहते है? उत्तर - जो मुनि मुक्ति जाने से पूर्व केवली समुदघात् करते हैं, उन्हें समुघात् सिद्ध कहते हैं। प्रश्न 59 - केवली समुदघात् सिद्ध किन्हें कहते है? उत्तर - जिन केवलियों की आत्मा में कर्मों की सत्ता अधिक है आयु कर्म कम तो दोनों को बराबर करने के लिए जो समुदघात् किया जाता है उसे केवली समुदघात् कहते हैं। प्रश्न 60 - समुदघात् क्या है? उत्तर - आत्मा के प्रदेशों का मूल शरीर को छोड़े बिना बाहर निकलना समुदघात् कहलात है। प्रश्न 61 - तीर्थंकर के निर्वाण क्षेत्रों को छोड़ अन्य पांच सिर क्षेत्रों के नाम बताओं। उत्तर - सोनागिर, बड़बानी, मांगीतुंगी, मथुरा, द्रोणगिरि। प्रश्न 62 - सिद्ध क्षेत्र किसे कहते हैं? उत्तर - जिस स्थान से जीव मोक्ष जाते हैं, सिद्ध होते हैं उस स्थाान को सिद्ध क्षेत्र कहते हैं। प्रश्न 63 - सम्मेदशिखर को छोड़कर प्रचलित अन्य सिद्ध क्षेत्रों के नाम बताइये। उत्तर - (1) कैलाश पर्वत, (2) गिरानार जी (3) पावापुरी (4) गजपंथजी, (5) तारवर नगर (6) पावागिरि (7) शत्रुंजय (8) मांगीतुंगी (9) सोनागिरजी (10) रेवानदी तट (11) सिद्धवर कूट (12) बड़ानी नगर (13) पावागिरि नगर (14) द्रोणागिरि (15) मुक्ता गिरि (मेढ़गिरि), (16) कुंथुलगिरि (17) कलिंगदेश (कोटिशिला), (18) रेशंदीगिरि (19) जम्बूवन (चैरासी मथुरा) jain temple96 प्रश्न 64 - कैलाश पर्वत से कौन-कौन से मोक्ष हैं? उत्तर - कैलाश पर्वत से, भगवान आदिनाथ, भरत बाहुबली आदि 10 हजार मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 65 - चंपापुरी - से कितने मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - चंपापुरी से श्री वासुपूज्य भगवान तथा छः सौ मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 66 - गिरिनार जी से श्री नेमिनाथ भगवान को छोड़कर कौन-कौन से भव्य जीव मोक्ष गये हैं? उत्तर - प्रद्मुनकुमार, शम्भु, अनिरूद्ध आदि बहत्तर करोड़ सात सौ मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 67 - गजपंथा जी सिद्ध क्षेत्र की विशेषता बताइये। उत्तर - गजपंथा सिद्ध क्षेत्र से श्री बलभद्र यादव नरेन्द्रादि सात आठ करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 68 - तारवर नगर से कौन से मुनि मोक्ष को गये हैं? उत्तर - तारवर नगर से, धरदत्त, वरांग, सागरदत्त आदि साड़े तीन करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 69 - पावागिरि से कौन से मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - पावागिरि से रामचन्द्र के दो पुत्र लाडनृपादि एवं पांच करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 70 - शत्रुजय पर्वत से कितने मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - शत्रुंजय पर्वत से तीन पांडु पुत्र युधिष्ठर, भीम, अर्जुन द्रविड राजादि आठ करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 71 - मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र से कौन से प्रसिद्ध महानुभाव मोक्ष गये हैं? उत्तर - मांगीतुंग सिद्ध क्षेत्र से श्रीराम, हनुमान, सुग्रीव, गव, गवाक्ष, नील, बहानील आदि निन्यानवे करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 72 - सोनागिर सिद्ध क्षेत्र से कौन से मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - सोनागिर सिद्ध क्षे. से नंग अनंग कुमार मुनि सहित साड़े पांच करोड़ भव्य जीव मोक्ष गये हैं। प्रश्न 73 - रेवातट सिद्ध क्षेत्र से कितने मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - रेवातट सिद्ध क्षेत्र से दशमुखनृपति पुत्र एवं साड़े पांच करोड़ मुनि मोक्ष् गये हैं। प्रश्न 74 - सिद्धवर कूट से कौन से मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - सिद्धवर कूट सिद्ध क्षेत्र से दो चक्रीश तथा दस कामदेव सहित साड़े तीन करोड़ मुनि मोंक्ष गये हैं। प्रश्न 75 - बड़वानी सिद्ध क्षेत्र से कोन-से मोक्ष गये हैं? उत्तर - बड़बानी सिद्ध क्षेत्र से इन्द्रजीत और कुम्भकरण मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 76 - पावागिरिनगर सिद्ध क्षेत्र से कौन से मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - पावागिरि नगर सिद्ध क्षेत्र से सुवर्णभद्र मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 77 - द्रोण गिरि सिद्ध क्षेत्र से कौन से भव्य जीव सिद्ध हुए हैं? उत्तर - द्रोण गिरि सिद्ध क्षेत्र से गुरूदत्तादि मुनिगण सिद्ध हुए हैं। प्रश्न 78 - अष्टापद गिरि से कौन-से दो मुनि सिद्ध होकर प्रसिद्ध हुए हैं? उत्तर - अष्टापद गिरि से बालि महाबलि नाम के मुनि सिद्ध हुए हैं। प्रश्न 79 - मुक्ता गिरि से कितने मुनियों ने सिद्ध पद को प्राप्त किया है? उत्तर - मुक्ता गिरि से साड़े तीन करोड़ मुनियों ने सिद्ध पद को प्राप्त किया है। प्रश्न 80 - मुक्ता गिरि का दूसरा नाम क्या है? उत्तर - मुक्ता गिरि का दूसरा नाम मेढ़ागिरि है। प्रश्न 81 - कुंथलगिरि से कौन से मुनि सिद्ध हुए हैं? उत्तर - कुंथलगिरि से साडद्ये तीन करोड़ मुनि सिद्ध हुए हैं। jain temple98 प्रश्न 82 - कलिंग देश कोटि शिला से कौन से मुनि सिद्ध हुए हैं? उत्तर - कलिंग देश कोटिशिला से दशरथ राजा के पुत्र तथा पांच सौ मुनि सिद्ध हुए हैं। प्रश्न 83 - रेशंदी सिद्ध क्षेत्र से कौन-से मुनियों ने मुक्त पद प्राप्त किया है? उत्तर - रेशंदी गिरि सिद्ध क्षेत्र से वरदत्तादि पांच मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 84 - जम्बूवन (मथुरा चैरासी) से कौन मोक्ष गये हैं? उत्तर - जम्बूवन मथुरा चैरासी से जम्बूस्वामी मोक्ष गये हैं। प्रश्न 85 - इस हुंडावसर्पिणी काल के कर्मयुग में सर्वप्रथम मोक्ष प्राप्त करने वाले कौन थे? उत्तर - अनंतवीर्य केवली। प्रश्न 86 - चतुर्थ काल के अंत में मोक्ष प्राप्त करने वाले कौन थे? उत्तर - जम्बूस्वामी। प्रश्न 87 - सबसे बड़े सिद्ध क्षेत्र का क्या नाम है? उत्तर - श्री सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र। प्रश्न 88 - सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र की क्या महत्ता है? उत्तर - सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र की महत्ता निम्न प्रकार है- एक बार वंदे जो कोई ताहि नरक पशु गति न होई।। अर्थात् जो एक बार सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र की वंदना कर लेता है वह निश्चय ही भव्य है उसे नरक और पशुगति में नहीं जाना पड़ता है। उसकी निश्चित ही मनुष्य एवं देवगति होती है। प्रश्न 89 - सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र के कूटों के नाम बताइये। jain temple99 उत्तर - नाम इस प्रकार हैं- 1 - सिद्धवर कूट 2 - धवल कूट 3 - आनंद कूट 4 - अविचल कूट 5 - मोहन कूट 6 - प्रभास कूट 7 - ललित कूट 8 - सुप्रभ कूट 9 - विद्युतवर कूट 10 - संकुल कूट 11 - सुवीर कूट 12 - स्वयंभू कूट 13 - सुदत्त कूट 14 - कुंदप्रभ कूट 15 - ज्ञानधर कूट 16 - नाटक कूट 17 - संबल कूट 18 - निरजर कूट 19 - मित्रधर कूट 20 - सुवर्णभद्र कूट 21 - आदिनाथ भगवान की टौंक 22 - वासुपूज्य भगवान की टौंक 23 - नेमिनाथ भगवान की टौंक 24 - महावीर की टौंक 25 - गणधर कूट। प्रश्न 90 - सिद्धवर कूट से कुल कितने मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - इस कूट एक अरब अस्सी करोड़ चउवन लाख मुनि मोक्ष गये हैं? प्रश्न 91 - सिद्धवर कूट की वंदना से क्या फल मिलता है? उत्तर - सिद्धवर कूट की वंदना से बत्तीस करो़ उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 92 - धवल कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - धवल कूट से नौ कोड़ा-कोडि़ बहत्तर लाख बियालिस हजार पांच सौ मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 93 - धवल कूअ की वंदना से क्या फल मिलता है? उत्तर - धवल कूअ की वंदना से ब्यालिस लाख उपवास का फल मिलता है। jain temple100 प्रश्न 94 - आनन्द कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हें? उत्तर - धवल कूट की वंदना से ब्यालिस लाख उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 95 - आनंद कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - आनन्द कूट से बहत्तर कोड़ाकोडि़ सत्तर करोड़ सत्तर लाख ब्यालिस हजार सात सै मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 96 - आनंद कूट की वंदना से क्या फल मिलता है? उत्तर - आनंद कूट की वंदना से एक लाख उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 97 - अविचल कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - अविचल कूट से एक कोड़ाकोडि़ चैरासी करोड़ बहत्तर लाख इक्यासी हजार, सात सौ इक्यासी मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 98 - अविचल कूट की वंदना का फल बताइये। उत्तर - अविचल कूट की वंदना से, एक करोड़ बत्तीस लाख उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 99 - मोहन कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - मोहन कूट से निन्यानवे करोड़ सत्तासी लाख तितालीस हजार सात सौ सत्ताइस मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 100 - मोहन कूट की वंदना से क्या फल मिलता है? उत्तर - मोहन कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है? प्रश्न 101 - प्रभास कूट से कितने मुनि मोक्ष पधारे हैं? उत्तर - प्रभास कूट से उन्वास कोड़ाकोडि़ चैरासी करोड़ बत्तीस लाख सात हजार सात सौन मुनि मोक्ष पधारे हैं। प्रश्न 102 - प्रभास कूट की वंदना का फल बताइये। उत्तर - प्रभास कूट की वंदना से, बत्तीस करोड़ उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 103 - ललित कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - ललित कूट से नौ सौ चैरासी अरब बहत्तर करोड़ उस्सीलाख, चैरासी हजार, पांच सौ, पंचानवे मुनि मोक्ष गये हैं। प्रश्न 104 - ललित कूट की वंदना का फल बताइये। उत्तर - ललित कूट की वंदना से छियानवे लाख उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 105 - सुप्रभ कूट से कितने मुनिराज सिद्ध पद को प्राप्त हुये हैं? उत्तर - आठवें सुप्रभ कूट से एक कोड़ा-कोडि़ निन्यानवे लाख सात हजार चार सौ अस्सी मुनि