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Tuesday, 6 October 2015
।। सिद्ध परमेष्ठी ।।
प्रश्न 1 - सिद्ध परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं?
उत्तर - सिद्धपरमेष्ठी के आठ मूलगुण होते हैं।
प्रश्न 2 - सिद्ध परमेष्ठी के उत्तर गुण कितने होते हैं?
उत्तर - सिद्ध परमेष्ठी के उत्त्र गुण अनंतानंत होते हैं।
प्रश्न 3 - सिद्ध परमेष्ठी के कौन-कौन से मूलगुण होते हैं?
उत्तर - 1 - क्षायिक सम्यक्त्व
2 - अनंतदर्शन
3 - अनंतज्ञान
4 - अगुरूलघुत्व
5 - अवगाहनत्व
6 - सूक्ष्मत्व
7 - अनंतवीर्य
8 - अव्याबाधत्व।
प्रश्न 4 - सिद्ध परमेष्ठी के कुछ अन्य नाम बताइये।
उत्तर - मुक्त जीव, निराकार, निरंजन, निकल परमात्मा, सिद्ध परमात्मा आदि।
प्रश्न 5 - सिद्ध भगवान के मूलगुण का कथन किस आधार पर है?
उत्तर - सिद्ध भगवान ने आठ कर्मों का नाश किया है। एक-एक कर्म के नाश होने से एक-एक गुण प्रकट होता हे, इस प्रकार कर्मों के नाश के आधार पर सिद्ध भगवान के मूल गुणों का कथन है।
प्रश्न 6 - कौन से कर्म के नाश के कौन-सा गुण प्रकट होता है।
उत्तर - 1 - दर्शनावरण कर्म के नाश से अनंत दर्शन
2 - ज्ञानवरण कर्म के नाश से अनंत ज्ञान
3 - मोहनीय कर्म के नाश से क्षायिक सम्यक्त्व
4 - अंतराय कर्म के नाश से अनंतवीर्य
5 - आयु कर्म के नाश से अवगाहनत्व
6 - नाम कर्म के नाश से सूक्ष्मत्व
7 - गोत्र कर्म के नाश से अगुरू लघुत्व
8 - वेदनीय कर्म के नाश से अव्याबाधत्व।
प्रश्न 7 - अनंत दर्शन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर - संसार के अनंत पदार्थों को एक साथ देखना।
प्रश्न 8 - अनंत ज्ञान का क्या अभिप्राय है?
उत्तर - संसार के अनंत पदार्थों को एक साथ जानना।
प्रश्न 9 - अवगाहनत्व किसे कहते हैं?
उत्तर - जिस गुण के रहने पर एक में अनंत समा जाते हैं ऐसे गुण को अवगाहनत्व कहते हैं।
प्रश्न 10 - अवगाहनत्व सिद्ध परमेष्ठी में किस प्रकार घटित होता है?
उत्तर - सिद्ध शिला पर एक सिद्ध में अनंत सिद्ध रहते हैं।
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प्रश्न 11 - अगुरूलघु गुण का लक्षण बताइये।
उत्तर - जिस गुण के कारण छोटे बड़े का भेद समाप्त होता है वह अगुरूलघुत्व गुण है।
प्रश्न 12 - अगुरूलघुत्व गुण सिद्ध में किस प्रकार रहता है?
उत्तर - गुणों की अपेक्षा सभी सिद्ध समान होते हैं किसी में दूसरे की अपेक्षा किंचित मात्र भी गुण कम या अधिक नहीं है। जिस प्रकार एक रूपये में 100 पैसे होते हैं तो रूपये के सभी सिक्कों में 100 पैसे ही रहेंगे कम ा अधिक नहीं।
प्रश्न 13 - सिद्धों में किस अपेक्षा से भेद हैं?
उत्तर - आसन, अवगाहना, द्रव्य, भाव, क्षेत्र काल आदि की अपेक्षा से जानने के लिए भेद किया गया है।
प्रश्न 14 - कौन से आसन से सिद्ध होते हैं?
उत्तर - पर्यंकासन एवं खड़गासन इन दो आसनों से ही सिद्ध होते हैं।
प्रश्न 15 - अवगाहना से क्या अभिप्राय है?
उत्तर - उत्तम अवगाहना, मध्यम अवगाहना एवं जघन्य अवगाहना से सिद्ध हैं।
प्रश्न 16 - उत्तम अवगाहना कितनी मानी है?
उत्तर - उत्तम अवगाहना कुछ कम पांच सौ पच्ची धनुष अर्थात् इक्कीस सौ हाथ में कुछ कम।
प्रश्न 17 - उत्तम अवगाहना में किसका उदाहरण आता है?
उत्तर - भगवान बाहुबली का।
प्रश्न 18 - मध्यम अवगाहना कितनी है?
उत्तर - मध्यम अवगाहना में अनेक भेद हैं।
प्रश्न 19 - जघन्य अवगाहना कितनी है?
उत्तर - सिद्धों की जघन्य अवगाहना साड़े तीन हाथ की मानी जाती है।
प्रश्न 20 - जघन्य अवगाहना में किसका उदाहरण आता है?
उत्तर - भगवान महावीर स्वामी का।
प्रश्न 21 - सिद्ध परमेष्ठी का क्या स्वरूप है?
उत्तर - जो आठों कर्मों का नाश हो जाने से नित्य निरंजन, अशरीरी हैं लोक के अग्र भाग पर विराजमान, वे सिद्ध परमेष्ठी कहलाते हैं इनके आठ मूल गुण होते हैं।
प्रश्न 22 - सिद्ध परमेष्ठी का स्वरूप बताने वाली पद्य बताइये।
उत्तर - पद्य इस प्रकार है-
समकित दरसन ज्ञान अगुरूलघु अवगाहना।
सूक्ष्म वीरजवान, निरावाध गुण सिद्ध के।। jain temple93
प्रश्न 23 - सिद्ध कौन से लोक से होते हैं?
उत्तर - सिद्ध क ेवल मध्य लोक से होते हैं।
प्रश्न 24 - मध्यलोक में सिद्ध कहां से होते हैं?
उत्तर - मध्य लोक में सिद्ध केवल ढाई द्वीप से होते हैं।
प्रश्न 25 - ढाई द्वीप से ही सिद्ध क्यों होते हैं।
उत्तर - क्योंकि ढाई द्वीपों तक ही मनुजलोक है। इसका विस्तार भी सिद्ध शिला के समान, 45 लाख योजन है, अतः ढाई द्वीप से ही सिद्ध होते हैं।
प्रश्न 26 - ढाई द्वीपों में सिद्ध कहां-कहां से होते हैं?
उत्तर - ढाई द्वीपों के प्रायः सभी स्थानों से सिद्ध होते हैं।
प्रश्न 27 - कौन से जीव सिद्ध हो सकते हैं?
उत्तर - जीवों में केवल मनुष्य ही सिद्ध हो सकते हैं।
प्रश्न 28 - जीवों में केवल मनुष्य ही सिद्ध बनने के अधिकारी क्यों?
उत्तर - क्योंकि केवल मनुष्य ही पूर्ण संयम धारण करके सम्पूर्ण कर्मों का नाश करके सिद्ध बन सकते हैं।
प्रश्न 29 - क्या सभी मनुष्य सिद्ध बन सकते हैं?
उत्तर - केवल आर्यखण्ड में जन्में आर्य मनुष्य सिद्ध बन सकते हैं।
प्रश्न 30 - कौन से काल में मनुष्य सिद्ध बन सकते हैं?
उत्तर - केवल कर्मकाल जो दुःखमा नाम का चतुर्थ काल होता है उसमें ही मनुष्य सिद्ध बन सकते हैं।
प्रश्न 31 - मनुष्य, पुरूष, नपुंसक स्त्री के भेद से तीन प्रकार के होते हैं क्योंकि तीनों प्रकार के मनुष्य सिद्ध बनते हैं?
उत्तर - द्रव्य वेद (लिंग) से केवल पुरूष मनुष्य ही सिद्ध बन सकते हैं। स्त्री नपुंसक मनुष्य नहीं।
प्रश्न 32 - भाव लिंग से कौन से मनुष्य सिद्ध बन सकते है?
उत्तर - भाव लिंग से स्त्रिी पुरूष नपुंसक तीनों वेद वाले मनुष्य सिद्ध बन सकते हैं।
प्रश्न 33 - भगवान आदिनाथ कौन-से काल में सिद्ध बने?
उत्तर - भगवान आदिनाथ तो तीसरे काल में जन्म लेकर तीसरे काल में ही सिद्ध हो गये थे।
प्रश्न 34 - क्या पंचम काल में भी मनुष्य सिद्ध बन सकते हैंत्र
उत्तर - पंचम काल में कोई भी मनुष्य सिद्ध नहीं बनते हैं, किंतु चतुर्थ काल में जन्म लेकर पंचम काल में मोक्ष जा सकते हैं।
प्रश्न 35 - कुछ उन स्थानों के नाम बताइये जहां से जीव मोक्ष जाते हैं।
उत्तर - जल, थल, आकाश, कंदरा, गुफा, पर्वत, नगर, तालाब आदि।
प्रश्न 36 - जल से जीव मोक्ष कैसे जा सकते हैं?
उत्तर - तप करते हुए मुनि को केाई पूर्व भव का शत्रू उठाकर यदि नदी, समुद्र तालाब आदि में डाल दे और वहां समस्त कर्मों की निर्जरा हो जाये तो वे जल से मोक्ष चले जाते हैं।
प्रश्न 37 - आकाश से जीव किस प्रकार सिद्ध होते हैं?
उत्तर - पूर्वोक्त विधि से तप करते हुए मुनि को कोई उठाकर ले जाये और ऊपर छोड़ दे यदि सम्पूर्ण कर्मों की निर्जरा हो जाये तो वे आकाश से ही मोक्ष चले जाते हैं।
प्रश्न 38 - ढाई द्वीप कौन से हैं?
उत्तर - जम्बूद्वीप, धातकी खंड तथा आधा पुष्करवर द्वीप इन्हें मिलाकर ढाई द्वीप कहे जाते हैं।
प्रश्न 39 - मनुष्य किस प्रकार से सिद्ध होते हैं?
उत्तर - कुछ मनुष्य उपसर्ग से सिद्ध होते हैं तथा कुछ मनुष्य बिना उपसर्ग के सिद्ध होते हैं।
प्रश्न 40 - गणुव्रत तथा महाव्रत धारण करने वालों में कौन -से मनुष्य सिद्ध होते हैं।
उत्तर - केवल महाव्रती ही सिद्ध होते हैं।
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प्रश्न 41 - ध्यानों में कौन से ध्यान को धारण करने वाले जीव सिद्ध होते हैं।
उत्तर - केवल शुक्ल ध्यान को धारण कर कर्म नष्ट करने वाले सिद्ध बनते हैं।
प्रश्न 42 - कौन से चरित्र को धारण करने वाले जीव सिद्ध होते हैं?
उत्तर - पंचम यथाख्यात नामक चारित्र को धारण करने वाले जीव सिद्ध बनते हैं।
प्रश्न 43 - कौन से गुण स्थानवर्ती जीव सिद्ध होते हैं?
उत्तर - तेरहवें चैदहवें गुणस्थानवर्ती जीव सिद्ध बनते हैं।
प्रश्न 44 - किन कर्मों को नष्ट करने पर सिद्ध बनते हैं?
उत्तर - समस्त कर्मांशों को नष्ट करने पर सिद्ध बनते हैं।
प्रश्न 45 - कितने कर्मों को नष्ट करने पर सिद्ध बनने की योग्यता होती है?
उत्तर - चार घातियां कर्मों को नष्ट करने पर सिद्ध बनने की योग्यता हो जाती है। चार घातिया कर्मों के नष्ट हो जाने पर केवल ज्ञान हो जाता है। केवल ज्ञान होने पर भाव मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। ये केवलज्ञानी ही समस्त कर्मों से दूटकर मुक्त हो जाते हैं।
प्रश्न 46 - कर्मों की कितनी प्रकृतियां नष्ट होने पर मुक्त होने की योग्यता होती है?
उत्तर - कर्मों की 63 (तरेसठ) प्रकृतियां नष्ट होने पर मुक्त पद प्राप्त करने की योग्यता होती है।
प्रश्न 47 - जीवन मुक्त जीव को कितने कर्म तथा कर्मों की कितनी प्रकृर्तियां नष्ट होती हैं?
उत्तर - जीवन मुक्त जीव अर्थात अरिहंत भगवान के चार घातिया कर्म तथा त्रेसठ प्रकृतियां नष्ट होती हैं।
प्रश्न 48 - जीवों के सिद्ध बनने में क्या अंतर है?
उत्तर - कोई जीव तीर्थंकर बनकर सिद्ध होते हैं तथा कोई जीव बिना तीर्थंकर बने केवली, मूक केवली बनकर सिद्ध बन जाते हैं।
प्रश्न 49 - तीर्थंकर तथा केवली में क्या अंतर है?
उत्तर - सभी केवली तीर्थकर नहीं होते, सभी तीर्थंकर केवली होते हैं। तीर्थंकरों का समवसरण बनता है, केवलियों की गंध कुटी, तीर्थंकरों के कल्याणक देव मानते हैं। केवललियों के पंच कल्याणकादि तीर्थंकरों की भांति नहीं होते हैं। सामान्य केवली के जन्म समय अतिश्य नहीं होते हैं।
प्रश्न 50 - तीर्थंकर तथा सामान्य केवली को उदाहरण द्वारा बताइये।
उत्तर - भगवान बाहुबली, भरत, राम, हनुमान आदि केवली तो थे किन्तु तीर्थंकर नहीं थे।
प्रश्न 51 - केवली तथा मुक्त केवली में क्या अंतर है?