सिद्ध पद को प्राप्त हुए हैं। प्रश्न 106 - सुप्रभ कूट की वंदना से क्या फल प्राप्त होता है? उत्तर - सुप्रभ कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 107 - विद्युतवर कूअ की वंदना से कितने उपवासों का फल प्राप्त होता है। उत्तर - विद्युतवर कूअ की वंदना से एक करोड़ उपवासों का फल मिलता है। प्रश्न 108 - संकुल कूट से कितने मुनियों ने सिद्ध धाम को प्राप्त किया है? उत्तर - संकुल कूट से छियानवे कोड़-कोडि़ छियानवे करोड़ छियानवे लाख नौ हजार पांच सौ ब्यालिस मुनियों ने सिद्ध धाम को प्राप्त किया है। प्रश्न 109 - संकुल कूट की वंदना से कितने उपवासों का फल मिलता है? उत्तर - संकुल कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 110 - ग्यारवें सुवीर कूट से कितने मुनि मोक्ष पधारे हैं? उत्तर - ग्यारवें सुवीर कूट से सत्तर कोड़ा-कोडि़ साठ लाख छः हजार सात सौ ब्यालिस मुनि मोक्ष पधारे हैं। प्रश्न 111 - सुवीर कूट की वंदना से कितने उपवासों का फल मिलता है? उत्तर - सुवीर कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 112 - बारवें स्वयंभू कूट से कितने मुनि मोक्ष पधारे हैं? उत्तर - स्वयंभू कूट से छियानवे कोड़ा-कोडि़ सत्तर करोड़ सत्तर लाख, सत्तर हजार, सात सौ, मुनि मोक्ष पधारे हैं। प्रश्न 113 - स्वयं-भू कूट की वंदना से क्या फल प्राप्त होता है? उत्तर - स्वयं-भू कूट की वंदना से नौ करोड़ उपवास का फल प्राप्त होता है। प्रश्न 114 - तेरहवे सुदत्त कूट से कितने मुनि सिद्ध हुए है? उत्तर - तेरहवें कूट से उनत्तिस कोड़-कोडि़ उन्नीस करोड़ नौ लाख, नौ हजार, सात सौ पन्चानवें दिगम्बर साधु सिद्ध हुए हैं। प्रश्न 115 - सुदत्त कूट की वंदना से कितने उपवासों का फल मिलता है? उत्तर - सुदत्त कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 116 - कुंदप्रभु कूअ से कितने मुनि सिद्ध पद को प्राप्त हुए। उत्तर - कुंद प्रभ कूट से नौ कोड़ाकोडि़ नौ लाख नौ सौ निन्यानवे मुनि सिद्ध पद को प्राप्त हुए हैं। प्रश्न 117 - इस कूट की वंदना से कितने उपवासों का फल मिलता है? उत्तर - इस कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 118 - ज्ञानधर कूट से कितने मुनियों ने शिव धाम को प्राप्त किया है? उत्तर - ज्ञानधर कूट से छियानवे कोड़-कोडि़ छियालिस करोड़ बत्तीस लाख छियानवे हजार सात सौ ब्यालिस मुनियों ने शिव पद प्राप्त किया है। प्रश्न 119 - ज्ञानधर कॅअ की वंदना से क्या फल मिलता है? उत्तर - इस कूअ की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 120 - नाटक कूट से कितने मुनिराजों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है? उत्तर - नाटक कूट से निन्यानवे करोड़ निन्यानवे लाख नौ सौ निन्यानवें मुनिराजों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है। प्रश्न 121 - नाटक कूट की वंदना से क्या फल मिलता है? उत्तर - नाटक कूट की वंदना से छियानवे करोड़ उपवासों का फल मिलता है। jain temple101 प्रश्न 122 - संबल कूट से कितने मुनियों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है। उत्तर - संबल कूट से छियानवे करोड़ मुनियों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है। प्रश्न 123 - संबल कूट की वंदना का फल बताइये। उत्तर - संबल कूट की वंदना से एक करोड़ प्रोषधोपवासों का फल मिलता है। प्रश्न 124 - निरजर कूट से कितने मुनियों ने निर्वाण को प्राप्त किया है? उत्तर - निरजर कूट से निन्यानवे कोड़ा-कोडि़ सत्यान्वे करोड़ नौ लाख नौ सौ निन्यानवे महामुनियों ने निर्वाण को प्राप्त किया। प्रश्न 125 - निरजर कूट की वंदना का फल बताइये। उत्तर - निरजर कूट की वंदना से एक करोड़ प्रोषधोपवासों का फल मिलता है। प्रश्न 126 - मित्रधर कूट से कितने ऋषि निर्वाण धाम को प्राप्त हुए हैं? उत्तर - मित्रधर कूट से नौ सौ कोड़ाकोडि़ एक अरब पैंतालिस लाख सात हजार नो सौ मुनि निर्वाण धाम को प्राप्त हुए हैं। प्रश्न 127 - मित्रधर कूट की वंदना का क्या फल मिलता है? उत्तर - मित्रधर कूअ की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है। प्रश्न 128 - स्वर्णभद्र कूट से कितने महामुनि मोक्ष गये हैं? उत्तर - स्वर्णभद्र कूट से ब्यासी करोड़ चैरासी लाख पैंतालिस हजार सात सौ ब्यालिस महामुनि कर्म नाश कर मोक्ष गये हैं। प्रश्न 129 - स्वर्ण कूट की वंदना से क्या फल मिलता है? उत्तर - इस कूट की वंदना से सोलह करोड़ उपवासों का फल मिलता है। प्रश्न 130 - गणधर कूट की क्या विशेषता है? उत्तर - गणधर कूट से गौतम आदि गणधर मोक्ष गये हैं। प्रश्न 131 - सम्मेद शिखर से कितने तीर्थंकरों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है? उत्तर - सम्मेद शिखर से अनंतानंत चैबीस तीर्थंकरों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है। सभी तीर्थंकर इसी स्थान से मोक्ष जाते हैं।
।। श्री अरिहंत परमेष्ठी ।। प्रश्न 1 - पंच परमेष्ठी कौन-से काल में होता है? उत्तर - पंच परमेष्ठी, कर्मकाल जो दुःखमा नाम का चैथा काल होता है, उसमें होते हैं। हुंडावसर्पिणी काल में तीसरे काल में भी हुए हैं। आचार्य, उपाध्याय साधु ये दुःखमा नाम के पंचम काल के अंत तक भी रहते हैं। प्रश्न 2 - कौन-से परमेष्ठी कहां रहते हैं? उत्तर - अरिहंत, आचार्य, उपाध्याय और साधु ये चार परमेष्ठी ढाई द्वीप की 170 कर्म भूमियों के आर्यखण्डों में विचरण करते हैं। सिद्ध परमेष्ठी लोक के अग्र भाग पर सिद्ध शिला पर शाश्वत विराजमान रहते हैं। प्रश्न 3 - क्या ढाई द्वीप के बाहर भी कोई परमेष्ठी होते हैं? उत्तर - नहीं! ढाई द्वीप के बाहर कोई भी परमेष्ठी नहीं होते हैं। अधोलोक उध्र्वलोक, मध्यलोक ढाई द्वीपों को छोड़कर वहां केवल अकृत्रिम जिनालय तथा जिनप्रतिमायें ही होती हैं। प्रश्न 4 - अरिहंत परमेष्ठी किसे कहते हैं? उत्तर - जिन्होंने चार घातिया कर्मों का नाश किया है, जो समवशरण में विराजमान रहकर भव्यों को मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं, जो, सर्वज्ञ वीतराग और हितोपदेशी हैं जो 46 मूल गणों से युग्त 18 दोष से रहित होते हैं। वे अरिहंत हैं। प्रश्न 5 - अरिहंत के अन्य नाम क्या हैं? उत्तर - वैसे तो अरिहंतो की इन्द्रों द्वारा 1008 नामों से पूजा की जाती है फिर भी प्रचलित नामों में उन्हें, अरिहंत, आप्त, जिनेन्द्र, जिन, जिनेश्वर, शंकर, ब्रह्मा, विधाता, अर्ध नारीश्वर भूतनाथ आदि नामों से जाना जाता है। प्रश्न 6 - अरिहंत नाम की सार्थकता क्या है? उत्तर - अरि अर्थात् शत्रु। जिन्होंने कर्म रूपी शत्रुओं का नाश किया है वे ही अरिहंत हैं यथा-कार्मारीन् हंतः-अरिहंत प्रश्न 7 - अरिहंत भगवान को जिनेन्द्र क्यों कहते हैं? उत्तर - अपनी पांचों इन्द्रीय तथा मन को जीत लेने से उन्हें जिन, जिनेश्वर जिनेन्द्र कहा जाता है। प्रश्न 8 - अरिहंत भगवान को शंकर क्यों कहा जाता है? उत्तर - क्योंकि ये अपने वचनामृत से भव्यों को शं अर्थात् सुख प्रदान करे हैं। प्रश्न 9 - अरिहंत भगवान को ब्रह्मा क्यों कहा जाता है? उत्तर - अरिहंत भगवान के समवशरण में चारों दिशाओं में मुख दिखने के कारण उन्हें ब्रह्मा कहा जाता है। प्रश्न 10 - अरिहंत भगवान को अर्धनारीश्वर क्यों कहा जाता है? उत्तर - अर्ध नारीश्वर का एक शाब्दिक अर्थ होता है। अर्ध न अरी तेषां ईश्वरः अर्थात् अर्ध-आधे, न-नहीं है,ं अरी-शत्रू, जिके, आधे शत्रू नहीं हैं, जिनके, ऐसे ईश्वर हुए अर्धनारीश्वर; अतः कर्म शत्रू आठ हैं, अरिहंत भगवान ने इनमें से चार घातिया कर्म शत्रूओं का नाश किया है अतः इन्हें अर्ध नारीश्वर कहते हैं। प्रश्न 11 - अरिहंत भगवान को भूतनाथ क्यों कहते हैं? उत्तर - भूत अर्थात् प्राणी। प्राणियों के स्वामी, नाथ होने से इन्हें भूतनाथ कहा जाता है। प्रश्न 12 - आप्त किसे कहते हैं? उत्तर - वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी ये तीन गुण जिनमें होते हैं वे आप्त कहलाते हैं। प्रश्न 13 - मूलगुण किसे कहते हैं? उत्तर - जो गुणों में मुख्य होते हैं वे मूल गुण हैं जैसे वृक्ष में जड़। jain temple82 प्रश्न 14 - अरिहंत भगवान के मूल गुण किसे कहते हैं? उत्तर - अतिशय 34, प्रतिहार्य 8, अनंत चतुष्टय 4 मूलगुण हुए। प्रश्न 15 - अरिहंत भगवान के उत्तर गुण कितने होते हैं? उत्तर - अरिहंत भगवान के उत्तर गुण अनंत हैं। प्रश्न 16 - घातिया कर्म किसे कहते हैं? उत्तर - जो कर्म आत्मा के मूलगुणों का घात कहते हैं वे घातियां कर्म कहलाते हैं। प्रश्न 17 - घातिया कर्म कितने हैं? उत्तर - घातिया कर्म चार हैं। प्रश्न 18 - घातिया कर्म कौन-कौन से हैं? उत्तर - मोहनीय, ज्ञानावरणी, दर्शनवरणी और अन्तराय। प्रश्न 19 - अरहंत का शाब्दिक अर्थ क्या है? उत्तर - अर्हंत् अर्थात् पूज्य, जो पूज्य हो गये हें वे अरहंत हैं। प्रश्न 20 - अरिहंत भगवान में कौन-कौन से अठारह दोष नहीं है? उत्तर - (1) जन्म, (2) जरा, (3) प्यास, (4) भूख, (5) आश्चर्य (6) पीड़ा, (7) दुख, (8) रोग (9) शोक, (10) मोह, (12) भय (13) निद्रा (14) चिंता (15) पसीना (16) राग (17)द्वेष (18) मरण। प्रश्न 21 - जन्म किसे कहते हैं? उत्तर - आत्मा के नवीन शरीर धारण करने को जन्म कहते हैं। प्रश्न 22 - जरा किसे कहते हैं? उत्तर - बुढ़ापे को जरा कहते हैं, जिससे शरीर जीर्ण होकर कमजोर हो जाता है, शरीर में झुर्रियां पड़ जाती हैं। तथा इन्द्रियां ठीक प्रकार से कार्य नहीं करती हैं। प्रश्न 23 - प्यास किसे कहते हैं? उत्तर - पानी पीने की इच्छा को प्यास कहते हैं। प्रश्न 24 - भूख किसे कहते हैं? उत्तर - आहार ग्रहण करने की इच्छा को भूख कहते हैं। प्रश्न 25 - आश्चर्य किसे कहते हैं? उत्तर - किसी भी नई वस्तु का - जो कौतुक का भाव होता है उसे आश्चर्य कहते हैं। प्रश्न 26 - अरिहंत भगवान को आश्चर्य क्यों नहीं होता? उत्तर - अरिहंत भगवान तीनों लोकों के समस्त पदार्थों की त्रैकालवर्ती अनंत पयार्यों को एक ही समय में जान रहते हैं; अतः उनके लिए कुछ भी नया नहीं है। इसीलिए अरिहंत भगवान को आश्चर्य नहीं होता। प्रश्न 27 - पीड़ा किसे कहते हैं? उत्तर - शरीर में अनिष्ट पदार्थों का संयोग होने पर वेदना की अनुभूति होना ही पीड़ा है। प्रश्न 28 - दुःख किसे कहते हैं? उत्तर - इष्ट वियोग अनिष्ट