उत्तर - सभी केवलियों की दिव्य ध्वनि खिरती है जबकि मूक केवलियों की दिव्य ध्वनि नहीं खिरती है।
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प्रश्न 52 - केवली को सिद्ध बनने के लिए कितना समय लगता है?
उत्तर - पंचलक्षर उच्चारण के बाराबर समय लगता है।
प्रश्न 53 - वे पंचलब्धक्षर कौन - से हैं?
उत्तर - अ इ उ ऋ लृ
प्रश्न 54 - कर्मनष्ट करके सिद्ध कहां जाते हैं?
उत्तर - लोक अग्र भाग पर।
प्रश्न 55 - जीव सिद्ध होकर अग्र भाग से ऊपर क्यों नहीं जाते?
उत्तर - जीव व पुद्गलों की गति धर्मास्तिकाय के कारण से होती है लोक के अग्रभाग से ऊपर धर्मास्तिकाय द्रव्य नहीं है।
प्रश्न 56 - मुक्त जीव मध्य लोक के ढाई द्वीप से ऊपर ही क्यों जाते हैं नीचे क्यों नहीं?
उत्तर - मुक्त जीव का स्वभाव ऊपर जाने का ही है इसीलिए।
प्रश्न 57 - मुक्त जीव के उध्र्व गमन के लिए आचार्यों ने क्या उदाहरण लिया है?
उत्तर - ऐरण्ड बीज का, अग्नि शिखा का कुम्हार के चक्र का।
प्रश्न 58 - समुदघात् सिद्ध किन्हें कहते है?
उत्तर - जो मुनि मुक्ति जाने से पूर्व केवली समुदघात् करते हैं, उन्हें समुघात् सिद्ध कहते हैं।
प्रश्न 59 - केवली समुदघात् सिद्ध किन्हें कहते है?
उत्तर - जिन केवलियों की आत्मा में कर्मों की सत्ता अधिक है आयु कर्म कम तो दोनों को बराबर करने के लिए जो समुदघात् किया जाता है उसे केवली समुदघात् कहते हैं।
प्रश्न 60 - समुदघात् क्या है?
उत्तर - आत्मा के प्रदेशों का मूल शरीर को छोड़े बिना बाहर निकलना समुदघात् कहलात है।
प्रश्न 61 - तीर्थंकर के निर्वाण क्षेत्रों को छोड़ अन्य पांच सिर क्षेत्रों के नाम बताओं।
उत्तर - सोनागिर, बड़बानी, मांगीतुंगी, मथुरा, द्रोणगिरि।
प्रश्न 62 - सिद्ध क्षेत्र किसे कहते हैं?
उत्तर - जिस स्थान से जीव मोक्ष जाते हैं, सिद्ध होते हैं उस स्थाान को सिद्ध क्षेत्र कहते हैं।
प्रश्न 63 - सम्मेदशिखर को छोड़कर प्रचलित अन्य सिद्ध क्षेत्रों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) कैलाश पर्वत, (2) गिरानार जी (3) पावापुरी (4) गजपंथजी, (5) तारवर नगर (6) पावागिरि (7) शत्रुंजय (8) मांगीतुंगी (9) सोनागिरजी (10) रेवानदी तट (11) सिद्धवर कूट (12) बड़ानी नगर (13) पावागिरि नगर (14) द्रोणागिरि (15) मुक्ता गिरि (मेढ़गिरि), (16) कुंथुलगिरि (17) कलिंगदेश (कोटिशिला), (18) रेशंदीगिरि (19) जम्बूवन (चैरासी मथुरा)
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प्रश्न 64 - कैलाश पर्वत से कौन-कौन से मोक्ष हैं?
उत्तर - कैलाश पर्वत से, भगवान आदिनाथ, भरत बाहुबली आदि 10 हजार मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 65 - चंपापुरी - से कितने मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - चंपापुरी से श्री वासुपूज्य भगवान तथा छः सौ मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 66 - गिरिनार जी से श्री नेमिनाथ भगवान को छोड़कर कौन-कौन से भव्य जीव मोक्ष गये हैं?
उत्तर - प्रद्मुनकुमार, शम्भु, अनिरूद्ध आदि बहत्तर करोड़ सात सौ मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 67 - गजपंथा जी सिद्ध क्षेत्र की विशेषता बताइये।
उत्तर - गजपंथा सिद्ध क्षेत्र से श्री बलभद्र यादव नरेन्द्रादि सात आठ करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 68 - तारवर नगर से कौन से मुनि मोक्ष को गये हैं?
उत्तर - तारवर नगर से, धरदत्त, वरांग, सागरदत्त आदि साड़े तीन करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 69 - पावागिरि से कौन से मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - पावागिरि से रामचन्द्र के दो पुत्र लाडनृपादि एवं पांच करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 70 - शत्रुजय पर्वत से कितने मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - शत्रुंजय पर्वत से तीन पांडु पुत्र युधिष्ठर, भीम, अर्जुन द्रविड राजादि आठ करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 71 - मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र से कौन से प्रसिद्ध महानुभाव मोक्ष गये हैं?
उत्तर - मांगीतुंग सिद्ध क्षेत्र से श्रीराम, हनुमान, सुग्रीव, गव, गवाक्ष, नील, बहानील आदि निन्यानवे करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 72 - सोनागिर सिद्ध क्षेत्र से कौन से मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - सोनागिर सिद्ध क्षे. से नंग अनंग कुमार मुनि सहित साड़े पांच करोड़ भव्य जीव मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 73 - रेवातट सिद्ध क्षेत्र से कितने मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - रेवातट सिद्ध क्षेत्र से दशमुखनृपति पुत्र एवं साड़े पांच करोड़ मुनि मोक्ष् गये हैं।
प्रश्न 74 - सिद्धवर कूट से कौन से मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - सिद्धवर कूट सिद्ध क्षेत्र से दो चक्रीश तथा दस कामदेव सहित साड़े तीन करोड़ मुनि मोंक्ष गये हैं।
प्रश्न 75 - बड़वानी सिद्ध क्षेत्र से कोन-से मोक्ष गये हैं?
उत्तर - बड़बानी सिद्ध क्षेत्र से इन्द्रजीत और कुम्भकरण मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 76 - पावागिरिनगर सिद्ध क्षेत्र से कौन से मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - पावागिरि नगर सिद्ध क्षेत्र से सुवर्णभद्र मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 77 - द्रोण गिरि सिद्ध क्षेत्र से कौन से भव्य जीव सिद्ध हुए हैं?
उत्तर - द्रोण गिरि सिद्ध क्षेत्र से गुरूदत्तादि मुनिगण सिद्ध हुए हैं।
प्रश्न 78 - अष्टापद गिरि से कौन-से दो मुनि सिद्ध होकर प्रसिद्ध हुए हैं?
उत्तर - अष्टापद गिरि से बालि महाबलि नाम के मुनि सिद्ध हुए हैं।
प्रश्न 79 - मुक्ता गिरि से कितने मुनियों ने सिद्ध पद को प्राप्त किया है?
उत्तर - मुक्ता गिरि से साड़े तीन करोड़ मुनियों ने सिद्ध पद को प्राप्त किया है।
प्रश्न 80 - मुक्ता गिरि का दूसरा नाम क्या है?
उत्तर - मुक्ता गिरि का दूसरा नाम मेढ़ागिरि है।
प्रश्न 81 - कुंथलगिरि से कौन से मुनि सिद्ध हुए हैं?
उत्तर - कुंथलगिरि से साडद्ये तीन करोड़ मुनि सिद्ध हुए हैं।
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प्रश्न 82 - कलिंग देश कोटि शिला से कौन से मुनि सिद्ध हुए हैं?
उत्तर - कलिंग देश कोटिशिला से दशरथ राजा के पुत्र तथा पांच सौ मुनि सिद्ध हुए हैं।
प्रश्न 83 - रेशंदी सिद्ध क्षेत्र से कौन-से मुनियों ने मुक्त पद प्राप्त किया है?
उत्तर - रेशंदी गिरि सिद्ध क्षेत्र से वरदत्तादि पांच मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 84 - जम्बूवन (मथुरा चैरासी) से कौन मोक्ष गये हैं?
उत्तर - जम्बूवन मथुरा चैरासी से जम्बूस्वामी मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 85 - इस हुंडावसर्पिणी काल के कर्मयुग में सर्वप्रथम मोक्ष प्राप्त करने वाले कौन थे?
उत्तर - अनंतवीर्य केवली।
प्रश्न 86 - चतुर्थ काल के अंत में मोक्ष प्राप्त करने वाले कौन थे?
उत्तर - जम्बूस्वामी।
प्रश्न 87 - सबसे बड़े सिद्ध क्षेत्र का क्या नाम है?
उत्तर - श्री सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र।
प्रश्न 88 - सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र की क्या महत्ता है?
उत्तर - सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र की महत्ता निम्न प्रकार है-
एक बार वंदे जो कोई ताहि नरक पशु गति न होई।।
अर्थात् जो एक बार सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र की वंदना कर लेता है वह निश्चय ही भव्य है उसे नरक और पशुगति में नहीं जाना पड़ता है। उसकी निश्चित ही मनुष्य एवं देवगति होती है।
प्रश्न 89 - सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र के कूटों के नाम बताइये।
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उत्तर - नाम इस प्रकार हैं- 1 - सिद्धवर कूट
2 - धवल कूट
3 - आनंद कूट
4 - अविचल कूट
5 - मोहन कूट
6 - प्रभास कूट
7 - ललित कूट
8 - सुप्रभ कूट
9 - विद्युतवर कूट
10 - संकुल कूट
11 - सुवीर कूट
12 - स्वयंभू कूट
13 - सुदत्त कूट
14 - कुंदप्रभ कूट
15 - ज्ञानधर कूट
16 - नाटक कूट
17 - संबल कूट
18 - निरजर कूट
19 - मित्रधर कूट
20 - सुवर्णभद्र कूट
21 - आदिनाथ भगवान की टौंक
22 - वासुपूज्य भगवान की टौंक
23 - नेमिनाथ भगवान की टौंक
24 - महावीर की टौंक
25 - गणधर कूट।
प्रश्न 90 - सिद्धवर कूट से कुल कितने मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - इस कूट एक अरब अस्सी करोड़ चउवन लाख मुनि मोक्ष गये हैं?
प्रश्न 91 - सिद्धवर कूट की वंदना से क्या फल मिलता है?
उत्तर - सिद्धवर कूट की वंदना से बत्तीस करो़ उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 92 - धवल कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - धवल कूट से नौ कोड़ा-कोडि़ बहत्तर लाख बियालिस हजार पांच सौ मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 93 - धवल कूअ की वंदना से क्या फल मिलता है?
उत्तर - धवल कूअ की वंदना से ब्यालिस लाख उपवास का फल मिलता है।
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प्रश्न 94 - आनन्द कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हें?
उत्तर - धवल कूट की वंदना से ब्यालिस लाख उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 95 - आनंद कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - आनन्द कूट से बहत्तर कोड़ाकोडि़ सत्तर करोड़ सत्तर लाख ब्यालिस हजार सात सै मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 96 - आनंद कूट की वंदना से क्या फल मिलता है?
उत्तर - आनंद कूट की वंदना से एक लाख उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 97 - अविचल कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - अविचल कूट से एक कोड़ाकोडि़ चैरासी करोड़ बहत्तर लाख इक्यासी हजार, सात सौ इक्यासी मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 98 - अविचल कूट की वंदना का फल बताइये।
उत्तर - अविचल कूट की वंदना से, एक करोड़ बत्तीस लाख उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 99 - मोहन कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - मोहन कूट से निन्यानवे करोड़ सत्तासी लाख तितालीस हजार सात सौ सत्ताइस मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 100 - मोहन कूट की वंदना से क्या फल मिलता है?
उत्तर - मोहन कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है?
प्रश्न 101 - प्रभास कूट से कितने मुनि मोक्ष पधारे हैं?
उत्तर - प्रभास कूट से उन्वास कोड़ाकोडि़ चैरासी करोड़ बत्तीस लाख सात हजार सात सौन मुनि मोक्ष पधारे हैं।
प्रश्न 102 - प्रभास कूट की वंदना का फल बताइये।
उत्तर - प्रभास कूट की वंदना से, बत्तीस करोड़ उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 103 - ललित कूट से कितने मुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - ललित कूट से नौ सौ चैरासी अरब बहत्तर करोड़ उस्सीलाख, चैरासी हजार, पांच सौ, पंचानवे मुनि मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 104 - ललित कूट की वंदना का फल बताइये।
उत्तर - ललित कूट की वंदना से छियानवे लाख उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 105 - सुप्रभ कूट से कितने मुनिराज सिद्ध पद को प्राप्त हुये हैं?
उत्तर - आठवें सुप्रभ कूट से एक कोड़ा-कोडि़ निन्यानवे लाख सात हजार चार सौ अस्सी मुनि सिद्ध पद को प्राप्त हुए हैं।
प्रश्न 106 - सुप्रभ कूट की वंदना से क्या फल प्राप्त होता है?
उत्तर - सुप्रभ कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 107 - विद्युतवर कूअ की वंदना से कितने उपवासों का फल प्राप्त होता है।
उत्तर - विद्युतवर कूअ की वंदना से एक करोड़ उपवासों का फल मिलता है।
प्रश्न 108 - संकुल कूट से कितने मुनियों ने सिद्ध धाम को प्राप्त किया है?
उत्तर - संकुल कूट से छियानवे कोड़-कोडि़ छियानवे करोड़ छियानवे लाख नौ हजार पांच सौ ब्यालिस मुनियों ने सिद्ध धाम को प्राप्त किया है।
प्रश्न 109 - संकुल कूट की वंदना से कितने उपवासों का फल मिलता है?
उत्तर - संकुल कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 110 - ग्यारवें सुवीर कूट से कितने मुनि मोक्ष पधारे हैं?
उत्तर - ग्यारवें सुवीर कूट से सत्तर कोड़ा-कोडि़ साठ लाख छः हजार सात सौ ब्यालिस मुनि मोक्ष पधारे हैं।
प्रश्न 111 - सुवीर कूट की वंदना से कितने उपवासों का फल मिलता है?
उत्तर - सुवीर कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 112 - बारवें स्वयंभू कूट से कितने मुनि मोक्ष पधारे हैं?
उत्तर - स्वयंभू कूट से छियानवे कोड़ा-कोडि़ सत्तर करोड़ सत्तर लाख, सत्तर हजार, सात सौ, मुनि मोक्ष पधारे हैं।
प्रश्न 113 - स्वयं-भू कूट की वंदना से क्या फल प्राप्त होता है?
उत्तर - स्वयं-भू कूट की वंदना से नौ करोड़ उपवास का फल प्राप्त होता है।
प्रश्न 114 - तेरहवे सुदत्त कूट से कितने मुनि सिद्ध हुए है?
उत्तर - तेरहवें कूट से उनत्तिस कोड़-कोडि़ उन्नीस करोड़ नौ लाख, नौ हजार, सात सौ पन्चानवें दिगम्बर साधु सिद्ध हुए हैं।
प्रश्न 115 - सुदत्त कूट की वंदना से कितने उपवासों का फल मिलता है?
उत्तर - सुदत्त कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 116 - कुंदप्रभु कूअ से कितने मुनि सिद्ध पद को प्राप्त हुए।
उत्तर - कुंद प्रभ कूट से नौ कोड़ाकोडि़ नौ लाख नौ सौ निन्यानवे मुनि सिद्ध पद को प्राप्त हुए हैं।
प्रश्न 117 - इस कूट की वंदना से कितने उपवासों का फल मिलता है?
उत्तर - इस कूट की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 118 - ज्ञानधर कूट से कितने मुनियों ने शिव धाम को प्राप्त किया है?
उत्तर - ज्ञानधर कूट से छियानवे कोड़-कोडि़ छियालिस करोड़ बत्तीस लाख छियानवे हजार सात सौ ब्यालिस मुनियों ने शिव पद प्राप्त किया है।
प्रश्न 119 - ज्ञानधर कॅअ की वंदना से क्या फल मिलता है?
उत्तर - इस कूअ की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 120 - नाटक कूट से कितने मुनिराजों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है?
उत्तर - नाटक कूट से निन्यानवे करोड़ निन्यानवे लाख नौ सौ निन्यानवें मुनिराजों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है।
प्रश्न 121 - नाटक कूट की वंदना से क्या फल मिलता है?
उत्तर - नाटक कूट की वंदना से छियानवे करोड़ उपवासों का फल मिलता है।
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प्रश्न 122 - संबल कूट से कितने मुनियों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है।
उत्तर - संबल कूट से छियानवे करोड़ मुनियों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है।
प्रश्न 123 - संबल कूट की वंदना का फल बताइये।
उत्तर - संबल कूट की वंदना से एक करोड़ प्रोषधोपवासों का फल मिलता है।
प्रश्न 124 - निरजर कूट से कितने मुनियों ने निर्वाण को प्राप्त किया है?
उत्तर - निरजर कूट से निन्यानवे कोड़ा-कोडि़ सत्यान्वे करोड़ नौ लाख नौ सौ निन्यानवे महामुनियों ने निर्वाण को प्राप्त किया।
प्रश्न 125 - निरजर कूट की वंदना का फल बताइये।
उत्तर - निरजर कूट की वंदना से एक करोड़ प्रोषधोपवासों का फल मिलता है।
प्रश्न 126 - मित्रधर कूट से कितने ऋषि निर्वाण धाम को प्राप्त हुए हैं?
उत्तर - मित्रधर कूट से नौ सौ कोड़ाकोडि़ एक अरब पैंतालिस लाख सात हजार नो सौ मुनि निर्वाण धाम को प्राप्त हुए हैं।
प्रश्न 127 - मित्रधर कूट की वंदना का क्या फल मिलता है?
उत्तर - मित्रधर कूअ की वंदना से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है।
प्रश्न 128 - स्वर्णभद्र कूट से कितने महामुनि मोक्ष गये हैं?
उत्तर - स्वर्णभद्र कूट से ब्यासी करोड़ चैरासी लाख पैंतालिस हजार सात सौ ब्यालिस महामुनि कर्म नाश कर मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 129 - स्वर्ण कूट की वंदना से क्या फल मिलता है?
उत्तर - इस कूट की वंदना से सोलह करोड़ उपवासों का फल मिलता है।
प्रश्न 130 - गणधर कूट की क्या विशेषता है?
उत्तर - गणधर कूट से गौतम आदि गणधर मोक्ष गये हैं।
प्रश्न 131 - सम्मेद शिखर से कितने तीर्थंकरों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है?
उत्तर - सम्मेद शिखर से अनंतानंत चैबीस तीर्थंकरों ने सिद्ध पद प्राप्त किया है। सभी तीर्थंकर इसी स्थान से मोक्ष जाते हैं।
।। श्री अरिहंत परमेष्ठी ।।
प्रश्न 1 - पंच परमेष्ठी कौन-से काल में होता है?
उत्तर - पंच परमेष्ठी, कर्मकाल जो दुःखमा नाम का चैथा काल होता है, उसमें होते हैं। हुंडावसर्पिणी काल में तीसरे काल में भी हुए हैं। आचार्य, उपाध्याय साधु ये दुःखमा नाम के पंचम काल के अंत तक भी रहते हैं।
प्रश्न 2 - कौन-से परमेष्ठी कहां रहते हैं?
उत्तर - अरिहंत, आचार्य, उपाध्याय और साधु ये चार परमेष्ठी ढाई द्वीप की 170 कर्म भूमियों के आर्यखण्डों में विचरण करते हैं। सिद्ध परमेष्ठी लोक के अग्र भाग पर सिद्ध शिला पर शाश्वत विराजमान रहते हैं।
प्रश्न 3 - क्या ढाई द्वीप के बाहर भी कोई परमेष्ठी होते हैं?
उत्तर - नहीं! ढाई द्वीप के बाहर कोई भी परमेष्ठी नहीं होते हैं। अधोलोक उध्र्वलोक, मध्यलोक ढाई द्वीपों को छोड़कर वहां केवल अकृत्रिम जिनालय तथा जिनप्रतिमायें ही होती हैं।
प्रश्न 4 - अरिहंत परमेष्ठी किसे कहते हैं?
उत्तर - जिन्होंने चार घातिया कर्मों का नाश किया है, जो समवशरण में विराजमान रहकर भव्यों को मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं, जो, सर्वज्ञ वीतराग और हितोपदेशी हैं जो 46 मूल गणों से युग्त 18 दोष से रहित होते हैं। वे अरिहंत हैं।
प्रश्न 5 - अरिहंत के अन्य नाम क्या हैं?
उत्तर - वैसे तो अरिहंतो की इन्द्रों द्वारा 1008 नामों से पूजा की जाती है फिर भी प्रचलित नामों में उन्हें, अरिहंत, आप्त, जिनेन्द्र, जिन, जिनेश्वर, शंकर, ब्रह्मा, विधाता, अर्ध नारीश्वर भूतनाथ आदि नामों से जाना जाता है।
प्रश्न 6 - अरिहंत नाम की सार्थकता क्या है?
उत्तर - अरि अर्थात् शत्रु। जिन्होंने कर्म रूपी शत्रुओं का नाश किया है वे ही अरिहंत हैं यथा-कार्मारीन् हंतः-अरिहंत
प्रश्न 7 - अरिहंत भगवान को जिनेन्द्र क्यों कहते हैं?
उत्तर - अपनी पांचों इन्द्रीय तथा मन को जीत लेने से उन्हें जिन, जिनेश्वर जिनेन्द्र कहा जाता है।
प्रश्न 8 - अरिहंत भगवान को शंकर क्यों कहा जाता है?
उत्तर - क्योंकि ये अपने वचनामृत से भव्यों को शं अर्थात् सुख प्रदान करे हैं।
प्रश्न 9 - अरिहंत भगवान को ब्रह्मा क्यों कहा जाता है?
उत्तर - अरिहंत भगवान के समवशरण में चारों दिशाओं में मुख दिखने के कारण उन्हें ब्रह्मा कहा जाता है।
प्रश्न 10 - अरिहंत भगवान को अर्धनारीश्वर क्यों कहा जाता है?
उत्तर - अर्ध नारीश्वर का एक शाब्दिक अर्थ होता है। अर्ध न अरी तेषां ईश्वरः अर्थात् अर्ध-आधे, न-नहीं है,ं अरी-शत्रू, जिके, आधे शत्रू नहीं हैं, जिनके, ऐसे ईश्वर हुए अर्धनारीश्वर; अतः कर्म शत्रू आठ हैं, अरिहंत भगवान ने इनमें से चार घातिया कर्म शत्रूओं का नाश किया है अतः इन्हें अर्ध नारीश्वर कहते हैं।
प्रश्न 11 - अरिहंत भगवान को भूतनाथ क्यों कहते हैं?
उत्तर - भूत अर्थात् प्राणी। प्राणियों के स्वामी, नाथ होने से इन्हें भूतनाथ कहा जाता है।
प्रश्न 12 - आप्त किसे कहते हैं?
उत्तर - वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी ये तीन गुण जिनमें होते हैं वे आप्त कहलाते हैं।
प्रश्न 13 - मूलगुण किसे कहते हैं?
उत्तर - जो गुणों में मुख्य होते हैं वे मूल गुण हैं जैसे वृक्ष में जड़।
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प्रश्न 14 - अरिहंत भगवान के मूल गुण किसे कहते हैं?
उत्तर - अतिशय 34, प्रतिहार्य 8, अनंत चतुष्टय 4 मूलगुण हुए।
प्रश्न 15 - अरिहंत भगवान के उत्तर गुण कितने होते हैं?
उत्तर - अरिहंत भगवान के उत्तर गुण अनंत हैं।
प्रश्न 16 - घातिया कर्म किसे कहते हैं?
उत्तर - जो कर्म आत्मा के मूलगुणों का घात कहते हैं वे घातियां कर्म कहलाते हैं।
प्रश्न 17 - घातिया कर्म कितने हैं?
उत्तर - घातिया कर्म चार हैं।
प्रश्न 18 - घातिया कर्म कौन-कौन से हैं?
उत्तर - मोहनीय, ज्ञानावरणी, दर्शनवरणी और अन्तराय।
प्रश्न 19 - अरहंत का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर - अर्हंत् अर्थात् पूज्य, जो पूज्य हो गये हें वे अरहंत हैं।
प्रश्न 20 - अरिहंत भगवान में कौन-कौन से अठारह दोष नहीं है?
उत्तर - (1) जन्म, (2) जरा, (3) प्यास, (4) भूख, (5) आश्चर्य (6) पीड़ा, (7) दुख, (8) रोग (9) शोक, (10) मोह, (12) भय (13) निद्रा (14) चिंता (15) पसीना (16) राग (17)द्वेष (18) मरण।
प्रश्न 21 - जन्म किसे कहते हैं?
उत्तर - आत्मा के नवीन शरीर धारण करने को जन्म कहते हैं।
प्रश्न 22 - जरा किसे कहते हैं?
उत्तर - बुढ़ापे को जरा कहते हैं, जिससे शरीर जीर्ण होकर कमजोर हो जाता है, शरीर में झुर्रियां पड़ जाती हैं। तथा इन्द्रियां ठीक प्रकार से कार्य नहीं करती हैं।
प्रश्न 23 - प्यास किसे कहते हैं?
उत्तर - पानी पीने की इच्छा को प्यास कहते हैं।
प्रश्न 24 - भूख किसे कहते हैं?
उत्तर - आहार ग्रहण करने की इच्छा को भूख कहते हैं।
प्रश्न 25 - आश्चर्य किसे कहते हैं?
उत्तर - किसी भी नई वस्तु का - जो कौतुक का भाव होता है उसे आश्चर्य कहते हैं।
प्रश्न 26 - अरिहंत भगवान को आश्चर्य क्यों नहीं होता?
उत्तर - अरिहंत भगवान तीनों लोकों के समस्त पदार्थों की त्रैकालवर्ती अनंत पयार्यों को एक ही समय में जान रहते हैं; अतः उनके लिए कुछ भी नया नहीं है। इसीलिए अरिहंत भगवान को आश्चर्य नहीं होता।
प्रश्न 27 - पीड़ा किसे कहते हैं?
उत्तर - शरीर में अनिष्ट पदार्थों का संयोग होने पर वेदना की अनुभूति होना ही पीड़ा है।
प्रश्न 28 - दुःख किसे कहते हैं?
उत्तर - इष्ट वियोग अनिष्ट संयोग होने पर आत्मा में आर्तरूप परिमाण का आना दुःख है।
प्रश्न 29 - रोग किसे कहते हैं?
उत्तर - ठीक प्रकार से शरीर के कार्य करने में बाधा उत्पन्न होना रोग है।
प्रश्न 30 - शोक क्या है?