संयोग होने पर आत्मा में आर्तरूप परिमाण का आना दुःख है। प्रश्न 29 - रोग किसे कहते हैं? उत्तर - ठीक प्रकार से शरीर के कार्य करने में बाधा उत्पन्न होना रोग है। प्रश्न 30 - शोक क्या है? उत्तर - अपनी इष्ट वस्तु का वियोग हो जाने पर दुःख की अनुभूति होना शोक है। प्रश्न 31 - गर्व किसे कहते हैं? उत्तर - अपने को दूसरों से ऊंचा मानना गर्व कहलाता है। प्रश्न 32 - मोह किसे कहते हैं? उत्तर - पदार्थों में ममत्व परिणाम ये मेरा है मैं इसके बिना नहीं रह सकता ऐसा भाव मोह है। प्रश्न 33 - भय किसे कहते हैं? उत्तर - किसी पदार्थ के द्वारा अपने में अनष्टि की आशंका होने पर उससे बचने का प्रयास रूप जो भाव, तीव्र वेग से उत्पन्न होता है उसे भय या डर कहते हैं। प्रश्न 34 - किया कितने होते हैं? उत्तर - भय सात होते हैं। प्रश्न 35 - सात भयों के नाम बताइये। jain temple83 उत्तर - 1 - इहलोक भय 2 - परलोक भय 3 - मृत्यु भय 4 - आकस्मिक भय 5 - वेदना भय, 6 - गुप्ति भय, 7 - अनरक्षा भय। प्रश्न 36 - इहलोक भय किसे कहते हैं? उत्तर - अभी मैं यदि कर्म करूंगा तो मेरी इस लोक में निन्दा होगी तथा लोग मुझे कष्ट पहुंचायेंगे ऐसा सोचना इहलोक भय है। प्रश्न 37 - परलोक भय क्या है? उत्तर - इस लोक में यदि मैं बुरे कर्म करूंगा तो मुझे परलोक में नरक त्रिर्यंच गति में जाकर दुःख उठाने पड़ेगे मेरा परलोक आगे आने वाला भव बिगड़ जायेगा, ये परलोक भय है। प्रश्न 38 - मृत्यु भय क्या है? उत्तर - रोग आदि के आने पर शरीर के छुटने का भय मृत्यु भय है। प्रश्न 39 - आकस्मिक भय क्या है? उत्तर - जिस भय के आने की सम्भावना नहीं होती, किंतु अचानक प्रकट हो जाता है, वह आकस्मिक भय है। प्रश्न 40 - वेदना भय क्या है? उत्तर - शरीर में चोट, पीड़ा आदि का भय होना वेदना भय है। प्रश्न 41 - गुप्ति भय क्या है? उत्तर - छिपी हुई, दबी हुई गोपनीय चोरी आदि की बात या तथ्य के प्रकट होने की आशंका गुप्ति भय है। प्रश्न 42 - अनरक्षा भय क्या है? उत्तर - कहीं भी किसी प्रकार से असुरक्षा-भावना अनरक्षा भय है। प्रश्न 43 - निद्रा किसे कहते हैं? उत्तर - निद्रा कर्म के उदय आने पर, सो जाना निद्रा है। प्रश्न 44 - चिन्ता किसे कहते हैं? उत्तर - किसी भी तथ्य या बात को लेकर अधिक सोचना, किसी कार्य को पूर्ण करने का बार-बार भावना आना चिंता है। प्रश्न 45 - पीसना किसे कहते हैं? उत्तर - अधिक श्रम या अन्य किसी कारण से शरीर में जो पानी की बूंदे आ जाती हैं वही पसीना कहलात है। प्रश्न 46 - राग किसे कहते हैं? jain temple84 उत्तर - किसी पदार्थ, जीव, या व्यक्ति से लगाव राग कहलाता है। प्रश्न 47 - द्वेष किसे कहते हैं? उत्तर - जो पदार्थ अपने को अच्छा नहीं लगता उसके प्रतिकार रूप को हटाने स्वरूप जो भाव हैं उसे द्वेष कहते हैं। प्रश्न 48 - मरण किसे कहते हैं? उत्तर - संसारी जीवों के शरीर छूटने को मरण कहते हैं। प्रश्न 49 - अरिहंत भगवान को जीवन मुक्त क्यों कहते हैं? उत्तर - क्योंकि वे अभी जन्म से ही छूटे हैं आगे उनका जन्म नहीं होगा लेकिन जो शरीर उन्होंने धारण किया है वह तो छूटेगा ही। प्रश्न 50 - यदि अरिहंत भगवान का शरीर छूटता है तो क्या उनका मरण भी होता है? उत्तर - अरिहंत भगवान के शरीर छूटने को मरण संज्ञा नहीं है उसका नाम निर्वाण एवं मोक्ष है। प्रश्न 51 - अरिहंत भगवान के 34 अतिश्य किस प्रकार हैं? उत्तर - जन्म समय के 10 अतिश्य, केवलज्ञान के 10 अतिशय एवं देव कृत 14 अतिश्य से मिलकर 34 हो जाते हैं प्रश्न 52 - अतिश्य किसे कहते हैं? उत्तर - सर्वसाधरण, प्राणियों में नहीं पाई जाने वाली अद्भुत या अनोखी बात को अतिश्य कहते हैं। प्रश्न 53 - जन्म के 10 अतिश्य कौन-कौन से है? उत्तर - 1 - अतिश्य सुन्दर शरीर 2 - अत्यंत सुगन्धित शरीर 3 - पसीना रहित शरीर, 4 - मलमूत्र रहित शरीर 5 - हित मित प्रिय वचन, 6 - अतुल बल, 7 - सफेद रक्त 8 - शरीर में 1008 लक्षण 9 - समचतुस्त्र संस्थान एवं 10 - वज्र वृषभ नाराच सहनन। प्रश्न 54 - अठारह दोष जो अरिहंत भगवान में नहीं हैं उनहें दोहे में बताइये। उत्तर - जनम जरा तिरखा क्षुधा, विस्मय आरत खेद। रोग शोक मद मोह भय, निद्रा चिंता स्वेद।। राग द्वेष अरू मरण जुत, ये अष्टादश दोष, नाहि होत अरिहंत के, सो छवि लायक मोष।। प्रश्न 55 - अतिश्य सुन्दर शरीर का लक्षण बताइये। उत्तर - भगवान के शरीर की रचना पृथ्वी मंडल पर पाये जाने वाले सुन्दर एवं शांति के परमाणु से हुई है। इसीलिए उनके समान सुन्दर शरीर देव, मानव आदि किसी का नहीं होता। यथा- यै शांत राग रूचिभिः परमाणु भिस्व्तं, निर्मापितत्रि भुवनैक ललाम भूतः। तावंत एैव खलु तेप्यणऽव पृथ्व्यां, यत्ते समान मपरं नाहि रूपमस्ति।। प्रश्न 56 - अत्यंत सुगन्धित शरीर से क्या अभिप्राय है? उत्तर - भगवान के शरीर में कहीं नहीं पाई जाने वाली भीनी-भीनी सुगन्ध आती है। jain temple85 प्रश्न 57 - पसीना रहित से क्या अभिप्राय है? उत्तर - भगवान के शरीर में संसारी प्राणियों के समान पसीना नहीं आता है। प्रश्न 58 - क्या भगवान का शरीर मलमूत्र रहित होता है? उत्तर - भगवान के शरीर में मलमूत्र नहीं होता है। प्रश्न 59 - भगवान के शरीर में मलमूत्र क्यों नहीं होता है? उत्तर - क्योंकि भगवान जन्म से ही संसारी प्राणियों की भांति दाल रोटी आदि का भोजन नहीं करते हैं। प्रश्न 60 - यदि भगवान हमारी आपके तरह भोजन नहीं करते हैं तो वे क्या खाते हैं? उत्तर - उनके लिए भोजन वस्त्रादि की सामग्री स्वर्ग से आती है। प्रश्न 61 - हित मित प्रिय वचन से क्या अभिप्राय है? उत्तर - भगवान जब भी कुछ बोलते हैं तो सबके लिए हितकारी मितकारी एवं प्रिय वचन बोलते हैं उनके वचनों से किसी को भी किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है। प्रश्न 62 - अतुल बल से क्या अभिप्राय है? उत्तर - भगवान के शरीर में इतना बल होता है कि जितना है कि जितना बल देव, दानवों, मानवों में होता है उनके बल से भी अनंत गुना बल भगवान के शरीर में होता है। प्रश्न 63 - सफेद रक्त से क्या आशय है? उत्तर - जिस प्रकार हमारे शरीर में लाल रक्त होता है। उसी प्रकार भगवान के शरीर में सफेद रक्त होता है। प्रश्न 64 - भगवान के शरीर में कितने लक्षण होते हैं? उत्तर - भगवान के शरीर में 1008 लक्षण चिन्ह होते हैं। jain temple86 प्रश्न 65 - सच चतुस्त्र संस्थान किसे कहते हैं? उत्तर - शरीर के सुन्दर सुड़ोल बनावट ही सम चतुस्त्र संस्थान है शरीर के जिस अंग का जैसा आकार होना चाहिए, उतना ही हो तो समचतुस्त्र संस्थान होता है। प्रश्न 66 - वज्र वृषभ नाराच संहनन क्या है? उत्तर - जब शरीर की हडि़्यां इतनी मजबूत हों तो उन पर व्रज भी गिर जाए तो उनमें कुछ बिगाड़ ना हो ये वज्र वृषभ नाराच सहनन कहलाता है। प्रश्न 67 - इस सहनन की क्या विशेषता है? उत्तर - ये प्रत्येक मोक्ष जाने वाले जीव में अवश्य ही पाया जाता है। प्रश्न 68 - जन्म के दस अतिश्यों को पद्य में बतलाइये। उत्तर - जन्म के दस अतिश्यां को बतलाने वाली पद्य इस प्रकर है- अतिश्य रूप सुगन्धित तन, नाहि पसेव निहार, प्रियहित वचन अतुल्य बल रूधिर श्वेत आकार, लक्षण सहस अरू आठ तन सम चतुष्क संठान, वज्र वुषभ नाराच जुत य जनमत, दस ज्ञान।। प्रश्न 69 - अरिहंत भगवान के शरीर के आश्रय से कितने अतिश्य होते हैं? उत्तर - जन्म के दश अतिश्यों से अतिरिक्त, नख केश नहीं बढ़ना नेत्रों की पलकें नही झपकना, शरीर की परछाई नहीं पड़ना, चारों दिशाओं में मुख दिखाना, आकाश गमन तथा कवलाहारनहीं होना। कुल 15 अतिश्य। प्रश्न 70 - अरिहंत भगवान के शरीर को क्या कहते हैं? उत्तर - अरिहंत भगवान के शरीर को परमौदारिक शरीर कहते हैं। jain temple87 प्रश्न 71 - केवलज्ञान के समय होने वाले अतिश्यों के नाम बताइये। उत्तर - ये दस अतिश्य होते हैं- 1 - सौ-सौ योजन तक सुभिक्षता 2 - आकाश में गमन 3 - चार मुख दिखना, 4 - हिंसा न होना 5 - उपसर्ग नहीं होना 6 - कवलाहार नहीं होना 7 - समस्त विद्याओं का स्वामीपना 8 - नख केश नहीं बढ़ना, 9 - नेत्रों की पलकें नही झपकला, 10 - परछाई नहीं पड़ना। प्रश्न 72 - सौ योजन तक सुभिक्षता का क्या आशय है? उत्तर - सौ योजन तक सुभिक्षता का क्या आशय है? जहां भगवान का समवसरण रहता है उससे समस्त दिशाओ, सौ-सौ योजन 800 मील तक अकाल नहीं पड़ता है। पृथ्वी धन धान्य से भरी रहती है। प्रश्न 73 - एक योजन का क्या माप है? उत्तर - एक योजन चार कोश का होता है। प्रश्न 74 - हिंसा न होने से क्या आशय है? उत्तर - जहां भगवान का समवसरण रहता है वहां किसी भी प्रकार का प्राणबध नहीं होता है। प्रश्न 75 - समस्त विद्याओं के स्वामीपना से क्या आशय है? उत्तर - केवलज्ञानी भगवान संसार की समस्त विद्याओं के स्वामी-ईश्वर होते हैं। प्रश्न 76 - भगवान का वास्तविक मुख किस दिशा में रहता है? उत्तर - भगवान का वास्तविक मुख पूरब या उत्तर में रहता है। प्रश्न 77 - कवलाहार किसे कहते हैं? जो आहर मुख द्वारा लिया जाता है उसे कवलाहार कहते हैं जैसे अन्नादि। प्रश्न 78 - केवलज्ञान के दस अतिश्य को बतलाने वाली पद्य बताइये। उत्तर - योजन शत इक में सुभिख, गगन गमन मुख चार, नहि अदया, उपसर्ग नहीं, नाहिं कवलाहार। सब विद्या ईश्वरपनों, नाहिं बढ़ें नख केश, अनिमिष दृग छाया रहित, दश केवल के वेश।। प्रश्न 79 - उपसर्ग किसे कहते हैं? उत्तर - तप और ध्यान में जो विघ्न किया जाता है, उपद्रव किया जाता है उसे उपसर्ग कहते हैं। प्रश्न 80 - देवकृत अतिश्य कौन-कौन से हैं? उत्तर - देवकृत अतिश्य चैदह हैं- 1 - अर्धमागधी भाषा 2 - जीवों में परस्पर मित्रता 3 - दिशाओं की निर्मलता 4 - आकाश की निर्मलता 5 - छहों ऋतुओं के फल फूलों का एक साथ होना 6 - एक योजन तक पृथ्वी का दर्पण की तरह निर्मल होना 7 - विहार के समय भगवान के चरणों के नीचे स्वर्णकमलों की रचना होना, 8 - आकाश में जय-जयकार की ध्वनि 9 - मंद सुगन्धित पवन 10 - सुगन्धित जल की वर्षा 11 - पवन कुमार देवों द्वारा भूमि की निष्कंटता 12 - समस्त प्राणियों को आनन्द 13 - भगवान के आगे धर्मचक्र चलना, एवं 14 - आठ मंगल द्रव्यों का एक साथ रहना। प्रश्न 81 - भगवान क उपदेश कितनी भाषाओं में परिवर्तित होता है। उत्तर - भगवान का उपदेश सात सौ अठारह भाषाओं में देव कृत अतिश्य से परिवर्तित होता है। प्रश्न 82 - भगवन की वाणी की विशेषता बताइये। उत्तर - भगवान की वाणी ऊँकार रूप होती है। उसकी आवाज मेघ गर्जना के समान होती है जिसमें होंठ तालु आदि नहीं चलते हैं। प्रश्न 83 - भगवान की वाणी का दूसरा क्या नाम है? उत्तर - भगवान की वाणी का दूसरा नाम दिव्य ध्वनि है। प्रश्न 84 - भगवान की वाणी कितने अंगों से खिरती है? उत्तर - भगवान की वाणी सभी अंगों से खिरती है। प्रश्न 85 - भगवान की वाणी को कौन-सी भाषा कहते हैं? उत्तर - भगवान की वाणी को अर्धमागधी कहते हैं। प्रश्न 86 - भगवान की वाणी के मुख्य श्रोता कौन होते हैं? उत्तर - भगवान की वाणी के मुख्य श्रोता चक्रवर्ती राजा, या सम्राट होते हैं। प्रश्न 87 - भगवान की वाणी कब और कितने समय तक खिरती है? उत्तर - भगवान की वाणी दिन और रात में चार वार दो-दो मर्हत तक खिरती है। मुख्य श्रेाता के आने पर कभी भी खिर सकती है। प्रश्न 88 - भगवान की वाणी जहां प्रकट होती है उस स्थान को क्या कहते हैं? उत्तर - भगवान की वाणी जहां प्रकट होती है उस स्थान को समवसरण कहते हैं। प्रश्न 89 - विहार के समय भगवान के चरणों के नीचे कितने कमलों की रचना होती है? उत्तर - विहार के समय भगवान के चरणों के नीचे सात कमलों की रचना देव करते हैं। प्रश्न 90 - ये कमल कौन-से होते हैं? उत्तर - ये कमल स्वर्ण कमल होते हैं। jain temple89 प्रश्न 91 - मंद सुगन्धित पवन कौन चलाते हैं? उत्तर - ये मंद सुगन्धित पवन, वायु कुमार के देव चलाते हैं। प्रश्न 92 - सुगन्धित जल की वर्षा कौन करते हैं? उत्तर - सुगन्धित जल की वर्षा मेघ कुमार के देव करते हैं। प्रश्न 93 - समवसरण में पवन कुमार के देव और क्या कार्य करते हैं। उत्तर - समवसरण में पवन कुमार के देव भूमि को निष्कंटक बनाते हैं। प्रश्न 94 - धर्म चक्र को कौन धारण करते हैं। उत्तर - धर्म चक्र को सर्वाण्ह यक्ष धारण करते हैं?। प्रश्न 95 - धर्म चक्र में कितने आरे होते हैं? उत्तर - धर्मचक्र में एक हजार 8 आरे होते हैं। प्रश्न 96 - एक समवसरण में कितने धर्मचक्र होते हैं? उत्तर - एक समवसरण में चारों दिशाओं में चार धर्मचक्र होते हैं। प्रश्न 97 - आठ मंगल द्रव्य कौन-से हैं? उत्तर - 1 - दर्पण 2 - झारी 3 - स्वस्तिक 4 - सिंहासन 5 - चंवरविजना 6 - कलश एवं 7 - ठोना। ये आठ मंगल द्रव्य भगवान के समवसरण में रहते हैं। प्रश्न 98 - आठ मंगल द्रव्यों की प्रत्येक की संख्या कितनी रहती है? उत्तर - प्रत्येक मंगल द्रव्य 108-108, संख्या में रहते हैं। प्रश्न 99 - देवकृत 14 अतिश्यों को पद् में बताइये। उत्तर - देव रचित हैं चार दश, अर्धमागधी भाष, आपस माहीं मित्रता, निर्मल दिश आकाश। होत फूल फल ऋतु सवै, पृथ्वी कांच समान, चरण कमल तक कमल हैं, नभी ते जय-जय बान।। प्रश्न 100 - आठ प्रतिहार्यों के नाम बताइये? उत्तर - 1 - अशोक वृक्ष 2 - रत्नमयी सिंहासन 3 - तीन छत्र 4 - भामण्डल 5 - दिव्य ध्वनि 6 - देवों द्वारा पुष्पवृष्टि 7 - चैसठ चंवर 8 - दुंदुभि बाजे बजना। प्रश्न 101 - अशोक वृक्ष किसे कहते हैं? उत्तर - भगवान को जिस वृक्ष के नीचे केवलज्ञान होता है उसे अशोकवृक्ष कहते हैं। यह वृक्ष प्राणियों के शोक हरने के कारण अपने नाम की सार्थकता को धारण करता है। प्रश्न 102 - भामण्डल किसे कहते हैं? उत्तर - भगवान के शरीर की प्रभा को भामण्डल कहते हैं। प्रश्न 103 - भामण्डल की क्या विशेषता है? उत्तर - इस भामण्डल में भव्य जीवों केा अपने सात भव दिखायी पड़ते हैं। तीन पहले के एक वर्तमान का तथा तीन आगे के। प्रश्न 104 - अष्ट प्रतिहार्य को बताने वाला पद्य बताइये। उत्तर - पद्य इस प्रकार है- तरू अशोक के निकट में सिंहासर छवि दार। तीन छत्र सिर पर फिरे, भामण्डल पिछवार।। दिव्य ध्वनी मुख ते खिरे, पुष्प वृष्टि सुर होय। ढोरे चैसढ चमर जखु, बाजें दुंदुभि जाये।। प्रश्न 105 - प्रातिहार्य किसे कहते हैं? उत्तर - विशेष शोभा की वस्तुओं को प्रातिहार्य कहते हैं। jain temple90 प्रश्न 106 - अनंत चतुष्टय के नाम बताइये। उत्तर - 1 अनंतदर्शन 2 अनंतज्ञान 3 अनंतसुख एव 4 अनंतवीर्य। प्रश्न 107 - उपरोक्त को अनंत चतुष्टय क्यों कहते हैं? उत्तर - अंत रहित होने से इन्हें अनंत कहते हैं तथा ये चार होने से चतुष्ट कहलाते हैं। प्रश्न 108 - अनंत दर्शन का क्या महत्व है? उत्तर - अनंत दर्शन से केवली अरिहंत भगवान को तीनों लोकों की समस्तवस्तुओं का उनकी तीनों कालों की पर्यायों सहित एक समय में एक साथ दर्शन होता है। प्रश्न 109 - अनंत ज्ञान का क्या कार्य है? उत्तर - अनंत ज्ञान तीनों लोकों की समस्त वस्तुओं को एक साथ समय में उनकी अनंत पर्यायों युक्त जानता है। प्रश्न 110 - अनंत सुख क्या है? उत्तर - अरिहंत भगवान का सुख अंत रहित, उपमा रहित, अलौकिक अतीन्द्रय है। तीनों लोकों के जीवों को जितना सुख होता है उनसे अनंत गुना सुख अरिहंत भगवान को होता है। प्रश्न 111 - अनंत-वीर्य क्या है? उत्तर - वीर्य शक्ति को कहते हैं। अरिहंत भगवान शक्ति तीनों लोकों में सर्वोत्तम अंत रहित होती है। प्रश्न 112 - अनंत चतुष्ट को पद्य में बताइये। उत्तर - ज्ञान अनंत, अनंत सुख, दरश अनंत प्रमाण। बल अनंत अरिहंत सो इष्ट देव पहिचान।। प्रश्न 113 - क्या प्रत्येक अरिहंत भगवान के 46 मूल गुण होते हैं? उत्तर - जिन तीर्थंकरों के पंचकल्याणक होते हैं उन्हीं के 46 मूल गुण होते हैं। शेष के जन्म समय होने वाले 10 अतिश्य नहीं होते हैं।
।। णमोकार महामंत्र ।। प्रश्न 1 - णमोकार महामंत्र का शुद्ध उच्चारण करके बताइये। उत्तर- णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्व साहूणं। jain temple72 प्रश्न 2 - णमोकार मंत्र का क्या आशय है। उत्तर- णमो अरिहंताणं-अरिहंतों को नमस्कार हो, णमो-सिद्धाणं-सिद्धों को नमस्कार हो। णमो आयरियाणं-आचार्यों को नमस्कार हो। णमो उवज्झायाणं- उपाध्यायों को नमस्कार हो, णमो लोए सव्व साहूणं-लोक के सभी साधुओं को नमस्कार हो। प्रश्न 3 - णमोकार मंत्र के अन्य प्रचलित नाम क्या हैं? उत्तर- 1 - णमोकार मंत्र, 2 - पंच नमस्कार मंत्र 3 - परमेरष्ठी मंत्र 4 - मूलमंत्र, अनादिनिधन (शाश्वत मंत्र) 5 - महामंत्र, 6 - नवकार मंत्र। प्रश्न 4 - णमोकार मंत्र को नमस्कार मंत्र क्यों कहा जाता हैं? उत्तर- क्योंकि इसमें जैन धर्म के पंचपरमेष्ठीयों को नमस्कार किया गया है। प्रश्न 5 - णमोकार मंत्र को मूलमंत्र क्यों माना जाता है? उत्तर- णमोकार मंत्र से सभी मंत्रों की रचना हुई है ऐसा माना जाता है तथा यह सभी समंत्रों में सारभाूत रूप में रहता है। प्रश्न 6 - णमोकार मंत्र से कितने मंत्रों की रचना हुई है। उत्तर- णमोकार मंत्र से 84 लाख मंत्रों की रचना मानी जाती है। प्रश्न 7 - मंत्रों का जनक किसे कहा जाता है। उत्तर- णमोकार मंत्र को मंत्रों का जनक जाना जाता है। प्रश्न 8 - णमोकार मंत्र में कौन-कौन से पांच पद हैं? उत्तर- णमोकार मंत्र में पांच पद निम्न हैं। 1 - णमो अरिहंताणं 2 - णमो सिद्धाणं 3 - णमो आयरियाणं 4 - णमो उवञ्झायाणं 5 - णमोलोए सव्व साहूंणं। प्रश्न 9 - कौन से ग्रंथ में सर्वप्रथम णमोकार मंत्र को मंगलाचरण के रूप में लिखा गया है? उत्तर- श्री भूतवली पुष्पदंत आचार्य ने षट्खंडागम ग्रंथ में णमोकार मंत्र को मंगलाचरण के रूप में लिखा है। प्रश्न 10 - णमोकार मंत्र को जैन धर्म का प्राण क्यों माना जाता है? उत्तर- णमोकार मंत्र पांच परमेष्ठियों का वाचक होने से जैन धर्म का प्राण माना जाता है क्योंकि जैन धर्म पंचपरमेष्ठियों के बिना नहीं हो सकता है और पंचपरमेष्ठी जैन के सिवा अन्यत्र नहीं होते हैं। प्रश्न 11 - णमोकार मंत्र का आगम में क्या महात्म्यं बताया गय है। उत्तर- आगम में णमोकार मंत्र का महात्म्य निम्न प्रकर प्रतिपादित किया गया है- ऐसा पंच णमोयारो सव्व पावप्पणासणो। मंगलाणं च सव्वेसिंह पढ़मं हवई मंगलम्।। jain temple73 प्रश्न 12 - णमोकार मंत्र के महात्म्य का हिन्दी आशय बताइये। उत्तर- ये पंच नमस्कार मंत्र सभी पापों का नाश करने वाला है। और सभी मंगलों में पहला मंगल है। प्रश्न 13 - मंगल किसे कहते हैं? उत्तर- जो पापों को गलाये तथा पुण्य को प्रदान करे उसे मंगल कहते हैं। प्रश्न 14 - पाप किसे कहते हैं? उत्तर- जो आत्मा का पतन करे नरक निगोद में गिराये उसे पाप कहते हैं। प्रश्न 15 - पाप कौन-कौन से हैं? उत्तर- 1 हिंसा 2 झूठ 3 चोरी 4 कुशील 5 परिग्रह ये पांच पाप होते हैं। प्रश्न 16 - णमोकार मंत्र का छोटा पंचाक्षरी मंत्र कौन-सा है? उत्तर- णमोकार मंत्र का छोटा पंचाक्षरी मंत्र असिअउसा है। प्रश्न 17 - णमोकार मंत्र से असिआ उसा कैसे बनता है? उत्तर- पांचों परमेष्ठियों के नाम के प्रथमाक्षर लेने से असि आ उसा बनता है जैसे अरिहंत परमेष्ठी का अ सिद्ध परमेष्ठी का सि आचार्य परमेष्ठी आ उपाध्याय परमेष्ठी का उ तथा साधु परमेष्ठी का सा लेने से असि आ उसा बनता है। प्रश्न 18 - णमोकार मंत्र का सबसे छोटा रूप क्या है? उत्तर- णमोकार मंत्र का सबसे छोटा रूप ऊँ हैं। प्रश्न 19 - णमोकार मंत्र से ऊँ किस प्रकार बनता है? उत्तर- अरिहंत जी का, अ, सिद्ध परमेष्ठी का उपर दूसरा नाम अशरीरी है दोनों के अ$ अ मिलाने से आ हो जाता है आचार्य का आ मिलाने से आ $ आ = आ ही रहता है। उपाध्याय का उ मिलाने से ओ होता है मुनि का, म मिलाने से ओ $ म = ऊँ बन जाता है। प्रश्न 20 - पंच परमेष्ठियों के बारे में आगम में क्या महत्व की बात बताई गयी है? उत्तर- पंचपरमेष्ठियों के महत्व को बताने वाली चत्तारिदंडक बताई गयी है। प्रश्न 21 - ये चत्तारिदंडक क्या है? उत्तर- चत्तारिदंडक निम्न प्रकार से है- jain temple74 चत्तारिमंगलं, अरिहंत मंगलं सिद्ध मंगलं साहू मंगलं, केवलि पण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लो गुत्तमा, अरिहंतलोगुत्तमा, सिद्धलोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मोलोगुत्तमा।। चत्तरिसरणं पव्वञ्जामि, अरिहंतसरणं पव्वञ्जामि, सिद्धसरणं पव्वञ्जामि, साहूसरणं पव्वञ्जामि केवलि पणात्तो धम्मंसरणं पव्वञ्जामि। प्रश्न 22 - चत्तारिक मंगल का अर्थ बताइये। उत्तर- लोक में चार मंगल हैं अरिहंत परमेष्ठी मंगल हैं, सिद्ध परमेष्ठी मंगल हैं, आचार्य उपाध्याय साधू परमेष्ठी मंगल है एवं केवलीभगवन के द्वारा बताया गया धर्म मंगल है। प्रश्न 23 - चत्तारिलोगुत्तमा का अर्थ बताइये। उत्तर- लोक में चार उत्तम हैं, अरिहंत परमेष्ठी लोक में उत्तम हैं, सिद्ध परमेष्ठी लोक में उत्तम हैं, आचार्य उपाध्याय साधु परमेष्ठी लोक में उत्तम हैं एवं केवलिभगवान के द्वारा बताया गय धर्म लोक में उत्तम हैं। प्रश्न 24- चत्तारि सरणं पव्वञ्जामि - का अर्थ बताइये? उत्तर- मैं चार की शरण जाता हूं अरिहंत की शरण जाता हूं, सिद्ध की शरण् जाता हूं, आचार्य उपाध्याय साधु की शरण जाता हूं केवली भगवान के द्वारा बताये गये धर्म की शरण जाता हूं।   