उत्तर - अपनी इष्ट वस्तु का वियोग हो जाने पर दुःख की अनुभूति होना शोक है।
प्रश्न 31 - गर्व किसे कहते हैं?
उत्तर - अपने को दूसरों से ऊंचा मानना गर्व कहलाता है।
प्रश्न 32 - मोह किसे कहते हैं?
उत्तर - पदार्थों में ममत्व परिणाम ये मेरा है मैं इसके बिना नहीं रह सकता ऐसा भाव मोह है।
प्रश्न 33 - भय किसे कहते हैं?
उत्तर - किसी पदार्थ के द्वारा अपने में अनष्टि की आशंका होने पर उससे बचने का प्रयास रूप जो भाव, तीव्र वेग से उत्पन्न होता है उसे भय या डर कहते हैं।
प्रश्न 34 - किया कितने होते हैं?
उत्तर - भय सात होते हैं।
प्रश्न 35 - सात भयों के नाम बताइये।
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उत्तर - 1 - इहलोक भय
2 - परलोक भय
3 - मृत्यु भय
4 - आकस्मिक भय
5 - वेदना भय,
6 - गुप्ति भय,
7 - अनरक्षा भय।
प्रश्न 36 - इहलोक भय किसे कहते हैं?
उत्तर - अभी मैं यदि कर्म करूंगा तो मेरी इस लोक में निन्दा होगी तथा लोग मुझे कष्ट पहुंचायेंगे ऐसा सोचना इहलोक भय है।
प्रश्न 37 - परलोक भय क्या है?
उत्तर - इस लोक में यदि मैं बुरे कर्म करूंगा तो मुझे परलोक में नरक त्रिर्यंच गति में जाकर दुःख उठाने पड़ेगे मेरा परलोक आगे आने वाला भव बिगड़ जायेगा, ये परलोक भय है।
प्रश्न 38 - मृत्यु भय क्या है?
उत्तर - रोग आदि के आने पर शरीर के छुटने का भय मृत्यु भय है।
प्रश्न 39 - आकस्मिक भय क्या है?
उत्तर - जिस भय के आने की सम्भावना नहीं होती, किंतु अचानक प्रकट हो जाता है, वह आकस्मिक भय है।
प्रश्न 40 - वेदना भय क्या है?
उत्तर - शरीर में चोट, पीड़ा आदि का भय होना वेदना भय है।
प्रश्न 41 - गुप्ति भय क्या है?
उत्तर - छिपी हुई, दबी हुई गोपनीय चोरी आदि की बात या तथ्य के प्रकट होने की आशंका गुप्ति भय है।
प्रश्न 42 - अनरक्षा भय क्या है?
उत्तर - कहीं भी किसी प्रकार से असुरक्षा-भावना अनरक्षा भय है।
प्रश्न 43 - निद्रा किसे कहते हैं?
उत्तर - निद्रा कर्म के उदय आने पर, सो जाना निद्रा है।
प्रश्न 44 - चिन्ता किसे कहते हैं?
उत्तर - किसी भी तथ्य या बात को लेकर अधिक सोचना, किसी कार्य को पूर्ण करने का बार-बार भावना आना चिंता है।
प्रश्न 45 - पीसना किसे कहते हैं?
उत्तर - अधिक श्रम या अन्य किसी कारण से शरीर में जो पानी की बूंदे आ जाती हैं वही पसीना कहलात है।
प्रश्न 46 - राग किसे कहते हैं?
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उत्तर - किसी पदार्थ, जीव, या व्यक्ति से लगाव राग कहलाता है।
प्रश्न 47 - द्वेष किसे कहते हैं?
उत्तर - जो पदार्थ अपने को अच्छा नहीं लगता उसके प्रतिकार रूप को हटाने स्वरूप जो भाव हैं उसे द्वेष कहते हैं।
प्रश्न 48 - मरण किसे कहते हैं?
उत्तर - संसारी जीवों के शरीर छूटने को मरण कहते हैं।
प्रश्न 49 - अरिहंत भगवान को जीवन मुक्त क्यों कहते हैं?
उत्तर - क्योंकि वे अभी जन्म से ही छूटे हैं आगे उनका जन्म नहीं होगा लेकिन जो शरीर उन्होंने धारण किया है वह तो छूटेगा ही।
प्रश्न 50 - यदि अरिहंत भगवान का शरीर छूटता है तो क्या उनका मरण भी होता है?
उत्तर - अरिहंत भगवान के शरीर छूटने को मरण संज्ञा नहीं है उसका नाम निर्वाण एवं मोक्ष है।
प्रश्न 51 - अरिहंत भगवान के 34 अतिश्य किस प्रकार हैं?
उत्तर - जन्म समय के 10 अतिश्य, केवलज्ञान के 10 अतिशय एवं देव कृत 14 अतिश्य से मिलकर 34 हो जाते हैं
प्रश्न 52 - अतिश्य किसे कहते हैं?
उत्तर - सर्वसाधरण, प्राणियों में नहीं पाई जाने वाली अद्भुत या अनोखी बात को अतिश्य कहते हैं।
प्रश्न 53 - जन्म के 10 अतिश्य कौन-कौन से है?
उत्तर - 1 - अतिश्य सुन्दर शरीर
2 - अत्यंत सुगन्धित शरीर
3 - पसीना रहित शरीर,
4 - मलमूत्र रहित शरीर
5 - हित मित प्रिय वचन,
6 - अतुल बल,
7 - सफेद रक्त
8 - शरीर में 1008 लक्षण
9 - समचतुस्त्र संस्थान एवं
10 - वज्र वृषभ नाराच सहनन।
प्रश्न 54 - अठारह दोष जो अरिहंत भगवान में नहीं हैं उनहें दोहे में बताइये।
उत्तर - जनम जरा तिरखा क्षुधा, विस्मय आरत खेद।
रोग शोक मद मोह भय, निद्रा चिंता स्वेद।।
राग द्वेष अरू मरण जुत, ये अष्टादश दोष,
नाहि होत अरिहंत के, सो छवि लायक मोष।।
प्रश्न 55 - अतिश्य सुन्दर शरीर का लक्षण बताइये।
उत्तर - भगवान के शरीर की रचना पृथ्वी मंडल पर पाये जाने वाले सुन्दर एवं शांति के परमाणु से हुई है। इसीलिए उनके समान सुन्दर शरीर देव, मानव आदि किसी का नहीं होता। यथा-
यै शांत राग रूचिभिः परमाणु भिस्व्तं,
निर्मापितत्रि भुवनैक ललाम भूतः।
तावंत एैव खलु तेप्यणऽव पृथ्व्यां,
यत्ते समान मपरं नाहि रूपमस्ति।।
प्रश्न 56 - अत्यंत सुगन्धित शरीर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर - भगवान के शरीर में कहीं नहीं पाई जाने वाली भीनी-भीनी सुगन्ध आती है।
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प्रश्न 57 - पसीना रहित से क्या अभिप्राय है?
उत्तर - भगवान के शरीर में संसारी प्राणियों के समान पसीना नहीं आता है।
प्रश्न 58 - क्या भगवान का शरीर मलमूत्र रहित होता है?
उत्तर - भगवान के शरीर में मलमूत्र नहीं होता है।
प्रश्न 59 - भगवान के शरीर में मलमूत्र क्यों नहीं होता है?
उत्तर - क्योंकि भगवान जन्म से ही संसारी प्राणियों की भांति दाल रोटी आदि का भोजन नहीं करते हैं।
प्रश्न 60 - यदि भगवान हमारी आपके तरह भोजन नहीं करते हैं तो वे क्या खाते हैं?
उत्तर - उनके लिए भोजन वस्त्रादि की सामग्री स्वर्ग से आती है।
प्रश्न 61 - हित मित प्रिय वचन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर - भगवान जब भी कुछ बोलते हैं तो सबके लिए हितकारी मितकारी एवं प्रिय वचन बोलते हैं उनके वचनों से किसी को भी किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है।
प्रश्न 62 - अतुल बल से क्या अभिप्राय है?
उत्तर - भगवान के शरीर में इतना बल होता है कि जितना है कि जितना बल देव, दानवों, मानवों में होता है उनके बल से भी अनंत गुना बल भगवान के शरीर में होता है।
प्रश्न 63 - सफेद रक्त से क्या आशय है?
उत्तर - जिस प्रकार हमारे शरीर में लाल रक्त होता है। उसी प्रकार भगवान के शरीर में सफेद रक्त होता है।
प्रश्न 64 - भगवान के शरीर में कितने लक्षण होते हैं?
उत्तर - भगवान के शरीर में 1008 लक्षण चिन्ह होते हैं।
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प्रश्न 65 - सच चतुस्त्र संस्थान किसे कहते हैं?
उत्तर - शरीर के सुन्दर सुड़ोल बनावट ही सम चतुस्त्र संस्थान है शरीर के जिस अंग का जैसा आकार होना चाहिए, उतना ही हो तो समचतुस्त्र संस्थान होता है।
प्रश्न 66 - वज्र वृषभ नाराच संहनन क्या है?
उत्तर - जब शरीर की हडि़्यां इतनी मजबूत हों तो उन पर व्रज भी गिर जाए तो उनमें कुछ बिगाड़ ना हो ये वज्र वृषभ नाराच सहनन कहलाता है।
प्रश्न 67 - इस सहनन की क्या विशेषता है?
उत्तर - ये प्रत्येक मोक्ष जाने वाले जीव में अवश्य ही पाया जाता है।
प्रश्न 68 - जन्म के दस अतिश्यों को पद्य में बतलाइये।
उत्तर - जन्म के दस अतिश्यां को बतलाने वाली पद्य इस प्रकर है-
अतिश्य रूप सुगन्धित तन, नाहि पसेव निहार,
प्रियहित वचन अतुल्य बल रूधिर श्वेत आकार,
लक्षण सहस अरू आठ तन सम चतुष्क संठान,
वज्र वुषभ नाराच जुत य जनमत, दस ज्ञान।।
प्रश्न 69 - अरिहंत भगवान के शरीर के आश्रय से कितने अतिश्य होते हैं?
उत्तर - जन्म के दश अतिश्यों से अतिरिक्त, नख केश नहीं बढ़ना नेत्रों की पलकें नही झपकना, शरीर की परछाई नहीं पड़ना, चारों दिशाओं में मुख दिखाना, आकाश गमन तथा कवलाहारनहीं होना। कुल 15 अतिश्य।
प्रश्न 70 - अरिहंत भगवान के शरीर को क्या कहते हैं?
उत्तर - अरिहंत भगवान के शरीर को परमौदारिक शरीर कहते हैं।
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प्रश्न 71 - केवलज्ञान के समय होने वाले अतिश्यों के नाम बताइये।
उत्तर - ये दस अतिश्य होते हैं- 1 - सौ-सौ योजन तक सुभिक्षता
2 - आकाश में गमन
3 - चार मुख दिखना,
4 - हिंसा न होना
5 - उपसर्ग नहीं होना
6 - कवलाहार नहीं होना
7 - समस्त विद्याओं का स्वामीपना
8 - नख केश नहीं बढ़ना,
9 - नेत्रों की पलकें नही झपकला,
10 - परछाई नहीं पड़ना।
प्रश्न 72 - सौ योजन तक सुभिक्षता का क्या आशय है?
उत्तर - सौ योजन तक सुभिक्षता का क्या आशय है? जहां भगवान का समवसरण रहता है उससे समस्त दिशाओ, सौ-सौ योजन 800 मील तक अकाल नहीं पड़ता है। पृथ्वी धन धान्य से भरी रहती है।
प्रश्न 73 - एक योजन का क्या माप है?
उत्तर - एक योजन चार कोश का होता है।
प्रश्न 74 - हिंसा न होने से क्या आशय है?
उत्तर - जहां भगवान का समवसरण रहता है वहां किसी भी प्रकार का प्राणबध नहीं होता है।
प्रश्न 75 - समस्त विद्याओं के स्वामीपना से क्या आशय है?
उत्तर - केवलज्ञानी भगवान संसार की समस्त विद्याओं के स्वामी-ईश्वर होते हैं।
प्रश्न 76 - भगवान का वास्तविक मुख किस दिशा में रहता है?
उत्तर - भगवान का वास्तविक मुख पूरब या उत्तर में रहता है।
प्रश्न 77 - कवलाहार किसे कहते हैं?
जो आहर मुख द्वारा लिया जाता है उसे कवलाहार कहते हैं जैसे अन्नादि।
प्रश्न 78 - केवलज्ञान के दस अतिश्य को बतलाने वाली पद्य बताइये।
उत्तर -
योजन शत इक में सुभिख, गगन गमन मुख चार,
नहि अदया, उपसर्ग नहीं, नाहिं कवलाहार।
सब विद्या ईश्वरपनों, नाहिं बढ़ें नख केश,
अनिमिष दृग छाया रहित, दश केवल के वेश।।
प्रश्न 79 - उपसर्ग किसे कहते हैं?
उत्तर - तप और ध्यान में जो विघ्न किया जाता है, उपद्रव किया जाता है उसे उपसर्ग कहते हैं।
प्रश्न 80 - देवकृत अतिश्य कौन-कौन से हैं?
उत्तर - देवकृत अतिश्य चैदह हैं- 1 - अर्धमागधी भाषा
2 - जीवों में परस्पर मित्रता
3 - दिशाओं की निर्मलता
4 - आकाश की निर्मलता
5 - छहों ऋतुओं के फल फूलों का एक साथ होना
6 - एक योजन तक पृथ्वी का दर्पण की तरह निर्मल होना
7 - विहार के समय भगवान के चरणों के नीचे स्वर्णकमलों की रचना होना,
8 - आकाश में जय-जयकार की ध्वनि
9 - मंद सुगन्धित पवन
10 - सुगन्धित जल की वर्षा
11 - पवन कुमार देवों द्वारा भूमि की निष्कंटता
12 - समस्त प्राणियों को आनन्द
13 - भगवान के आगे धर्मचक्र चलना, एवं
14 - आठ मंगल द्रव्यों का एक साथ रहना।
प्रश्न 81 - भगवान क उपदेश कितनी भाषाओं में परिवर्तित होता है।
उत्तर - भगवान का उपदेश सात सौ अठारह भाषाओं में देव कृत अतिश्य से परिवर्तित होता है।
प्रश्न 82 - भगवन की वाणी की विशेषता बताइये।
उत्तर - भगवान की वाणी ऊँकार रूप होती है। उसकी आवाज मेघ गर्जना के समान होती है जिसमें होंठ तालु आदि नहीं चलते हैं।
प्रश्न 83 - भगवान की वाणी का दूसरा क्या नाम है?
उत्तर - भगवान की वाणी का दूसरा नाम दिव्य ध्वनि है।
प्रश्न 84 - भगवान की वाणी कितने अंगों से खिरती है?
उत्तर - भगवान की वाणी सभी अंगों से खिरती है।
प्रश्न 85 - भगवान की वाणी को कौन-सी भाषा कहते हैं?
उत्तर - भगवान की वाणी को अर्धमागधी कहते हैं।
प्रश्न 86 - भगवान की वाणी के मुख्य श्रोता कौन होते हैं?
उत्तर - भगवान की वाणी के मुख्य श्रोता चक्रवर्ती राजा, या सम्राट होते हैं।
प्रश्न 87 - भगवान की वाणी कब और कितने समय तक खिरती है?
उत्तर - भगवान की वाणी दिन और रात में चार वार दो-दो मर्हत तक खिरती है। मुख्य श्रेाता के आने पर कभी भी खिर सकती है।
प्रश्न 88 - भगवान की वाणी जहां प्रकट होती है उस स्थान को क्या कहते हैं?
उत्तर - भगवान की वाणी जहां प्रकट होती है उस स्थान को समवसरण कहते हैं।
प्रश्न 89 - विहार के समय भगवान के चरणों के नीचे कितने कमलों की रचना होती है?
उत्तर - विहार के समय भगवान के चरणों के नीचे सात कमलों की रचना देव करते हैं।
प्रश्न 90 - ये कमल कौन-से होते हैं?
उत्तर - ये कमल स्वर्ण कमल होते हैं।
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प्रश्न 91 - मंद सुगन्धित पवन कौन चलाते हैं?
उत्तर - ये मंद सुगन्धित पवन, वायु कुमार के देव चलाते हैं।
प्रश्न 92 - सुगन्धित जल की वर्षा कौन करते हैं?
उत्तर - सुगन्धित जल की वर्षा मेघ कुमार के देव करते हैं।
प्रश्न 93 - समवसरण में पवन कुमार के देव और क्या कार्य करते हैं।
उत्तर - समवसरण में पवन कुमार के देव भूमि को निष्कंटक बनाते हैं।
प्रश्न 94 - धर्म चक्र को कौन धारण करते हैं।
उत्तर - धर्म चक्र को सर्वाण्ह यक्ष धारण करते हैं?।
प्रश्न 95 - धर्म चक्र में कितने आरे होते हैं?
उत्तर - धर्मचक्र में एक हजार 8 आरे होते हैं।
प्रश्न 96 - एक समवसरण में कितने धर्मचक्र होते हैं?
उत्तर - एक समवसरण में चारों दिशाओं में चार धर्मचक्र होते हैं।
प्रश्न 97 - आठ मंगल द्रव्य कौन-से हैं?
उत्तर - 1 - दर्पण
2 - झारी
3 - स्वस्तिक
4 - सिंहासन
5 - चंवरविजना
6 - कलश एवं
7 - ठोना। ये आठ मंगल द्रव्य भगवान के समवसरण में रहते हैं।
प्रश्न 98 - आठ मंगल द्रव्यों की प्रत्येक की संख्या कितनी रहती है?
उत्तर - प्रत्येक मंगल द्रव्य 108-108, संख्या में रहते हैं।
प्रश्न 99 - देवकृत 14 अतिश्यों को पद् में बताइये।
उत्तर -
देव रचित हैं चार दश, अर्धमागधी भाष,
आपस माहीं मित्रता, निर्मल दिश आकाश।
होत फूल फल ऋतु सवै, पृथ्वी कांच समान,
चरण कमल तक कमल हैं, नभी ते जय-जय बान।।
प्रश्न 100 - आठ प्रतिहार्यों के नाम बताइये?
उत्तर - 1 - अशोक वृक्ष
2 - रत्नमयी सिंहासन
3 - तीन छत्र
4 - भामण्डल
5 - दिव्य ध्वनि
6 - देवों द्वारा पुष्पवृष्टि
7 - चैसठ चंवर
8 - दुंदुभि बाजे बजना।
प्रश्न 101 - अशोक वृक्ष किसे कहते हैं?
उत्तर - भगवान को जिस वृक्ष के नीचे केवलज्ञान होता है उसे अशोकवृक्ष कहते हैं। यह वृक्ष प्राणियों के शोक हरने के कारण अपने नाम की सार्थकता को धारण करता है।
प्रश्न 102 - भामण्डल किसे कहते हैं?
उत्तर - भगवान के शरीर की प्रभा को भामण्डल कहते हैं।
प्रश्न 103 - भामण्डल की क्या विशेषता है?
उत्तर - इस भामण्डल में भव्य जीवों केा अपने सात भव दिखायी पड़ते हैं। तीन पहले के एक वर्तमान का तथा तीन आगे के।
प्रश्न 104 - अष्ट प्रतिहार्य को बताने वाला पद्य बताइये।
उत्तर - पद्य इस प्रकार है-
तरू अशोक के निकट में सिंहासर छवि दार।
तीन छत्र सिर पर फिरे, भामण्डल पिछवार।।
दिव्य ध्वनी मुख ते खिरे, पुष्प वृष्टि सुर होय।
ढोरे चैसढ चमर जखु, बाजें दुंदुभि जाये।।
प्रश्न 105 - प्रातिहार्य किसे कहते हैं?
उत्तर - विशेष शोभा की वस्तुओं को प्रातिहार्य कहते हैं।
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प्रश्न 106 - अनंत चतुष्टय के नाम बताइये।
उत्तर - 1 अनंतदर्शन 2 अनंतज्ञान 3 अनंतसुख एव 4 अनंतवीर्य।
प्रश्न 107 - उपरोक्त को अनंत चतुष्टय क्यों कहते हैं?
उत्तर - अंत रहित होने से इन्हें अनंत कहते हैं तथा ये चार होने से चतुष्ट कहलाते हैं।
प्रश्न 108 - अनंत दर्शन का क्या महत्व है?
उत्तर - अनंत दर्शन से केवली अरिहंत भगवान को तीनों लोकों की समस्तवस्तुओं का उनकी तीनों कालों की पर्यायों सहित एक समय में एक साथ दर्शन होता है।
प्रश्न 109 - अनंत ज्ञान का क्या कार्य है?
उत्तर - अनंत ज्ञान तीनों लोकों की समस्त वस्तुओं को एक साथ समय में उनकी अनंत पर्यायों युक्त जानता है।
प्रश्न 110 - अनंत सुख क्या है?
उत्तर - अरिहंत भगवान का सुख अंत रहित, उपमा रहित, अलौकिक अतीन्द्रय है। तीनों लोकों के जीवों को जितना सुख होता है उनसे अनंत गुना सुख अरिहंत भगवान को होता है।
प्रश्न 111 - अनंत-वीर्य क्या है?
उत्तर - वीर्य शक्ति को कहते हैं। अरिहंत भगवान शक्ति तीनों लोकों में सर्वोत्तम अंत रहित होती है।
प्रश्न 112 - अनंत चतुष्ट को पद्य में बताइये।
उत्तर -
ज्ञान अनंत, अनंत सुख, दरश अनंत प्रमाण।
बल अनंत अरिहंत सो इष्ट देव पहिचान।।
प्रश्न 113 - क्या प्रत्येक अरिहंत भगवान के 46 मूल गुण होते हैं?
उत्तर - जिन तीर्थंकरों के पंचकल्याणक होते हैं उन्हीं के 46 मूल गुण होते हैं। शेष के जन्म समय होने वाले 10 अतिश्य नहीं होते हैं।
।। णमोकार महामंत्र ।।
प्रश्न 1 - णमोकार महामंत्र का शुद्ध उच्चारण करके बताइये।
उत्तर- णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्व साहूणं।
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प्रश्न 2 - णमोकार मंत्र का क्या आशय है।
उत्तर- णमो अरिहंताणं-अरिहंतों को नमस्कार हो, णमो-सिद्धाणं-सिद्धों को नमस्कार हो। णमो आयरियाणं-आचार्यों को नमस्कार हो। णमो उवज्झायाणं- उपाध्यायों को नमस्कार हो, णमो लोए सव्व साहूणं-लोक के सभी साधुओं को नमस्कार हो।
प्रश्न 3 - णमोकार मंत्र के अन्य प्रचलित नाम क्या हैं?
उत्तर- 1 - णमोकार मंत्र,
2 - पंच नमस्कार मंत्र
3 - परमेरष्ठी मंत्र
4 - मूलमंत्र, अनादिनिधन (शाश्वत मंत्र)
5 - महामंत्र,
6 - नवकार मंत्र।
प्रश्न 4 - णमोकार मंत्र को नमस्कार मंत्र क्यों कहा जाता हैं?
उत्तर- क्योंकि इसमें जैन धर्म के पंचपरमेष्ठीयों को नमस्कार किया गया है।
प्रश्न 5 - णमोकार मंत्र को मूलमंत्र क्यों माना जाता है?
उत्तर- णमोकार मंत्र से सभी मंत्रों की रचना हुई है ऐसा माना जाता है तथा यह सभी समंत्रों में सारभाूत रूप में रहता है।
प्रश्न 6 - णमोकार मंत्र से कितने मंत्रों की रचना हुई है।
उत्तर- णमोकार मंत्र से 84 लाख मंत्रों की रचना मानी जाती है।
प्रश्न 7 - मंत्रों का जनक किसे कहा जाता है।
उत्तर- णमोकार मंत्र को मंत्रों का जनक जाना जाता है।
प्रश्न 8 - णमोकार मंत्र में कौन-कौन से पांच पद हैं?
उत्तर- णमोकार मंत्र में पांच पद निम्न हैं। 1 - णमो अरिहंताणं
2 - णमो सिद्धाणं
3 - णमो आयरियाणं
4 - णमो उवञ्झायाणं
5 - णमोलोए सव्व साहूंणं।
प्रश्न 9 - कौन से ग्रंथ में सर्वप्रथम णमोकार मंत्र को मंगलाचरण के रूप में लिखा गया है?
उत्तर- श्री भूतवली पुष्पदंत आचार्य ने षट्खंडागम ग्रंथ में णमोकार मंत्र को मंगलाचरण के रूप में लिखा है।
प्रश्न 10 - णमोकार मंत्र को जैन धर्म का प्राण क्यों माना जाता है?
उत्तर- णमोकार मंत्र पांच परमेष्ठियों का वाचक होने से जैन धर्म का प्राण माना जाता है क्योंकि जैन धर्म पंचपरमेष्ठियों के बिना नहीं हो सकता है और पंचपरमेष्ठी जैन के सिवा अन्यत्र नहीं होते हैं।
प्रश्न 11 - णमोकार मंत्र का आगम में क्या महात्म्यं बताया गय है।
उत्तर- आगम में णमोकार मंत्र का महात्म्य निम्न प्रकर प्रतिपादित किया गया है-
ऐसा पंच णमोयारो सव्व पावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिंह पढ़मं हवई मंगलम्।। jain temple73
प्रश्न 12 - णमोकार मंत्र के महात्म्य का हिन्दी आशय बताइये।
उत्तर- ये पंच नमस्कार मंत्र सभी पापों का नाश करने वाला है। और सभी मंगलों में पहला मंगल है।
प्रश्न 13 - मंगल किसे कहते हैं?
उत्तर- जो पापों को गलाये तथा पुण्य को प्रदान करे उसे मंगल कहते हैं।
प्रश्न 14 - पाप किसे कहते हैं?
उत्तर- जो आत्मा का पतन करे नरक निगोद में गिराये उसे पाप कहते हैं।
प्रश्न 15 - पाप कौन-कौन से हैं?
उत्तर- 1 हिंसा 2 झूठ 3 चोरी 4 कुशील 5 परिग्रह ये पांच पाप होते हैं।
प्रश्न 16 - णमोकार मंत्र का छोटा पंचाक्षरी मंत्र कौन-सा है?
उत्तर- णमोकार मंत्र का छोटा पंचाक्षरी मंत्र असिअउसा है।
प्रश्न 17 - णमोकार मंत्र से असिआ उसा कैसे बनता है?
उत्तर- पांचों परमेष्ठियों के नाम के प्रथमाक्षर लेने से असि आ उसा बनता है जैसे अरिहंत परमेष्ठी का अ सिद्ध परमेष्ठी का सि आचार्य परमेष्ठी आ उपाध्याय परमेष्ठी का उ तथा साधु परमेष्ठी का सा लेने से असि आ उसा बनता है।
प्रश्न 18 - णमोकार मंत्र का सबसे छोटा रूप क्या है?
उत्तर- णमोकार मंत्र का सबसे छोटा रूप ऊँ हैं।
प्रश्न 19 - णमोकार मंत्र से ऊँ किस प्रकार बनता है?
उत्तर- अरिहंत जी का, अ, सिद्ध परमेष्ठी का उपर दूसरा नाम अशरीरी है दोनों के अ$ अ मिलाने से आ हो जाता है आचार्य का आ मिलाने से आ $ आ = आ ही रहता है। उपाध्याय का उ मिलाने से ओ होता है मुनि का, म मिलाने से ओ $ म = ऊँ बन जाता है।
प्रश्न 20 - पंच परमेष्ठियों के बारे में आगम में क्या महत्व की बात बताई गयी है?
उत्तर- पंचपरमेष्ठियों के महत्व को बताने वाली चत्तारिदंडक बताई गयी है।
प्रश्न 21 - ये चत्तारिदंडक क्या है?
उत्तर- चत्तारिदंडक निम्न प्रकार से है-
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चत्तारिमंगलं, अरिहंत मंगलं सिद्ध मंगलं साहू मंगलं, केवलि पण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लो गुत्तमा, अरिहंतलोगुत्तमा, सिद्धलोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मोलोगुत्तमा।। चत्तरिसरणं पव्वञ्जामि, अरिहंतसरणं पव्वञ्जामि, सिद्धसरणं पव्वञ्जामि, साहूसरणं पव्वञ्जामि केवलि पणात्तो धम्मंसरणं पव्वञ्जामि।
प्रश्न 22 - चत्तारिक मंगल का अर्थ बताइये।
उत्तर- लोक में चार मंगल हैं अरिहंत परमेष्ठी मंगल हैं, सिद्ध परमेष्ठी मंगल हैं, आचार्य उपाध्याय साधू परमेष्ठी मंगल है एवं केवलीभगवन के द्वारा बताया गया धर्म मंगल है।
प्रश्न 23 - चत्तारिलोगुत्तमा का अर्थ बताइये।
उत्तर- लोक में चार उत्तम हैं, अरिहंत परमेष्ठी लोक में उत्तम हैं, सिद्ध परमेष्ठी लोक में उत्तम हैं, आचार्य उपाध्याय साधु परमेष्ठी लोक में उत्तम हैं एवं केवलिभगवान के द्वारा बताया गय धर्म लोक में उत्तम हैं।
प्रश्न 24- चत्तारि सरणं पव्वञ्जामि - का अर्थ बताइये?
उत्तर- मैं चार की शरण जाता हूं अरिहंत की शरण जाता हूं, सिद्ध की शरण् जाता हूं, आचार्य उपाध्याय साधु की शरण जाता हूं केवली भगवान के द्वारा बताये गये धर्म की शरण जाता हूं।
प्रश्न 25 - आचार्य उपाध्याय और साधु इन तीन परमेष्ठियों को एक शब्द में क्या कहते हैं?
उत्तर- आचार्य उपाध्याय और साधु इन तीनों को साहू (साधू) कहा जाता है।
प्रश्न 26 - पंच परमेष्ठियों में देव और गुरू कौन-कौन है?
उत्तर- पंच परमेष्ठियों में अरिहंत सिद्ध देव हैं, आचार्य, उपाध्याय और साधू गुरू हैं।
प्रश्न 27 - णमोकार मंत्र को सुनकर प्राप्त करने वाले किन्हीं तीन जीवों के नाम बताइये।
उत्तर- कुत्ता, नाम युगल, तथा बैल।
प्रश्न 28 - जीवों को णमोकार मंत्र सुनाने वाले ख्याति प्राप्त किन्हीं तीन महानुभावों के नाम बताइये।
उत्तर- जीवंधर स्वामी, भगवान पाश्र्वनाथ एवं भगवान राम।
प्रश्न 29 - राम भगवान कैसे हैं?
उत्तर- जितने मोक्षगामी जीव हैं सभी को भगवान संज्ञा है। राम भी कर्मों का नाश करके मांगीतुंगी से मोक्ष गये हैं। अतः राम भी भगवान हैं।
प्रश्न 30 - णमोकार मंत्र बैंक वर्तमान में कहां है और इसके संस्थापक का नाम क्या है।
उत्तर- णमोकार मंत्र बैंक इस समय उत्तर प्रदेश राज्य में मेरठ जिले में अतिश्य क्षेत्र जम्बूद्वीप में हैं। इसकी संस्थापिका इस युग की प्रथम बाल सती आर्यिका शिरोमणि परम पूज्य गणिनी आर्यिका रत्न श्री ज्ञानमती माताजी हैं।
प्रश्न 31 - णमोकार मंत्र बैंक में क्या होता है?
उत्तर- णमोकार मंत्र बैंक में जो महानुभाव खाता खोलकर 1 वर्ष में सवालाख, पचास हजार, पच्चीस हजार मंत्र लिखकर जमा कराते हैं उन्हें हीरक पदक, स्वर्ण पदक तथा रजत पदक से सम्मानित किया जाता है।
प्रश्न 32 - ये सम्मान कब किया जाता है?
उत्तर- ये सम्मान परम गणिनी आर्यिका-रत्न श्री ज्ञानमती माताजी के प्रत्येक जन्म दिवस शरद पूर्णिमा जो अक्टूबर में आता है, दिया जाता है।
प्रश्न 33 - वर्तमान में णमोकार मंत्र बाबा के नाम से कौन-से साधु प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं?
उत्तर- वर्तमान में परम पूज्य आचार्य श्री कल्याण सागरजी महाराज णमोकार मंत्र वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं।
प्रश्न 34 - भगवान पाश्र्वनाथ ने किसको णमोकार मंत्र सुनाया था?
उत्तर- भगवान पाश्र्वनाथ ने जलते हुए नाग-नागिन को णमोकार मंत्र सुनाया था।
प्रश्न 35 - नाग-युगल ने णमोकार मंत्र सुनकर क्या फल प्राप्त किया?
उत्तर- नाग-युगल णमोकार मंत्र सुनकर पातालाधिपति व्यंतरेन्द्र पद्मावती-धरणेन्द्र हो गये। जहां उन्होंने सम्यक्दर्शन को धारण किया।
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प्रश्न 36 - मरते हुए कुत्ते को णमोकार मंत्र किसने सुनाया था?
उत्तर- मरते हुए कुत्ते को णमोकार मंत्र राजकुमार जीवंधर स्वामी ने सुनाया था।
प्रश्न 37 - कुत्ते ने णमोकार मंत्र सुनकर क्या फल प्राप्त किया?
उत्तर- णमोकार मंत्र सुनकर कुत्ता सुदर्शन नाम का यक्षेन्द्र देव हो गया।
प्रश्न 38 - मरते हुए बैल को णमोकार मंत्र किसने सुनाया?
उत्तर- मरते हुए बैल को णमोकार मंत्र राम ने सुनाया था।
प्रश्न 39 - बैल ने णमोकार मंत्र को सुनकर क्या फल प्राप्त किया?
उत्तर- बैल का जीव ही सुग्रीव हुआ।
प्रश्न 40 - अंजन चोर ने णमोकार मंत्र का क्या फल प्राप्त किया?
उत्तर- जिनदत्त सेठ से प्राप्त णमोकार को परोक्ष में प्राप्त करके बतायी विधि से जिनदत्त सेठ के वचनों के प्रमाणित मानकर आकाशगामी विद्या को प्राप्त किया तथा कर्मों का नाश करके मोक्ष को प्राप्त हुआ।
प्रश्न 41 - णमोकार मंत्र का अपमान किसने किया था?
उत्तर- णमोकार मंत्र का अपमान हस्तिनापुर के चक्रवर्ती राजा सुभौम ने किया था।
प्रश्न 42 - चक्रवर्ती सुभौम ने णमोकार मंत्र का अपमान क्यों किया?
उत्तर- अपने प्राण बचाने के लिए सुभौम चक्रवर्ती ने णमोकार मंत्र का अपमान किया।
प्रश्न 43 - णमोकार मंत्र की प्रसिद्ध हिन्दी पूजा रचयिता का नाम बताइये।
उत्तर- णमोकार मंत्र की हिन्दी पूजा रचयित्री का नाम परम पूज्य गणिनी आर्यिका रत्न श्री ज्ञानमती माताजी है।
प्रश्न 44 - सुभौम चक्रवर्ती ने णमोकार मंत्र का अपमान किस प्रकार किया?
उत्तर- सुभौम चक्रवर्ती ने णमोकार मंत्र को लिखकर उसके ऊपर पैर रखकर णमोकार मंत्र का अपमान किया।
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प्रश्न 45 - णमोकार के अपमान का चक्रवर्ती को क्या फल मिला?
उत्तर- व्यंतर देव ने चक्रवर्ती को लवण समुद्र में डुबा दिया जिससे चक्रवर्ती मरकर सातवें नरक चला गया।
प्रश्न 46 - तीन कम नौ करोड़ मुनिराजों की गणना किस अपेक्षा से है?
उत्तर- यह गणना 14 गुणस्थानों की अपेक्षा से हैं
प्रश्न 47 - तीन कम नौ करोड़ मुनिराजों में कौन-कौन से परमेष्ठी आते हैं?
उत्तर- तीन कम नौ करौड़ मुनिराजाअें में अरिहंत आचार्य, उपध्याय और साधु ये चार परमेष्ठी आते हैं।
प्रश्न 48 - णमोकार मंत्र के नाम से कौन सा व्रत किया जाता है?
उत्तर- णमोकार मंत्र के नाम से णमोकार पैंतीसी का व्रत किया जाता है क्योकि णमोकार मंत्र में 35 अक्षरी होते हैं।
इसमें एक अक्षर का एक उपवास इस प्रकार कुल 35 उपवास किया जाते हैं।
प्रश्न 49 - इस व्रत में कैान-सी तिथि के कितने उपवास किये जाते हैं?
उत्तर- इस व्रत में पंचमी के पांच, सप्तमी के सात, नवमी के नौ तथा चैदस के चैदह उपवास किये जाते हैं।
प्रश्न 50 - ये व्रत कब प्रारम्भ किया जाता है?
उत्तर- यं व्रत किसी भी मास की पंचमी, सप्तमी, नवमी या चैदस को प्रारम्भ किया जा सकता है।
प्रश्न 51 - इस व्रत में उपवास के समय क्या किया जाता है?
उत्तर- इस व्रत में उपवास के दिन भगवान जिनेन्द्र का अभिषेक करके णमोकार मंत्र का पूजन तथा जाप करना चाहिए।
प्रश्न 52 - इस व्रत में कौन से मंत्र का जाप करना चाहिए?
उत्तर- इस व्रत में णमोकार मंत्र के निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए- ऊँ ह्मां णमो अरिहंताणं, ऊँ ह्मीं णमो सिद्धाणं, ऊँ ह्मूं णमो आयरियाणं, ऊँ ह्मौं उवज्झायाणं, ऊँ ह्मः णमो लोएसव्वसाहूणं।
प्रश्न 53 - इस व्रत का उद्यापन किस प्रकार करना चाहिए?
उत्तर- इस व्रत के उद्यापन में पंच परमेष्ठी विधान करके मंदिर में 35 प्रकार के 35-35 या इतना सम्भव नहीं हो सके तो 35 वस्तुएं मंदिर में दान देना चाहिए।
प्रश्न 54 - णमोंकार मंत्र के पांचों पदों में कितने अक्षर हैं?
उत्तर- णमोकार मंत्र में पांचों पदों में पैंतीस अक्षर हैं।
प्रश्न 55 - प्रथम पद मणे अरिहंताणं में कितने अक्षर है?ं
उत्तर- द्वितीय पद णमो सिद्धांणं में 7 अक्षर अक्षर हैं।
प्रश्न 56 - द्वितीय पद णमो सिद्धाणं में कितने अक्षर हैं?
उत्तर- द्वितीय पद णमो सिद्धाणं में 5 अक्षर हैं।
प्रश्न 57 - तृतीय पद णमो आयरियाणं में कितने अक्षर है?
उत्तर- तृतीय पद णमो आयरियाणं में सात अक्षर हघ्ैं।
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प्रश्न 58 - चैथे पद णमो उवज्झायाणं में कितने अक्षर हैं?
उत्तर- चैथे पद उवज्झायाणं में सात अक्षर हैं।
प्रश्न 59 - पांचवे पद णमो लोए सव्वसाहूणं में कितने अक्षर हैं?
उत्तर- पांचवें पद णमो लोए सव्वसाहूणं में नौ अक्षर हैं।
प्रश्न 60 - णमोकार मंत्र को आर्या छन्दमें किस प्रकार पढ़ेंगे?
उत्तर- णमोकार मंत्र को आर्याछन्द में निम्न प्रकार चार चरणों में पढ़ेंगे-
णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।
प्रश्न 61 - आर्याछन्द के अनुसार णमोकार मंत्र के चारों चरणों में कितनी मात्रायें होती हैं?
उत्तर- णमोकार मंत्र के चारों चरणों में सत्तावन मात्रायें होती हैं।
प्रश्न 62 - णमोकार मंत्र के प्रथम चरण णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं में कितनी मात्रायेंह ैं?
उत्तर- णमोकार मंत्र के उपरोक्त प्रथम चरण में बारह मात्रायें हैं।
प्रश्न 63 - णमोकार मंत्र के द्वितीय चरण णमो आयरियाणं में कितनी मात्रायें हैं?
उत्तर- णमोकार मंत्र के उपरोक्त द्वितीय चरण में पन्द्रह मात्रायें हैं।
प्रश्न 64 - णमोकार मंत्र के तृतीय चरण मणे उवज्झायाणं में कितनी मात्रायेंह ैं?