प्रश्न 25 - आचार्य उपाध्याय और साधु इन तीन परमेष्ठियों को एक शब्द में क्या कहते हैं? उत्तर- आचार्य उपाध्याय और साधु इन तीनों को साहू (साधू) कहा जाता है। प्रश्न 26 - पंच परमेष्ठियों में देव और गुरू कौन-कौन है? उत्तर- पंच परमेष्ठियों में अरिहंत सिद्ध देव हैं, आचार्य, उपाध्याय और साधू गुरू हैं। प्रश्न 27 - णमोकार मंत्र को सुनकर प्राप्त करने वाले किन्हीं तीन जीवों के नाम बताइये। उत्तर- कुत्ता, नाम युगल, तथा बैल। प्रश्न 28 - जीवों को णमोकार मंत्र सुनाने वाले ख्याति प्राप्त किन्हीं तीन महानुभावों के नाम बताइये। उत्तर- जीवंधर स्वामी, भगवान पाश्र्वनाथ एवं भगवान राम। प्रश्न 29 - राम भगवान कैसे हैं? उत्तर- जितने मोक्षगामी जीव हैं सभी को भगवान संज्ञा है। राम भी कर्मों का नाश करके मांगीतुंगी से मोक्ष गये हैं। अतः राम भी भगवान हैं। प्रश्न 30 - णमोकार मंत्र बैंक वर्तमान में कहां है और इसके संस्थापक का नाम क्या है। उत्तर- णमोकार मंत्र बैंक इस समय उत्तर प्रदेश राज्य में मेरठ जिले में अतिश्य क्षेत्र जम्बूद्वीप में हैं। इसकी संस्थापिका इस युग की प्रथम बाल सती आर्यिका शिरोमणि परम पूज्य गणिनी आर्यिका रत्न श्री ज्ञानमती माताजी हैं। प्रश्न 31 - णमोकार मंत्र बैंक में क्या होता है? उत्तर- णमोकार मंत्र बैंक में जो महानुभाव खाता खोलकर 1 वर्ष में सवालाख, पचास हजार, पच्चीस हजार मंत्र लिखकर जमा कराते हैं उन्हें हीरक पदक, स्वर्ण पदक तथा रजत पदक से सम्मानित किया जाता है। प्रश्न 32 - ये सम्मान कब किया जाता है? उत्तर- ये सम्मान परम गणिनी आर्यिका-रत्न श्री ज्ञानमती माताजी के प्रत्येक जन्म दिवस शरद पूर्णिमा जो अक्टूबर में आता है, दिया जाता है। प्रश्न 33 - वर्तमान में णमोकार मंत्र बाबा के नाम से कौन-से साधु प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं? उत्तर- वर्तमान में परम पूज्य आचार्य श्री कल्याण सागरजी महाराज णमोकार मंत्र वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। प्रश्न 34 - भगवान पाश्र्वनाथ ने किसको णमोकार मंत्र सुनाया था? उत्तर- भगवान पाश्र्वनाथ ने जलते हुए नाग-नागिन को णमोकार मंत्र सुनाया था। प्रश्न 35 - नाग-युगल ने णमोकार मंत्र सुनकर क्या फल प्राप्त किया? उत्तर- नाग-युगल णमोकार मंत्र सुनकर पातालाधिपति व्यंतरेन्द्र पद्मावती-धरणेन्द्र हो गये। जहां उन्होंने सम्यक्दर्शन को धारण किया। jain temple75 प्रश्न 36 - मरते हुए कुत्ते को णमोकार मंत्र किसने सुनाया था? उत्तर- मरते हुए कुत्ते को णमोकार मंत्र राजकुमार जीवंधर स्वामी ने सुनाया था। प्रश्न 37 - कुत्ते ने णमोकार मंत्र सुनकर क्या फल प्राप्त किया? उत्तर- णमोकार मंत्र सुनकर कुत्ता सुदर्शन नाम का यक्षेन्द्र देव हो गया। प्रश्न 38 - मरते हुए बैल को णमोकार मंत्र किसने सुनाया? उत्तर- मरते हुए बैल को णमोकार मंत्र राम ने सुनाया था। प्रश्न 39 - बैल ने णमोकार मंत्र को सुनकर क्या फल प्राप्त किया? उत्तर- बैल का जीव ही सुग्रीव हुआ। प्रश्न 40 - अंजन चोर ने णमोकार मंत्र का क्या फल प्राप्त किया? उत्तर- जिनदत्त सेठ से प्राप्त णमोकार को परोक्ष में प्राप्त करके बतायी विधि से जिनदत्त सेठ के वचनों के प्रमाणित मानकर आकाशगामी विद्या को प्राप्त किया तथा कर्मों का नाश करके मोक्ष को प्राप्त हुआ। प्रश्न 41 - णमोकार मंत्र का अपमान किसने किया था? उत्तर- णमोकार मंत्र का अपमान हस्तिनापुर के चक्रवर्ती राजा सुभौम ने किया था। प्रश्न 42 - चक्रवर्ती सुभौम ने णमोकार मंत्र का अपमान क्यों किया? उत्तर- अपने प्राण बचाने के लिए सुभौम चक्रवर्ती ने णमोकार मंत्र का अपमान किया। प्रश्न 43 - णमोकार मंत्र की प्रसिद्ध हिन्दी पूजा रचयिता का नाम बताइये। उत्तर- णमोकार मंत्र की हिन्दी पूजा रचयित्री का नाम परम पूज्य गणिनी आर्यिका रत्न श्री ज्ञानमती माताजी है। प्रश्न 44 - सुभौम चक्रवर्ती ने णमोकार मंत्र का अपमान किस प्रकार किया? उत्तर- सुभौम चक्रवर्ती ने णमोकार मंत्र को लिखकर उसके ऊपर पैर रखकर णमोकार मंत्र का अपमान किया। jain temple76 प्रश्न 45 - णमोकार के अपमान का चक्रवर्ती को क्या फल मिला? उत्तर- व्यंतर देव ने चक्रवर्ती को लवण समुद्र में डुबा दिया जिससे चक्रवर्ती मरकर सातवें नरक चला गया। प्रश्न 46 - तीन कम नौ करोड़ मुनिराजों की गणना किस अपेक्षा से है? उत्तर- यह गणना 14 गुणस्थानों की अपेक्षा से हैं प्रश्न 47 - तीन कम नौ करोड़ मुनिराजों में कौन-कौन से परमेष्ठी आते हैं? उत्तर- तीन कम नौ करौड़ मुनिराजाअें में अरिहंत आचार्य, उपध्याय और साधु ये चार परमेष्ठी आते हैं। प्रश्न 48 - णमोकार मंत्र के नाम से कौन सा व्रत किया जाता है? उत्तर- णमोकार मंत्र के नाम से णमोकार पैंतीसी का व्रत किया जाता है क्योकि णमोकार मंत्र में 35 अक्षरी होते हैं। इसमें एक अक्षर का एक उपवास इस प्रकार कुल 35 उपवास किया जाते हैं। प्रश्न 49 - इस व्रत में कैान-सी तिथि के कितने उपवास किये जाते हैं? उत्तर- इस व्रत में पंचमी के पांच, सप्तमी के सात, नवमी के नौ तथा चैदस के चैदह उपवास किये जाते हैं। प्रश्न 50 - ये व्रत कब प्रारम्भ किया जाता है? उत्तर- यं व्रत किसी भी मास की पंचमी, सप्तमी, नवमी या चैदस को प्रारम्भ किया जा सकता है। प्रश्न 51 - इस व्रत में उपवास के समय क्या किया जाता है? उत्तर- इस व्रत में उपवास के दिन भगवान जिनेन्द्र का अभिषेक करके णमोकार मंत्र का पूजन तथा जाप करना चाहिए। प्रश्न 52 - इस व्रत में कौन से मंत्र का जाप करना चाहिए? उत्तर- इस व्रत में णमोकार मंत्र के निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए- ऊँ ह्मां णमो अरिहंताणं, ऊँ ह्मीं णमो सिद्धाणं, ऊँ ह्मूं णमो आयरियाणं, ऊँ ह्मौं उवज्झायाणं, ऊँ ह्मः णमो लोएसव्वसाहूणं। प्रश्न 53 - इस व्रत का उद्यापन किस प्रकार करना चाहिए? उत्तर- इस व्रत के उद्यापन में पंच परमेष्ठी विधान करके मंदिर में 35 प्रकार के 35-35 या इतना सम्भव नहीं हो सके तो 35 वस्तुएं मंदिर में दान देना चाहिए। प्रश्न 54 - णमोंकार मंत्र के पांचों पदों में कितने अक्षर हैं? उत्तर- णमोकार मंत्र में पांचों पदों में पैंतीस अक्षर हैं। प्रश्न 55 - प्रथम पद मणे अरिहंताणं में कितने अक्षर है?ं उत्तर- द्वितीय पद णमो सिद्धांणं में 7 अक्षर अक्षर हैं। प्रश्न 56 - द्वितीय पद णमो सिद्धाणं में कितने अक्षर हैं? उत्तर- द्वितीय पद णमो सिद्धाणं में 5 अक्षर हैं। प्रश्न 57 - तृतीय पद णमो आयरियाणं में कितने अक्षर है? उत्तर- तृतीय पद णमो आयरियाणं में सात अक्षर हघ्ैं। jain temple77 प्रश्न 58 - चैथे पद णमो उवज्झायाणं में कितने अक्षर हैं? उत्तर- चैथे पद उवज्झायाणं में सात अक्षर हैं। प्रश्न 59 - पांचवे पद णमो लोए सव्वसाहूणं में कितने अक्षर हैं? उत्तर- पांचवें पद णमो लोए सव्वसाहूणं में नौ अक्षर हैं। प्रश्न 60 - णमोकार मंत्र को आर्या छन्दमें किस प्रकार पढ़ेंगे? उत्तर- णमोकार मंत्र को आर्याछन्द में निम्न प्रकार चार चरणों में पढ़ेंगे- णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं। णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।। प्रश्न 61 - आर्याछन्द के अनुसार णमोकार मंत्र के चारों चरणों में कितनी मात्रायें होती हैं? उत्तर- णमोकार मंत्र के चारों चरणों में सत्तावन मात्रायें होती हैं। प्रश्न 62 - णमोकार मंत्र के प्रथम चरण णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं में कितनी मात्रायेंह ैं? उत्तर- णमोकार मंत्र के उपरोक्त प्रथम चरण में बारह मात्रायें हैं। प्रश्न 63 - णमोकार मंत्र के द्वितीय चरण णमो आयरियाणं में कितनी मात्रायें हैं? उत्तर- णमोकार मंत्र के उपरोक्त द्वितीय चरण में पन्द्रह मात्रायें हैं। प्रश्न 64 - णमोकार मंत्र के तृतीय चरण मणे उवज्झायाणं में कितनी मात्रायेंह ैं? उत्तर- णमोकार मंत्र के उपरोक्त तृतीय चरण में बारह मात्रायें हैं। प्रश्न 65 - णमोकार मंत्र के पैंतीस अक्षरों को गिनाइये। उत्तर- णमोकार मंत्र के 35 अक्षर निम्न प्रकार हैं- 1. ण 2. मो 3. अ 4. रि 5. हं 6. ता 7. ण्पं 8. ण 9. मो 10 सि 11. द्धा 12. णं 13. ण 14 मो 15 आ 16. य 17. रि 18 या 19. णं 20. ण 21 मो 22. उ 23. व 24. ज्झा 25. या 26. णं 27. ण 28. मो 29. लो 30. ए 31. स 32. व्व 33. सा 34. हू 35. णं jain temple78 प्रश्न 66n> आचार्य श्री उमास्वामी महाराज ने। प्रश्न 67 - णमोकार मंत्र के अन्य स्तोत्र का नाम बताइये। उत्तर- णमोकार मंत्र के अन्य स्तोत्र का नाम है वज्र पंजर स्तोत्र। प्रश्न 68 - णमोकार मंत्र नवग्रह अरिष्ट निवारक किस प्रकार है? उत्तर- णमोकार मंत्र के पांचों पद मिलकर नवग्रह अरिष्ट का नाश करते हैं। प्रश्न 69 - नवग्रह क्या हैं? उत्तर- ज्योतिषी देवों के नो विमानों को नवग्रह कहा है। प्रश्न 70 - वे नवग्रह कौन-कौन से हैं? उत्तर- 1 - सूर्य 2 - चन्द्र 3 - मंगल, 4 - बुध 5 - गुरू 6 - शुक्र 7 - शनि 8 - राहू 9 - केतू प्रश्न 71 - णमोकार मंत्र में सूर्य ग्रह अरिष्ट निवारण का मंत्र बताइये। उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो सिद्धांण रवि ग्रह अरिष्ट निवारण कुरू-कुरू स्वाहा। प्रश्न 72 - णमोकार मंत्र में से चन्द्रग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये। उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो अरिहंताण मम चन्द्र अरिष्ट निवरण कुरू-कुरू स्वाहा। प्रश्न 73 - णमोकार मंत्र में से मंगल ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये। उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो सिद्धांणं मम मंगलग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा। प्रश्न 74 - णमोकार मंत्र में से बुघ ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये। उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो उवज्झायाणं मम बुध ग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा। jain temple79 प्रश्न 75 - णमोकार मंत्र में से गुरू ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये। उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो आयरियाणं मम गुरू ग्रह अरष्टि निवारणं कुरू कुरू स्वाहा। प्रश्न 76 - णमोकार मंत्र में से शुक्र ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये। उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो अरिहंताणं मम शुक्र ग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा। प्रश्न 77 - णमोकार मंत्र में से शनि ग्रह निवारक मंत्र बताइये। उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो लोए सव्वासाहूणं मम शनि ग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू ह्मीं नमः। प्रश्न 78 - णमोकार मंत्र में से राहू ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये। उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो लोए सव्वसाहूणं मम राहु ग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा। प्रश्न 79 - णमोकार मंत्र का केतु ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये। उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो लोए सव्वसाहूणं मम केतु ग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा। प्रश्न 80 - अरिहंत परमेष्ठी कौन-कौन से ग्रहों का अरिष्ट निवारण करते हैं? उत्तर- वैसे तो पांचों परमेष्ठी समस्त नौ ग्रहों का अरिष्ट निवारण करने में असमर्थ हैं। फिर भी अरिहंत परमेष्ठी चन्द्र एवं शुक्र ग्रह के अरिष्ट का नाश करते हैं। प्रश्न 81 - सिद्ध परमेष्ठी कौन-से ग्रह का अरिष्ट निवारण करते हैं? उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी सूर्य एवं मंगल गृह के अरिष्ट का नाश करते हैं। प्रश्न 82 - आचार्य परमेष्ठी कौन-से ग्रह का अरिष्ट नाश करते हैं? उत्तर- आचार्य परमेष्ठी गुरू ग्रह का अरिष्ट नाश करते हैं। प्रश्न 83 - उपाध्याय परमेष्ठी कौन-से ग्रह का अरिष्ट नाश करते हैं? उत्तर- उपाध्याय परमेष्ठी बुध ग्रह का अरिष्ट नाश करते हैं। प्रश्न 84 - साधु परमेष्ठी कौन-से ग्रह का अरिष्ट नाश करते हैं? उत्तर- साधु परमेष्ठी शनि, राहु एवं केतु इन तीन ग्रहों के अरिष्ट का नाश करते हैं। प्रश्न 85 - सूर्य ग्रह अरिष्ट निवारण के कितनी जाज्यें की जाती हैं? उत्तर- सूर्य ग्रह अरिष्ट निवारण के लिए 10,000 जाप्य मंत्र, 100 माला करना चाहिए। प्रश्न 86 - चन्द्रग्रह अरिष्ट निवारण के लिए कितनी जाज्यें करना चाहिए? उत्तर- चन्द्र ग्रह निवारण के लिए 10,000 जाप्यें 100 माला करना चाहिए। प्रश्न 87 - बुध ग्रह अरिष्ट निवारण एवं अन्य ग्रहों के अरिष्ट निवारण के लिए कितनी माला करना चाहिए? उत्तर- प्रत्येक ग्रह अरिष्ट निवारण के लिए कम से कम दस हजार अधि से अधिक सवा लाख जाप्य मंत्र अर्थात 1250 मालाएं करना चाहिए। मालाएं पूर्ण होने दश मांश 1/10 पाज्य मंत्रों की हवनपूर्वक पूर्ण आहुति देना चाहिए। प्रश्न 88 - णमोकार मंत्र में कितनी मात्रायें होती हैं? उत्तर- णमोकार मंत्र में 58 मात्रायें होती हैं। jain temple80 प्रश्न 89 - णमोकार मंत्र में 58 मात्राएं किस प्रकार हैं? उत्तर- णमोकार मंत्र के प्रथम पद में ग्यारह मात्रायें, द्वितीय पद में आठ, तृतीय पद में ग्यारह, चतुर्थ पद में बारह , एवं पंचम पद में सोलह कुल मिलाकर (11$8$11$12$16 = 58) मात्रायें हुई। प्रश्न 90 - णमोकार मंत्र के प्रथम पद की मात्राओं को गिनाइये। उत्तर- णमो अरिहंताणं ।ऽ ।।ऽऽऽ कुल ग्यारह मात्रायें प्रश्न 91 - णमोकार मंत्र के द्वितीय पद की मात्राओं को गिनइये। उत्तर- ।ऽ ।।ऽ ऽ कुल आठ मात्रायें प्रश्न 92 - णमोकार मंत्र के तृतीय पद की मात्राओं को गिनाइये। उत्तर- णमो आयरियाणं ।ऽ ऽ।।ऽऽ कुल ग्यारह मात्रायें प्रश्न 93 - णमोकार मंत्र के चैथे पद की मात्राओं को गिनाइये। उत्तर- णमो उवज्झायाणं ।ऽ ।।ऽ ऽ ऽ कुल बारह मात्रायें प्रश्न 94 - णमोकार मंत्र के पांचवें पद की मात्राओं को गिनाइये। उत्तर- णमो लोए सव्व साहूणं ।ऽ ऽ ऽ ऽ।।ऽ ऽ ऽ कुल सोलह मात्रायें प्रश्न 95 - णमोकार मंत्र में कितने स्वर तथा कितने व्यंजन हैं? उत्तर- णमोकार मंत्र में 34 स्वर तथा 30 व्यंजन हैं। कुछ चैसठ वर्ण हैं। प्रश्न 96 - णमोकार मंत्र की ज्ञान के रूप में क्या विशेषता है? उत्तर- णमोकार मंत्र में सम्पूर्ण द्वादशांग श्रुत समाहित माना गया है। jain temple81 प्रश्न 97 - णमोकार मंत्र में द्वादशांग किस प्रकार समाहित हैं? उत्तर- णमोकार मंत्र के चैसठ वर्णों को अलग-अलग लिखकर प्रत्येक के ऊपर दो का अंक रखकर गुणा करने से प्राप्त हुई संख्या में एक घटाने से द्वादशांग के श्रुत अक्षर प्राप्त हो जाते हैं। प्रश्न 98 - द्वादशांग के अक्षरों की संख्या बताइये। उत्तर- संख्या इस प्रकार हैं- 18446744073709551615। प्रश्न 99 - वर्तमान में णमोकार मंत्र के प्रभाव से व्यंतर बाधाओं को कौन-से मुनिराज दूर कर रहे हैं? उत्तर- परम पूज्य वालाचार्य श्री योगीन्द्र सागरजी महाराज। प्रश्न 100 - उन्हें ये सिद्धी कहां से प्राप्त हुई? उत्तर- अतिशय क्षेत्र चांदखेडी में भगवान श्री आदिनाथ की अतिशययुक्त प्रतिमा दर्शन करने से।
।। तीस चैबीसी के तीर्थंकर ।। श्न 1 - ये तीस चैबीसी क्या है? उत्तर - ढाई द्वीप के अंदर मेरूओं से सम्बंधित पांच भरत एवं पांच ऐरावत ऐसे देश क्षेत्रों के प्रत्येक कर्मकाल में चैबीस-चैबीस तीर्थंकर होते हैं। भूतकाल की दशा क्षेत्रों की दश चैबीसी वर्तमान काल की दशएवं भविष्यत काल की दश ऐसी तीस चैबीसी होती है। jain temple165 प्रश्न 2 - कुछ चैबीसी कितनी होती है? उत्तर - ऐसे तो अनंत चैबीसी होती हैं। प्रश्न 3 - तीस चैबीसी के कुल कितने तीर्थंकर होते हैं? उत्तर - 30 गुण 24 कुल 720 तीर्थंकर होते हैं। प्रश्न 4 - पांच भरत एवं पांच ऐरावत कहां-कहां है? उत्तर - जम्बूद्वीप के सुदर्शन मेरू से सम्बंधित एक भरत तथा एक ऐरावत है। धातकी खंड के विजय मेरू अचल मेरू से सम्बंधित दो भरत तथा दो ऐरावत क्षेत्र हैं तथा पुष्करार्ध द्वीप में मंदर मेरू विद्युन्माली मेरू से सम्बंधित दो भरत तथा दो ऐरावत क्षेत्र हैं इस प्रकार पांच भरत पांच ऐरावत क्षेत्र हैं। प्रश्न 5 - जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के भूत कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री निर्वाण जी (2) श्री सागर जी (3) श्री महासाधु जी (4) श्री विमल प्रभु जी (5) श्रीधरजी (6) श्री सुदत्त जी (7) श्री अमलप्रभ जी (8) श्री उद्धर जी (9) श्री अंगिर जी (10) श्री संमति जी (11) श्री सिंधु जी (12) श्री कुसमांजलि जी (13) श्री शिवण जी (14) श्री उत्साह जी (15) श्री ज्ञानेश्वर जी (16) श्री परमेश्वर जी (17) श्री विमलेश्वर जी (18) श्री यशोधर जी (19) श्री विमलेश्वर जी (20) श्री ज्ञानमति जी (21) श्री शुद्धमति जी (22) श्री भद्र जी (23) श्री अतिक्रांत जी (24) श्री शांत जी। प्रश्न 6 - जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के वर्तमान काल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री आदिनाथ जी (2) श्री अजितनाथ जी (3) श्री संभवनाथ जी (4) श्री अभिनंदन नाथ जी (5) श्री सुमतिनाथ जी (6) श्री पुष्पदंत जी (7) श्री सुपाश्र्वनाथ (8) श्री चंदाप्रभु जी (9) श्री पुष्पदंत जी (10) श्री शीतलनाथ जी (11) श्री श्रेयांसनाथ जी (12) श्री वासुपूज्य जी (13) श्री विमलनाथ जी (14) श्री अनंतनाथ जी (15) श्री धर्मनाथ जी (16) श्री शांतिनाथ जी (17) श्री कुंथुनाथ जी (18) श्री अरहनाथ जी (19) श्री मल्लिनाथ जी (20) श्री मुनिसुव्रतनाथ जी (21) श्री नमिनाथ जी (22) श्री नेमिनाथ जी (23) श्री पाश्र्वनाथ जी (24) श्री वर्धमान जी। प्रश्न 7 - जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के भविष्यत कालीन तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री महापद्म जी (2) श्री सुरदेव जी (3) श्री सुपाश्र्व जी (4) श्री स्वयंप्रभ जी (5) श्री सर्वात्मभूत जी (6) श्री देवपुत्र जी (7) श्री कुल पुत्र जी (8) श्री उदंक जी (9) श्री प्रौष्ठिल्य जी (10) श्री जय कीर्ति (11) श्री मुनिसुव्रत जी (12) श्री अरहनाथ जी (13) श्री निष्पाय जी (14) श्री निष्काय जी (15) श्री विपुल जी (16) श्री निर्मल जी (17) श्री चित्रगुप्त जी (18) श्री समाधिगुप्त जी (19) श्री स्वयंभू जी (20) श्री अनिवर्तक जी (21) श्री जयनाथ जी (22) श्री विमलजी (23) श्री देवपाल जी (24) श्री अनंतवीर्य जी। प्रश्न 8 - जम्बूद्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भूतकालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री पंचरूप जी (2) श्री जिनधर जी (3) श्री सांप्रतिक जी (4) श्री उर्जयंत जी (5) श्री आधिक्षायिक जी (6) श्री अभिनंदन जी (7) श्री रत्नसेन जी (8) श्री रामेश्वर जी (9) श्री अनंगोञ्झित जी (10) श्री विन्यास जी (11) श्री अरोष जी (12) री सुविधान जी (13) श्री प्रदत्त जी (14) श्री कुमार जी (15) श्री सर्वशैल जी (16) श्री प्रभंजन जी (17) श्री सौभाग्य नाथ जी (18) श्री व्रत विंदु जी (19) श्री सिद्धकर जी (20) श्री ज्ञान शरीर जी (21) श्री कल्पदु्रम जी (22) श्री तीर्थकलेश जी (23) श्री दिनकर जी (24) श्री वीरप्रभु जी। प्रश्न 9 - जम्बूद्वीप के ऐरावत क्षेत्र के वर्तमान कालिक चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री बालचंद्र जी (2) श्री सुव्रत जी (3) श्री अग्निसेन जी (4) श्री नंदिसेन जी (5) श्रीदत्त जी (6) श्रीव्रतधर जी (7) श्री सोमचन्द्र जी (8) श्री धृतिदीर्घ जी (9) श्री शताष्यु जी (10) श्री विवसित जी (11) श्री श्रेयान जी (12) री विश्रुतजल जी (13) श्री सिंहसेन जी (14) श्री उपशाांत जी (15) श्री गुप्तशासन जी (16) श्री अनंतवीर्य जी (17) श्री पाश्र्वजिनेन्द्र जी (18) श्री अभिधानजी (19) श्री मरूदेव जी (20) श्री श्रीधरजी (21) श्री शामकंठ जी (22) श्री अग्निप्रभ जी (23) श्री अग्निदत्त जी (24) श्री वीरसेन जी। प्रश्न 10 - जम्बूद्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भविष्यत कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री सिद्धार्थजी (2) श्री विमल जी (3) श्री जयघोष जी (4) श्री नंदिसेन जी (5) श्री स्वर्गमंगल जी (6) श्री वज्राधरी जी (7) श्री निर्वाण जी (8) श्री धर्मध्वज जी (9) श्री सिद्धसेन जी (10) श्री महासेन जी (11) श्री रविमित्र जी (12) श्री सत्यसेनजी (13) श्री चन्द्रनाथ जी (14) श्री महीचन्द्र (15) श्री श्रुतांजन जी (16) श्री देवसेन जी (17) श्री सुव्रतनाथ जी (18) श्री जिनेन्द्रनाथ जी (19) श्री सुपाश्र्वजी (20) श्री सुकौशल जी (21) श्री अनंतनाथ जी (22) श्री विमल जी (23) श्री अमृतसेन जी (24) श्री अग्निदत्त जी। प्रश्न 11 - पूर्व धातकी खंड के भरत क्षेत्र के भूतकालीन चैबीसी तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री रत्न प्रभुजी (2) श्री अमित नाथ जी (3) श्री संभवनाथ जी (4) श्री अकलंक जी (5) श्री चन्द्रस्वामी (6) श्री शुभंकर जी (7) श्री तत्वनाथ जी (8) श्री सुन्दर स्वामी जी (9) श्री पुरंधरजी (10) श्री स्वामिदेव जी (11) श्री देवदत्त जी (12) श्री वासवदत्त जी (13) श्री श्रेयोनाथ जी (14) श्री विश्वरूपजी (15) श्री तपस्तेज जी (16) श्री प्रतिवोधदेव जी (17) श्री सिद्धार्थ देव जी (18) श्री संजमजिन जी (19) श्री विमलनाथ जी (20) श्री देवेन्द्र जी (21) श्री प्रवरनाथ जी (22) श्री विश्वसेन जी (23) श्री मेघनंदि जी (24) त्रिजेत्रक जी। प्रश्न 12 - पूर्वधातकी खंड के भरत क्षेत्र के वर्तमान कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री युगादिदेव जी (2) श्री सिद्धांतजी (3) श्री महेशनाथ जी (4) श्री परमार्थनाथ जी (5) श्री समुन्द्र जी (6) श्री भूधरनाथ जी (7) श्री उद्योत जी (8) श्री आर्जव जी (9) श्री अभयनाथ जी (10) श्री अप्रकंप जी (11) श्री पद्मनाथ जी (12) श्री पद्मनंदि जी (13) श्री प्रियंकर जी (14) श्री सुक्रतनाथ जी (15) श्री भद्रनाथ जी (16) श्री मुनिचन्द्र जी (17) श्री पंचमुष्ठिजी (18) श्री त्रिमुष्ठि जी (19) श्री गांगिक नाथ जी (20) श्री गणनाथ जी (21) श्री सर्वांगदेव जी (22) श्री ब्रहमेन्द्रनाथ जी (23) श्री इन्द्रद्रत जी (24) श्री नायक नाथ जी प्रश्न 13 - पूर्व धातकी खंड के भरत क्षेत्र के भविष्यत कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री सिद्धार्थ देव जी (2) श्री सम्यगुण जी (3) श्री जिनेन्द्रदेव जी (4) श्री सम्पन्ननाथ जी (5) श्री सर्वस्वामिजी (6) श्री मुनिनाथ जी (7) श्री विशिष्ट देव जी (8) श्री अमरनाथ जी (9) श्री ब्रहमशांति जी (10) श्री पाश्र्वनाथ जी (11) श्री अकामुक देव जी (12) श्री ध्याननाथ जी (13) श्री कल्पजी (14) श्री संवरनाथ जी (15) श्री स्वास्थ्यनाथ जी (16) श्री आनंदनाथ जी (17) श्री रविप्रभ जी (18) श्री चन्द्रप्रभ जी (19) श्री सुनन्द जी (20) श्री सुकर्ण देव जी (21) श्री पाश्र्वनाथ जी (21) श्री पाश्र्वनाथ जी (24) श्री शाश्वतनाथ जी। प्रश्न 14 - पूर्वी धातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र के भूतकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री वज्रस्वामी जी (2) श्री उदत्त जी (3) श्री सूर्यस्वामी जी (4) श्री पुरूषोत्तम जी (5) श्री शरणस्वामि जी (6) श्री अवबोध जी (7) श्री विक्रम जी (8) श्री निघंटिक जी (9) श्री हरीन्द्र जी (10) श्री परित्रेरित जी (11) श्री निर्वाण सूरि जी (12) श्री धर्महेतु (13) श्री चतुर्मुख जी (14) श्री सुक्रतेन्द्र जी (15) श्री श्रुताम्बु जी (16) श्री विमलार्क जी (17) श्री देवप्रभ जी (18) श्री धरणेन्द्र जी (19) श्री सुतीर्थनाथ जी (20) श्री उदयानंद जी (21) श्री सवार्थ देव जी (22) श्री धार्मिक जी (23) श्री क्षेत्रस्वामी जी (24) श्री हरिचंद्र जी प्रश्न 15 - पूर्व धातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र े वर्तमान कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री अपश्चिम जी (2) श्री पुष्पदंत जी (3) श्री अर्हंदेव जी (4) श्री चरित्रनाथ जी (5) श्री सिद्धानंद जी (6) श्री नंदग जी (7) श्री पद्मकूप जी (8) श्री उदयनाभि जी (9) श्री अकमेन्द्र जी (10) श्री कृपालु जी (11) श्री प्रोष्ठिल जी (12) श्री सिद्धेश्वर जी (13) श्री अमृतेन्दु जी (14) श्री स्वामिनाथ जी (15) श्री भुवन लिंग जी (16) श्री सर्वरथ जी (17) श्री मेघनंद जी (18) श्री नंदकेश जी (19) श्री हरिनाथ जी (20) श्री अधिष्ठ जी (21) श्री शांतिक देव जी (22) श्री नंदस्वामिजी (23) श्री कुंदपाश्र्वजी (24) श्री विरोचन जी। प्रश्न 16 - पूर्व धातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र के भविष्यतकालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री प्रवरवीर जी (2) श्री विजयप्रभ जी (3) श्री सत्यपद जी (4) श्री महामृगेन्द्र जी (5) श्री चिंतामणि जी (6) श्री अशोक जी (7) श्री द्विमृगेन्द्र जी (8) श्री उपवासिक जी (9) श्री पद्मनंद जी (10) श्री बोधकेन्द्र जी (11) री चिंताहिम जी (12) श्री उत्साहिक जी (13) श्री अपाशिव जी (14) श्री देवजल जी (15) श्री नारिक जी (16) श्री अनध जी (17) श्री नागेन्द्र जी (18) श्री नीलोत्पल जी (19) श्री अप्रकंप जी (20) श्री पुरोहित जी (21) श्री अप्रकंप जी (22) श्री पाश्र्वनाथ जी (23) श्री निर्वाच जी (24) श्री विरोषिक जी प्रश्न 17 - पश्चिम धातकी खंड के भरत क्षेत्र के भूतकालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री वृषभनाथ जी (2) श्री प्रियमित्र जी (3) श्री शांतिनाथ जी (4) श्री सुमतिनाथ जी (5) श्री आदिनाथ जी (6) श्री आतिव्यक्त जी (7) श्री कलासेन जी (8) श्री कर्मजित जी (9) श्री प्रबुद्ध जी (10) श्री प्रवजित जी (11) श्री सुधर्म जी (12) श्री तमोदीप जी (13) श्री वज्रनाथ जी (14) श्री बुद्धनाथ जी (15) श्री प्रबंधदेव जी (16) श्री अतीतनाथ जी (17) श्री प्रमुख जिनेन्द्र जी (18) श्री पल्योपम जी (19) श्री अकोप जी (20) श्री निष्ठित जी (21) श्री मृगनाभि जी (22) श्री देवेन्द्र जी (23) श्री पदस्थ जी (24) श्री शिवनाथ जी। प्रश्न 18 - पश्चिमी धातकी खंड के भरत क्षेत्र के वर्तमान चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री विश्वचन्द्र जी (2) श्री कपिल जिनेन्द्र जी (3) श्री वृषभदेव जी (4) श्री प्रियतेज जी (5) श्री प्रशम जिनेन्द्र जी (6) श्री वषिमांग जी (7) श्री चरित्रनाथ जी (8) श्री प्रभादित्य जी (9) श्री मुंजकेश जी (10) श्री वीतवास जी (11) श्री सुराधिप जी (12) श्री दयानाथ जी (13) श्री सहस्त्रभुज जी (14) श्री जिनसिंह जी (15) श्री रैवतनाथ जी (16) श्री बाहुस्वामिजी (17) श्री श्रीमालि जी (18) श्री अयोग देव जी (19) श्री अयोगिनाथ जी (20) श्री कामरिपु जी (21) श्री आरम्भ जी (22) श्री नेमिनाथ जी (23) श्री गर्भज्ञाति जी (24) श्री एकार्जित जी प्रश्न 19 - पश्चिमी धातकी खंड के भरत क्षेत्र के भविष्यतकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री रक्त केश जी (2) श्री चक्रहस्त जी (3) री कृतनाथ जी (4) श्री परमेश्वर जी (5) श्री सुमूर्ति जी (6) श्री मुक्तिकांत जी (7) श्री निकेशि जी (8) श्री प्रशस्त जी (9) श्री निराहार जी (10) श्री अमूर्त जी (11) श्री द्विजनाथ जी (12) श्री श्रेयोगत जी (13) श्री अरूजनाथ जी (14) श्री दयाधिक जी (15) श्री दयाधिक जी (16) श्री पुष्पनाथ जी (17) श्री नरनाथ जी (18) श्री प्रतिभूति जी (19) श्री नागेन्द्र जी (20) श्री तपोधिक जी (21) श्री दशानन जी (22) श्री आरण्यक जी (23) श्री दशानीक जी (24) श्री सात्विक जी। प्रश्न 20 - पश्चिमी घातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र के भूतकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री सुमेरू जिनेन्द्र जी (2) श्री जिनकृत जी (3) श्री कैंटभनाथ जी (4) श्री प्रशस्त दायक जी (5) श्री निर्दमन जी (6) श्री कुलकर जी (7) री वर्धमान जी (8) श्री अमृतेन्दु जी (9) श्री संख्यानंद जी (10) श्री कल्पकृत जी (11) श्री हरिनाथ जी (12) श्री बाहुस्वामि जी (13) श्री भार्गव जी (14) श्री सुभद्रस्वामी जी (15) श्री पविपाणि जी (16) श्री विपोषित जी (17) श्री ब्रह्मचारि जी (18) श्री असांक्षिक जी (19) श्री चारित्रेश जी (20) श्री पारिणामिक जी (21) श्री शाश्वतनाथ जी (22) श्री निधिनाथ जी (23) श्री कौशिक जी (24) श्री धर्मेशजी। प्रश्न 21 - पश्चिमी धातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र के वर्तमान के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री साधित जी (2) श्री जिनस्वामि जी (3) श्री स्तमितेन्द्र जी (4) श्री अत्यानंद जी (5) श्री पुव्पोत्फुल्लजी (6) श्री मंडित जी (7) श्री प्रहित देव जी (8) श्री मदनसिद्ध जी (9) श्री हसदिंद्र जी (10) श्री चन्द्रपाश्र्वजी (11) श्री अब्जबोध जी (12) श्री जिनवल्लभ जी (13) श्री सुविभूति जी (14) श्री कुकुद्भास जी (15) श्री सुवर्णनाथ जी (16) श्री हरिवासिक जी (17) श्री प्रियमित्र जी (18) श्री धर्मदेव जी (19) श्री प्रियरत जी (20) श्री नंदिनाथ जी (21) श्री अश्वानीक जी (22) श्री पूर्वनाथ जी (23) श्री पाश्र्वनाथ जी (24) श्री चित्रहृदय जी। प्रश्न 22 - पश्चिमी धातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र के भाविकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री रवीन्दु जी (2) श्री सोम कुमार जी (3) श्री पृथ्वीनाथ जी (4) श्री कुलरत्न जी (5) श्री धर्मनाथ जी जी (6) श्री सोमजिन जी (7) श्री वरूणेन्द्र जी (8) श्री अभिनंदन जी (9) श्री सर्वनाथ जी (10) श्री सुदृष्टि जी (11) श्री शिष्ट जी (12) श्री धन्य जिनेन्द्रजी (13) श्री सोमचन्द्र जी (14) श्री क्षेत्राधीश जी (15) श्री संदतिकनाथजी (16) श्री जयंतदेव जी (17) श्री तमोरिपुर जी (18) श्री निर्मित जी (19) श्री कृतपाश्र्व जी (20) श्री बोधिलाभ जी (21) श्री बहुनंद जी (22) श्री सृदृष्टि जी (23) श्री कुकुभनाथ जी (24) श्री वक्षेश जी। प्रश्न 23 - पूर्वी पुष्करार्धद्वीप के भरत क्षेत्र के भूतकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री दमनेन्द्र जी (2) श्री मूर्तस्वामी जी (3) श्री विराग स्वामी जी (4) श्री प्रलंब जी (5) श्री पृथ्वीपति जी (6) श्री चारित्रनिधी जी (7) श्री अपराजित जी (8) श्री सुबोधक जी (9) श्री बुद्धिशजी जी (10) श्री बैतालिक जी (11) श्री त्रिमुष्टिनाथ जी (12) श्री मुनिबोध जी (13) श्री तीर्थस्वामी जी (14) श्री धर्मधीश जी (15) श्री धरणेश जी (16) श्री प्रभवदेव जी (17) श्री अनादिदेव जी (18) श्री अनादिप्रभु जी (19) श्री सर्वतीर्थनाथ जी (20) श्री निरूपमदेव जी (21) श्री कौमारिक जी (22) श्री विहार गृह जी (23) श्री धरण्ीपूवर जी (24) श्री विकासदेव जी। प्रश्न 24 - पूर्वी पुष्करार्ध द्वीप के भरतक्षेत्र के वर्तमान काल के चैबीस तीर्थंकरों के नात बताइये। उत्तर - (1) श्री जगन्नाथ जी (2) श्री प्रभासनाथ जी (3) श्री स्वरस्वामी जी (4) श्री भरतेश जी (5) श्री दीर्घाननजी जी (6) श्री विख्यात कीर्तिजी (7) श्री अवसानि जी (8) श्री प्रबोध जी (9) श्री तपोनाथ जी (10) श्री पावक जी (11) श्री त्रिपुरेश्वर जी (12) श्री सौगत जी (13) श्री वासव जी (14) श्री मनोहर जी (15) श्रीशुभकर्म जी (16) श्री इष्ट सेवित जी (17) श्री विमलेन्द्र जी (18) श्री धर्मवास जी (19) श्री प्रसाद जी (20) श्री प्रभामृगांक जी (21)श्री उज्झितकलंकजी (22) श्री स्फटिकप्रभा जी (23) श्री गजेन्द्र जी (24) श्री ध्यानजय जी। प्रश्न 25 - पूर्वी पुष्करार्ध द्वीप के भरत क्षेत्र के भाविकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री बसंतध्व जी (2) श्री त्रिजयंत जी (3) श्री त्रिस्तम्भ जी (4) श्री परब्रह्म जी (5) श्री अबालिश जी (6) श्री प्रवादिक जी (7) श्री भूमानंद जी (8) श्री त्रिनयन जी (9) श्री विद्वान जी (10) श्री परमात्मप्रसंग जी (11) श्री भूमीन्द्र जी (12) श्री गौस्वामी जी (13) श्री कल्याण प्रकाशित जी (14) श्री मंडल जी (15) श्री महाबसू जी (16) श्री उदयभाज जी (17) श्री दिव्य ज्योति जी (18) श्री प्रवोधेश जी (19) श्री अभयांक जी (20) श्री प्रमित जी (21) श्री दिव्यस्कारकजी (22) श्री व्रतस्वामी जी (23) श्री निधान जी (24) श्री त्रिविक्रम जी। प्रश्न 26 - पूर्वीपुष्करार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भूतकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री कृतिनाथ जी (2) श्री उपविष्ट जी (3) श्री देवादित्य जी (4) श्री आस्थानिक जी (5) श्री प्रचंद्र जी (6) श्री बेषिक जी (7) श्री त्रिभानु जी (8) श्री ब्रह्म जी (9) श्री व्रजांग जी (10) श्री उविरोधी जी (11) श्री अपाप जी (12) श्री लोकोत्तर जी (13) श्री जलधिशेष जी (14) श्री विद्योत जी (15) श्री सुमेरू जी (16) श्री विभावित जी (17) श्री वत्सल जी (18) श्री जिनालय जी (19) श्री तुषार जी (20) श्री भुवनस्वामि जी (21) श्री सुकाम जी (22) श्री देवाधिदेव जी (23) श्री अकारिम जी (24) श्री बिम्बित जी। प्रश्न 27 - पूर्वी पुष्कार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के वर्तमान काल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री शंकर जी (2) श्री अक्षवास जी (3) श्री नम्नाधिक जी (4) श्री नग्नाधिपतीश जी (5) श्री नष्टपाखंड जी (6) श्री स्वप्नवेद जी (7) श्री तपोधन जी (8) श्री पुष्पकेतु जी (9) श्री धार्मिक जी (10) श्री चन्द्रकेतु जी (11) श्री अनुरक्त जी (12) श्री वीतराग जी (13) श्री उद्योत जी (14) श्री तमोपेक्ष जी (15) श्री मधुनाद जी (16) श्री मरूदेव जी (17) श्री दमनाथ जी (18) श्री वृषभस्वामि जी (19) श्री शिलातन जी (20) श्री विश्वनाथ जी (21) श्री महेन्द्र जी (22) श्री नंद जिनेन्द्र जी (23) श्री तमोहर जी (24) श्री ब्रह्मज जी। प्रश्न 28 - पूर्वी पुष्कार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भाविकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री यशोधर जी (2) श्री सुकृतनाथ जी (3) श्री अभयघोष जी (4) श्री निर्वाण जी (5) श्री व्रतवास जी (6) श्री अतिराज जी (7) श्री अश्वदेव जी (8) श्री अर्जुन जी (9) श्री तपश्चन्द्र जी (10) श्री शरीरिक जी (11) श्री महेश जी (12) श्री सुग्रीव जी (13) श्री दृढ़प्रहार जी (14) श्री अम्बरीक जी (15) श्री दयातीत जी (16) श्री तुम्बर जी (17) श्री सर्वशील जी (18) श्री प्रतिजात जी (19) श्री जितेन्द्रीय जी (20) श्री तपादित्य जी (21) श्री रत्नाकर जी (22) श्री देवेश जी (23) श्री लांछन जी (24) श्री सुप्रदेश जी। प्रश्न 29 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के भर क्षेत्र के भूत कालिक चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री पद्मचंद्र जी (2) श्री रत्नांग जी (3) श्री अयोगिकेश जी (4) श्री सर्वार्थ जी (5) श्री ऋषिनाथ जी (6) श्री हरिभद्र जी (7) श्री गुणाधिप जी (8) श्री पारत्रिक जी (9) श्री ब्रह्मनाथ जी (10) श्री मुनीन्द्र जी (11) श्री दीपक जी (12) श्री राजर्षि जी (13) श्री विशाख जी (14) श्री आनंदति जी (15) श्री रविस्वामी जी (16) श्री सोमदत्त जी (17) श्री जयस्वामी जी (18) श्री मोक्षनाथ जी (19) श्री अग्रभास जी (20) श्री धनुसंग जी (21) श्री रोमांचक जी (22) श्री मुक्ति नाथ जी (23) श्री प्रसिद्धनाथ जी (24) श्री जितेश जी। प्रश्न 30 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के भरत क्षेत्र के वर्तमान काल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री सर्वांग स्वामी (2) श्री पद्माकर जी (3) श्री प्रभाकर जी (4) श्री बलनाथ जी (5) श्री योगीश्वर जी (6) श्री सूक्ष्मांगजी जी (7) श्री व्रत चलातीत जी (8) श्री कलम्बक जी (9) श्री परित्याग जी (10) श्री निषेधक जी (11) श्री पापापहारि जी (12) श्री सुस्वामि जी (13) श्री मुक्तिचन्द्र जी (14) श्री अप्रासिक जी (15) श्री जयचंद्र जी (16) श्री मलाधारि जी (17) श्री सुसंयत जी (18) श्री मलयसिन्धु जी (19) श्री अक्षधर जी (20) श्री देवधर जी (21) श्री देवगण जी (22) श्री आगमिक जी (23) श्री विनीत जी (24) श्री रतानंद जी। प्रश्न 31 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के भरत क्षेत्र के भविष्यत कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री प्रभावक जी (2) श्री विनेन्द्र जी (3) श्री सुभावक जी (4) श्री दिनकर जी (5) श्री अगस्त्येज जी (6) श्री धनदत्त जी (7) श्री पौरव जी (8) श्री जिनदत्त जी (9) श्री पाश्र्वनाथ जी (10) श्री मुनि सिंधु जी (11) श्री आस्तिक जी (12) श्री भवानीक जी (13) श्री नृपनाथ जी (14) श्री नारायण जी (15) श्री प्रशमौक जी (16) श्री भूपति जी (17) श्री सुदृष्टि जी (18) श्री भवभीरू जी (19) श्री नंदन जी (20) श्री भार्गव जी (21) श्री सुबसू जी (22) श्री परावश जी (23) श्री वनवासिक जी (24) श्री भरतेश जी। प्रश्न 32 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भूतकालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री उपशांत जी (2) श्री फाल्गुण जी (3) श्री पूर्वासजी जी (4) श्री सौधर्म जी (5) श्री गौरिक जी (6) श्री त्रिविकक्रम जी (7) श्री नरसिंह जी (8) श्री मृगबसू जी (9) श्री सोमेश्वर जी (10) श्री सुधासुर जी (11) श्री अपापमल्ल जी (12) श्री विवाध जी (13) श्री संधिक स्वामि जी (14) श्री मांधत्र जी (15) श्री अश्वतेज जी (16) श्री विद्याधर जी (17) श्री सुलोचन जी (18) श्री मौन निधि जी (19) श्री पुंडरीक जी (20) श्री चित्रगण जी (21) श्री मणिरिन्द्र जी (22) श्री सर्वकाल जी (23) श्री भूरिश्रवण जी (24) श्री पुण्यांग जी। प्रश्न 33 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के वर्तमान काल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री गांगेयक जी (2) श्री नल्लवासव जी (3) श्री भमजिनेन्द्र जी (4) श्री दयाधिक जी (5) श्री सुभद्र जी (6) श्री स्वामिजी जी (7) श्री हनिक जी (8) श्री नंदिघोष जी (9) श्री रूपबीज जी (10) श्री वज्रनाभ जी (11) श्री संतोष जी (12) श्री सुधर्म जी (13) श्री फणीश्वर जी (14) श्री वीरचन्द्र जी (15) श्री मेधानिक जी (16) श्री स्वच्छनाथ जी (17) श्री कोपक्षय जी (18) श्री अकाम जी (19) श्री धर्मधाम जी (20) श्री सूक्तिसेन जी (21) श्री क्षेमंकर जी (22) श्री दयानाथ जी (23) श्री कीर्तिप जी (24) श्री शुभंकर जी। प्रश्न 34 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भविष्यत कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये। उत्तर - (1) श्री अदोषिक जी (2) श्री वृषभ जी (3) श्री विनयानंद जी (4) श्री मुनिभारत जी (5) श्री इंद्रक जी (6) श्री चन्द्रकेतु जी (7) श्री ध्वजादित्य जी (8) श्री वासुबोध जी (9) श्री मुक्तिगत जी (10) श्री धर्मबोध जी (11) श्री देवांग जी (12) श्री मारीचिक जी (13) श्री सुजीव जी (14) श्री यशोधर जी (15) श्री गौतम जी (16) श्री मुनिशुद्धि जी (17) श्री प्रवोधिक जी (18) श्री सदानीक जी (19) श्री चारित्रनाथ जी (20) श्री शतानंद जी (21) श्री वेदार्थ जी (22) श्री सुधानीक जी (23) श्री ज्योर्ति मुख जी (24) श्री सुरार्ध जी। प्रश्न 35 - जम्बूद्वीप में कितनी चैबीस होती है? उत्तर - जम्बूद्वीप में छः चैबीसी होती हैं। प्रश्न 36 - जम्बूद्वीप में छःचैबीस किस प्रकार होती है? उत्तर - भूत, वर्तमान, भाविकाल की भरत क्षेत्र की तीन चैबीसी तथा ऐरावत क्षेत्र की तीनों कालों की तीन चैबीसी। इस प्रकार छः चैबीसी होती है। प्रश्न 37 - धातकी खंड में कितनी चैबीसी होती है? उत्तर - धातकी खंडमें 12 चैबीसी होती हैं। प्रश्न 38 - धातकी खंडमें 12 चैबीसी किसी प्रकार होती हैं? उत्तर - पूर्वी धातकी खंड के भरतक्षेत्र की तीन तथा ऐरावत क्षेत्र की तीन कुल छः, इसी प्रकार पश्चिमी धातकी खंड के भरतक्षेत्र की तीन तथा ऐरावत क्षेत्र की तीन। कुल मिलाकर 12 चैबीसी हुई। प्रश्न 39 - पुष्करार्ध द्वीप में कितनी चैबीसी होती है? उत्तर - पुष्करार्ध द्वीप में भी बारह चैबीसी होती हैं। प्रश्न 40 - पुष्करार्ध द्वीप में बारह चैबीसी किस प्रकार होती है? उत्तर - धातकी खंड के समान ही पूर्वी पुष्करार्ध द्वीप में छः तथा पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप में छः चैबीसी होती है। प्रश्न 41 - मेरूओं के सम्बंध में तीस चैबीसी की गणना बताइये। उत्तर - एक मेरू से सम्बंधित तीन भरत की तथा तीन ऐरावत की कुछ छः चैबीसी होती हैं। द्वाई द्वीप में मेरू पांच हैं। अतः 5 गुण 6 कुल तीस चैबीसी होती हैं।