उत्तर- णमोकार मंत्र के उपरोक्त तृतीय चरण में बारह मात्रायें हैं।
प्रश्न 65 - णमोकार मंत्र के पैंतीस अक्षरों को गिनाइये।
उत्तर- णमोकार मंत्र के 35 अक्षर निम्न प्रकार हैं-
1. ण 2. मो 3. अ 4. रि 5. हं 6. ता 7. ण्पं 8. ण 9. मो 10 सि 11. द्धा 12. णं 13. ण 14 मो 15 आ 16. य 17. रि 18 या 19. णं 20. ण 21 मो 22. उ 23. व 24. ज्झा 25. या 26. णं 27. ण 28. मो 29. लो 30. ए 31. स 32. व्व 33. सा 34. हू 35. णं
jain temple78
प्रश्न 66n> आचार्य श्री उमास्वामी महाराज ने।
प्रश्न 67 - णमोकार मंत्र के अन्य स्तोत्र का नाम बताइये।
उत्तर- णमोकार मंत्र के अन्य स्तोत्र का नाम है वज्र पंजर स्तोत्र।
प्रश्न 68 - णमोकार मंत्र नवग्रह अरिष्ट निवारक किस प्रकार है?
उत्तर- णमोकार मंत्र के पांचों पद मिलकर नवग्रह अरिष्ट का नाश करते हैं।
प्रश्न 69 - नवग्रह क्या हैं?
उत्तर- ज्योतिषी देवों के नो विमानों को नवग्रह कहा है।
प्रश्न 70 - वे नवग्रह कौन-कौन से हैं?
उत्तर- 1 - सूर्य
2 - चन्द्र
3 - मंगल,
4 - बुध
5 - गुरू
6 - शुक्र
7 - शनि
8 - राहू
9 - केतू
प्रश्न 71 - णमोकार मंत्र में सूर्य ग्रह अरिष्ट निवारण का मंत्र बताइये।
उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो सिद्धांण रवि ग्रह अरिष्ट निवारण कुरू-कुरू स्वाहा।
प्रश्न 72 - णमोकार मंत्र में से चन्द्रग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये।
उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो अरिहंताण मम चन्द्र अरिष्ट निवरण कुरू-कुरू स्वाहा।
प्रश्न 73 - णमोकार मंत्र में से मंगल ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये।
उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो सिद्धांणं मम मंगलग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा।
प्रश्न 74 - णमोकार मंत्र में से बुघ ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये।
उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो उवज्झायाणं मम बुध ग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा।
jain temple79
प्रश्न 75 - णमोकार मंत्र में से गुरू ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये।
उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो आयरियाणं मम गुरू ग्रह अरष्टि निवारणं कुरू कुरू स्वाहा।
प्रश्न 76 - णमोकार मंत्र में से शुक्र ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये।
उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो अरिहंताणं मम शुक्र ग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा।
प्रश्न 77 - णमोकार मंत्र में से शनि ग्रह निवारक मंत्र बताइये।
उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो लोए सव्वासाहूणं मम शनि ग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू ह्मीं नमः।
प्रश्न 78 - णमोकार मंत्र में से राहू ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये।
उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो लोए सव्वसाहूणं मम राहु ग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा।
प्रश्न 79 - णमोकार मंत्र का केतु ग्रह अरिष्ट निवारक मंत्र बताइये।
उत्तर- ऊँ ह्मीं णमो लोए सव्वसाहूणं मम केतु ग्रह अरिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा।
प्रश्न 80 - अरिहंत परमेष्ठी कौन-कौन से ग्रहों का अरिष्ट निवारण करते हैं?
उत्तर- वैसे तो पांचों परमेष्ठी समस्त नौ ग्रहों का अरिष्ट निवारण करने में असमर्थ हैं। फिर भी अरिहंत परमेष्ठी चन्द्र एवं शुक्र ग्रह के अरिष्ट का नाश करते हैं।
प्रश्न 81 - सिद्ध परमेष्ठी कौन-से ग्रह का अरिष्ट निवारण करते हैं?
उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी सूर्य एवं मंगल गृह के अरिष्ट का नाश करते हैं।
प्रश्न 82 - आचार्य परमेष्ठी कौन-से ग्रह का अरिष्ट नाश करते हैं?
उत्तर- आचार्य परमेष्ठी गुरू ग्रह का अरिष्ट नाश करते हैं।
प्रश्न 83 - उपाध्याय परमेष्ठी कौन-से ग्रह का अरिष्ट नाश करते हैं?
उत्तर- उपाध्याय परमेष्ठी बुध ग्रह का अरिष्ट नाश करते हैं।
प्रश्न 84 - साधु परमेष्ठी कौन-से ग्रह का अरिष्ट नाश करते हैं?
उत्तर- साधु परमेष्ठी शनि, राहु एवं केतु इन तीन ग्रहों के अरिष्ट का नाश करते हैं।
प्रश्न 85 - सूर्य ग्रह अरिष्ट निवारण के कितनी जाज्यें की जाती हैं?
उत्तर- सूर्य ग्रह अरिष्ट निवारण के लिए 10,000 जाप्य मंत्र, 100 माला करना चाहिए।
प्रश्न 86 - चन्द्रग्रह अरिष्ट निवारण के लिए कितनी जाज्यें करना चाहिए?
उत्तर- चन्द्र ग्रह निवारण के लिए 10,000 जाप्यें 100 माला करना चाहिए।
प्रश्न 87 - बुध ग्रह अरिष्ट निवारण एवं अन्य ग्रहों के अरिष्ट निवारण के लिए कितनी माला करना चाहिए?
उत्तर- प्रत्येक ग्रह अरिष्ट निवारण के लिए कम से कम दस हजार अधि से अधिक सवा लाख जाप्य मंत्र अर्थात 1250 मालाएं करना चाहिए। मालाएं पूर्ण होने दश मांश 1/10 पाज्य मंत्रों की हवनपूर्वक पूर्ण आहुति देना चाहिए।
प्रश्न 88 - णमोकार मंत्र में कितनी मात्रायें होती हैं?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 58 मात्रायें होती हैं।
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प्रश्न 89 - णमोकार मंत्र में 58 मात्राएं किस प्रकार हैं?
उत्तर- णमोकार मंत्र के प्रथम पद में ग्यारह मात्रायें, द्वितीय पद में आठ, तृतीय पद में ग्यारह, चतुर्थ पद में बारह , एवं पंचम पद में सोलह कुल मिलाकर (11$8$11$12$16 = 58) मात्रायें हुई।
प्रश्न 90 - णमोकार मंत्र के प्रथम पद की मात्राओं को गिनाइये।
उत्तर-
णमो अरिहंताणं
।ऽ ।।ऽऽऽ कुल ग्यारह मात्रायें
प्रश्न 91 - णमोकार मंत्र के द्वितीय पद की मात्राओं को गिनइये।
उत्तर- ।ऽ ।।ऽ ऽ कुल आठ मात्रायें
प्रश्न 92 - णमोकार मंत्र के तृतीय पद की मात्राओं को गिनाइये।
उत्तर-
णमो आयरियाणं
।ऽ ऽ।।ऽऽ कुल ग्यारह मात्रायें
प्रश्न 93 - णमोकार मंत्र के चैथे पद की मात्राओं को गिनाइये।
उत्तर-
णमो उवज्झायाणं
।ऽ ।।ऽ ऽ ऽ कुल बारह मात्रायें
प्रश्न 94 - णमोकार मंत्र के पांचवें पद की मात्राओं को गिनाइये।
उत्तर-
णमो लोए सव्व साहूणं
।ऽ ऽ ऽ ऽ।।ऽ ऽ ऽ कुल सोलह मात्रायें
प्रश्न 95 - णमोकार मंत्र में कितने स्वर तथा कितने व्यंजन हैं?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 34 स्वर तथा 30 व्यंजन हैं। कुछ चैसठ वर्ण हैं।
प्रश्न 96 - णमोकार मंत्र की ज्ञान के रूप में क्या विशेषता है?
उत्तर- णमोकार मंत्र में सम्पूर्ण द्वादशांग श्रुत समाहित माना गया है।
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प्रश्न 97 - णमोकार मंत्र में द्वादशांग किस प्रकार समाहित हैं?
उत्तर- णमोकार मंत्र के चैसठ वर्णों को अलग-अलग लिखकर प्रत्येक के ऊपर दो का अंक रखकर गुणा करने से प्राप्त हुई संख्या में एक घटाने से द्वादशांग के श्रुत अक्षर प्राप्त हो जाते हैं।
प्रश्न 98 - द्वादशांग के अक्षरों की संख्या बताइये।
उत्तर- संख्या इस प्रकार हैं-
18446744073709551615।
प्रश्न 99 - वर्तमान में णमोकार मंत्र के प्रभाव से व्यंतर बाधाओं को कौन-से मुनिराज दूर कर रहे हैं?
उत्तर- परम पूज्य वालाचार्य श्री योगीन्द्र सागरजी महाराज।
प्रश्न 100 - उन्हें ये सिद्धी कहां से प्राप्त हुई?
उत्तर- अतिशय क्षेत्र चांदखेडी में भगवान श्री आदिनाथ की अतिशययुक्त प्रतिमा दर्शन करने से।
।। तीस चैबीसी के तीर्थंकर ।।
श्न 1 - ये तीस चैबीसी क्या है?
उत्तर - ढाई द्वीप के अंदर मेरूओं से सम्बंधित पांच भरत एवं पांच ऐरावत ऐसे देश क्षेत्रों के प्रत्येक कर्मकाल में चैबीस-चैबीस तीर्थंकर होते हैं। भूतकाल की दशा क्षेत्रों की दश चैबीसी वर्तमान काल की दशएवं भविष्यत काल की दश ऐसी तीस चैबीसी होती है।
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प्रश्न 2 - कुछ चैबीसी कितनी होती है?
उत्तर - ऐसे तो अनंत चैबीसी होती हैं।
प्रश्न 3 - तीस चैबीसी के कुल कितने तीर्थंकर होते हैं?
उत्तर - 30 गुण 24 कुल 720 तीर्थंकर होते हैं।
प्रश्न 4 - पांच भरत एवं पांच ऐरावत कहां-कहां है?
उत्तर - जम्बूद्वीप के सुदर्शन मेरू से सम्बंधित एक भरत तथा एक ऐरावत है। धातकी खंड के विजय मेरू अचल मेरू से सम्बंधित दो भरत तथा दो ऐरावत क्षेत्र हैं तथा पुष्करार्ध द्वीप में मंदर मेरू विद्युन्माली मेरू से सम्बंधित दो भरत तथा दो ऐरावत क्षेत्र हैं इस प्रकार पांच भरत पांच ऐरावत क्षेत्र हैं।
प्रश्न 5 - जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के भूत कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री निर्वाण जी (2) श्री सागर जी (3) श्री महासाधु जी (4) श्री विमल प्रभु जी (5) श्रीधरजी (6) श्री सुदत्त जी (7) श्री अमलप्रभ जी (8) श्री उद्धर जी (9) श्री अंगिर जी (10) श्री संमति जी (11) श्री सिंधु जी (12) श्री कुसमांजलि जी (13) श्री शिवण जी (14) श्री उत्साह जी (15) श्री ज्ञानेश्वर जी (16) श्री परमेश्वर जी (17) श्री विमलेश्वर जी (18) श्री यशोधर जी (19) श्री विमलेश्वर जी (20) श्री ज्ञानमति जी (21) श्री शुद्धमति जी (22) श्री भद्र जी (23) श्री अतिक्रांत जी (24) श्री शांत जी।
प्रश्न 6 - जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के वर्तमान काल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री आदिनाथ जी (2) श्री अजितनाथ जी (3) श्री संभवनाथ जी (4) श्री अभिनंदन नाथ जी (5) श्री सुमतिनाथ जी (6) श्री पुष्पदंत जी (7) श्री सुपाश्र्वनाथ (8) श्री चंदाप्रभु जी (9) श्री पुष्पदंत जी (10) श्री शीतलनाथ जी (11) श्री श्रेयांसनाथ जी (12) श्री वासुपूज्य जी (13) श्री विमलनाथ जी (14) श्री अनंतनाथ जी (15) श्री धर्मनाथ जी (16) श्री शांतिनाथ जी (17) श्री कुंथुनाथ जी (18) श्री अरहनाथ जी (19) श्री मल्लिनाथ जी (20) श्री मुनिसुव्रतनाथ जी (21) श्री नमिनाथ जी (22) श्री नेमिनाथ जी (23) श्री पाश्र्वनाथ जी (24) श्री वर्धमान जी।
प्रश्न 7 - जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के भविष्यत कालीन तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री महापद्म जी (2) श्री सुरदेव जी (3) श्री सुपाश्र्व जी (4) श्री स्वयंप्रभ जी (5) श्री सर्वात्मभूत जी (6) श्री देवपुत्र जी (7) श्री कुल पुत्र जी (8) श्री उदंक जी (9) श्री प्रौष्ठिल्य जी (10) श्री जय कीर्ति (11) श्री मुनिसुव्रत जी (12) श्री अरहनाथ जी (13) श्री निष्पाय जी (14) श्री निष्काय जी (15) श्री विपुल जी (16) श्री निर्मल जी (17) श्री चित्रगुप्त जी (18) श्री समाधिगुप्त जी (19) श्री स्वयंभू जी (20) श्री अनिवर्तक जी (21) श्री जयनाथ जी (22) श्री विमलजी (23) श्री देवपाल जी (24) श्री अनंतवीर्य जी।
प्रश्न 8 - जम्बूद्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भूतकालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री पंचरूप जी (2) श्री जिनधर जी (3) श्री सांप्रतिक जी (4) श्री उर्जयंत जी (5) श्री आधिक्षायिक जी (6) श्री अभिनंदन जी (7) श्री रत्नसेन जी (8) श्री रामेश्वर जी (9) श्री अनंगोञ्झित जी (10) श्री विन्यास जी (11) श्री अरोष जी (12) री सुविधान जी (13) श्री प्रदत्त जी (14) श्री कुमार जी (15) श्री सर्वशैल जी (16) श्री प्रभंजन जी (17) श्री सौभाग्य नाथ जी (18) श्री व्रत विंदु जी (19) श्री सिद्धकर जी (20) श्री ज्ञान शरीर जी (21) श्री कल्पदु्रम जी (22) श्री तीर्थकलेश जी (23) श्री दिनकर जी (24) श्री वीरप्रभु जी।
प्रश्न 9 - जम्बूद्वीप के ऐरावत क्षेत्र के वर्तमान कालिक चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री बालचंद्र जी (2) श्री सुव्रत जी (3) श्री अग्निसेन जी (4) श्री नंदिसेन जी (5) श्रीदत्त जी (6) श्रीव्रतधर जी (7) श्री सोमचन्द्र जी (8) श्री धृतिदीर्घ जी (9) श्री शताष्यु जी (10) श्री विवसित जी (11) श्री श्रेयान जी (12) री विश्रुतजल जी (13) श्री सिंहसेन जी (14) श्री उपशाांत जी (15) श्री गुप्तशासन जी (16) श्री अनंतवीर्य जी (17) श्री पाश्र्वजिनेन्द्र जी (18) श्री अभिधानजी (19) श्री मरूदेव जी (20) श्री श्रीधरजी (21) श्री शामकंठ जी (22) श्री अग्निप्रभ जी (23) श्री अग्निदत्त जी (24) श्री वीरसेन जी।
प्रश्न 10 - जम्बूद्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भविष्यत कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री सिद्धार्थजी (2) श्री विमल जी (3) श्री जयघोष जी (4) श्री नंदिसेन जी (5) श्री स्वर्गमंगल जी (6) श्री वज्राधरी जी (7) श्री निर्वाण जी (8) श्री धर्मध्वज जी (9) श्री सिद्धसेन जी (10) श्री महासेन जी (11) श्री रविमित्र जी (12) श्री सत्यसेनजी (13) श्री चन्द्रनाथ जी (14) श्री महीचन्द्र (15) श्री श्रुतांजन जी (16) श्री देवसेन जी (17) श्री सुव्रतनाथ जी (18) श्री जिनेन्द्रनाथ जी (19) श्री सुपाश्र्वजी (20) श्री सुकौशल जी (21) श्री अनंतनाथ जी (22) श्री विमल जी (23) श्री अमृतसेन जी (24) श्री अग्निदत्त जी।
प्रश्न 11 - पूर्व धातकी खंड के भरत क्षेत्र के भूतकालीन चैबीसी तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री रत्न प्रभुजी (2) श्री अमित नाथ जी (3) श्री संभवनाथ जी (4) श्री अकलंक जी (5) श्री चन्द्रस्वामी (6) श्री शुभंकर जी (7) श्री तत्वनाथ जी (8) श्री सुन्दर स्वामी जी (9) श्री पुरंधरजी (10) श्री स्वामिदेव जी (11) श्री देवदत्त जी (12) श्री वासवदत्त जी (13) श्री श्रेयोनाथ जी (14) श्री विश्वरूपजी (15) श्री तपस्तेज जी (16) श्री प्रतिवोधदेव जी (17) श्री सिद्धार्थ देव जी (18) श्री संजमजिन जी (19) श्री विमलनाथ जी (20) श्री देवेन्द्र जी (21) श्री प्रवरनाथ जी (22) श्री विश्वसेन जी (23) श्री मेघनंदि जी (24) त्रिजेत्रक जी।
प्रश्न 12 - पूर्वधातकी खंड के भरत क्षेत्र के वर्तमान कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री युगादिदेव जी (2) श्री सिद्धांतजी (3) श्री महेशनाथ जी (4) श्री परमार्थनाथ जी (5) श्री समुन्द्र जी (6) श्री भूधरनाथ जी (7) श्री उद्योत जी (8) श्री आर्जव जी (9) श्री अभयनाथ जी (10) श्री अप्रकंप जी (11) श्री पद्मनाथ जी (12) श्री पद्मनंदि जी (13) श्री प्रियंकर जी (14) श्री सुक्रतनाथ जी (15) श्री भद्रनाथ जी (16) श्री मुनिचन्द्र जी (17) श्री पंचमुष्ठिजी (18) श्री त्रिमुष्ठि जी (19) श्री गांगिक नाथ जी (20) श्री गणनाथ जी (21) श्री सर्वांगदेव जी (22) श्री ब्रहमेन्द्रनाथ जी (23) श्री इन्द्रद्रत जी (24) श्री नायक नाथ जी
प्रश्न 13 - पूर्व धातकी खंड के भरत क्षेत्र के भविष्यत कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री सिद्धार्थ देव जी (2) श्री सम्यगुण जी (3) श्री जिनेन्द्रदेव जी (4) श्री सम्पन्ननाथ जी (5) श्री सर्वस्वामिजी (6) श्री मुनिनाथ जी (7) श्री विशिष्ट देव जी (8) श्री अमरनाथ जी (9) श्री ब्रहमशांति जी (10) श्री पाश्र्वनाथ जी (11) श्री अकामुक देव जी (12) श्री ध्याननाथ जी (13) श्री कल्पजी (14) श्री संवरनाथ जी (15) श्री स्वास्थ्यनाथ जी (16) श्री आनंदनाथ जी (17) श्री रविप्रभ जी (18) श्री चन्द्रप्रभ जी (19) श्री सुनन्द जी (20) श्री सुकर्ण देव जी (21) श्री पाश्र्वनाथ जी (21) श्री पाश्र्वनाथ जी (24) श्री शाश्वतनाथ जी।
प्रश्न 14 - पूर्वी धातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र के भूतकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री वज्रस्वामी जी (2) श्री उदत्त जी (3) श्री सूर्यस्वामी जी (4) श्री पुरूषोत्तम जी (5) श्री शरणस्वामि जी (6) श्री अवबोध जी (7) श्री विक्रम जी (8) श्री निघंटिक जी (9) श्री हरीन्द्र जी (10) श्री परित्रेरित जी (11) श्री निर्वाण सूरि जी (12) श्री धर्महेतु (13) श्री चतुर्मुख जी (14) श्री सुक्रतेन्द्र जी (15) श्री श्रुताम्बु जी (16) श्री विमलार्क जी (17) श्री देवप्रभ जी (18) श्री धरणेन्द्र जी (19) श्री सुतीर्थनाथ जी (20) श्री उदयानंद जी (21) श्री सवार्थ देव जी (22) श्री धार्मिक जी (23) श्री क्षेत्रस्वामी जी (24) श्री हरिचंद्र जी
प्रश्न 15 - पूर्व धातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र े वर्तमान कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री अपश्चिम जी (2) श्री पुष्पदंत जी (3) श्री अर्हंदेव जी (4) श्री चरित्रनाथ जी (5) श्री सिद्धानंद जी (6) श्री नंदग जी (7) श्री पद्मकूप जी (8) श्री उदयनाभि जी (9) श्री अकमेन्द्र जी (10) श्री कृपालु जी (11) श्री प्रोष्ठिल जी (12) श्री सिद्धेश्वर जी (13) श्री अमृतेन्दु जी (14) श्री स्वामिनाथ जी (15) श्री भुवन लिंग जी (16) श्री सर्वरथ जी (17) श्री मेघनंद जी (18) श्री नंदकेश जी (19) श्री हरिनाथ जी (20) श्री अधिष्ठ जी (21) श्री शांतिक देव जी (22) श्री नंदस्वामिजी (23) श्री कुंदपाश्र्वजी (24) श्री विरोचन जी।
प्रश्न 16 - पूर्व धातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र के भविष्यतकालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री प्रवरवीर जी (2) श्री विजयप्रभ जी (3) श्री सत्यपद जी (4) श्री महामृगेन्द्र जी (5) श्री चिंतामणि जी (6) श्री अशोक जी (7) श्री द्विमृगेन्द्र जी (8) श्री उपवासिक जी (9) श्री पद्मनंद जी (10) श्री बोधकेन्द्र जी (11) री चिंताहिम जी (12) श्री उत्साहिक जी (13) श्री अपाशिव जी (14) श्री देवजल जी (15) श्री नारिक जी (16) श्री अनध जी (17) श्री नागेन्द्र जी (18) श्री नीलोत्पल जी (19) श्री अप्रकंप जी (20) श्री पुरोहित जी (21) श्री अप्रकंप जी (22) श्री पाश्र्वनाथ जी (23) श्री निर्वाच जी (24) श्री विरोषिक जी
प्रश्न 17 - पश्चिम धातकी खंड के भरत क्षेत्र के भूतकालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री वृषभनाथ जी (2) श्री प्रियमित्र जी (3) श्री शांतिनाथ जी (4) श्री सुमतिनाथ जी (5) श्री आदिनाथ जी (6) श्री आतिव्यक्त जी (7) श्री कलासेन जी (8) श्री कर्मजित जी (9) श्री प्रबुद्ध जी (10) श्री प्रवजित जी (11) श्री सुधर्म जी (12) श्री तमोदीप जी (13) श्री वज्रनाथ जी (14) श्री बुद्धनाथ जी (15) श्री प्रबंधदेव जी (16) श्री अतीतनाथ जी (17) श्री प्रमुख जिनेन्द्र जी (18) श्री पल्योपम जी (19) श्री अकोप जी (20) श्री निष्ठित जी (21) श्री मृगनाभि जी (22) श्री देवेन्द्र जी (23) श्री पदस्थ जी (24) श्री शिवनाथ जी।
प्रश्न 18 - पश्चिमी धातकी खंड के भरत क्षेत्र के वर्तमान चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री विश्वचन्द्र जी (2) श्री कपिल जिनेन्द्र जी (3) श्री वृषभदेव जी (4) श्री प्रियतेज जी (5) श्री प्रशम जिनेन्द्र जी (6) श्री वषिमांग जी (7) श्री चरित्रनाथ जी (8) श्री प्रभादित्य जी (9) श्री मुंजकेश जी (10) श्री वीतवास जी (11) श्री सुराधिप जी (12) श्री दयानाथ जी (13) श्री सहस्त्रभुज जी (14) श्री जिनसिंह जी (15) श्री रैवतनाथ जी (16) श्री बाहुस्वामिजी (17) श्री श्रीमालि जी (18) श्री अयोग देव जी (19) श्री अयोगिनाथ जी (20) श्री कामरिपु जी (21) श्री आरम्भ जी (22) श्री नेमिनाथ जी (23) श्री गर्भज्ञाति जी (24) श्री एकार्जित जी
प्रश्न 19 - पश्चिमी धातकी खंड के भरत क्षेत्र के भविष्यतकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री रक्त केश जी (2) श्री चक्रहस्त जी (3) री कृतनाथ जी (4) श्री परमेश्वर जी (5) श्री सुमूर्ति जी (6) श्री मुक्तिकांत जी (7) श्री निकेशि जी (8) श्री प्रशस्त जी (9) श्री निराहार जी (10) श्री अमूर्त जी (11) श्री द्विजनाथ जी (12) श्री श्रेयोगत जी (13) श्री अरूजनाथ जी (14) श्री दयाधिक जी (15) श्री दयाधिक जी (16) श्री पुष्पनाथ जी (17) श्री नरनाथ जी (18) श्री प्रतिभूति जी (19) श्री नागेन्द्र जी (20) श्री तपोधिक जी (21) श्री दशानन जी (22) श्री आरण्यक जी (23) श्री दशानीक जी (24) श्री सात्विक जी।
प्रश्न 20 - पश्चिमी घातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र के भूतकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री सुमेरू जिनेन्द्र जी (2) श्री जिनकृत जी (3) श्री कैंटभनाथ जी (4) श्री प्रशस्त दायक जी (5) श्री निर्दमन जी (6) श्री कुलकर जी (7) री वर्धमान जी (8) श्री अमृतेन्दु जी (9) श्री संख्यानंद जी (10) श्री कल्पकृत जी (11) श्री हरिनाथ जी (12) श्री बाहुस्वामि जी (13) श्री भार्गव जी (14) श्री सुभद्रस्वामी जी (15) श्री पविपाणि जी (16) श्री विपोषित जी (17) श्री ब्रह्मचारि जी (18) श्री असांक्षिक जी (19) श्री चारित्रेश जी (20) श्री पारिणामिक जी (21) श्री शाश्वतनाथ जी (22) श्री निधिनाथ जी (23) श्री कौशिक जी (24) श्री धर्मेशजी।
प्रश्न 21 - पश्चिमी धातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र के वर्तमान के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री साधित जी (2) श्री जिनस्वामि जी (3) श्री स्तमितेन्द्र जी (4) श्री अत्यानंद जी (5) श्री पुव्पोत्फुल्लजी (6) श्री मंडित जी (7) श्री प्रहित देव जी (8) श्री मदनसिद्ध जी (9) श्री हसदिंद्र जी (10) श्री चन्द्रपाश्र्वजी (11) श्री अब्जबोध जी (12) श्री जिनवल्लभ जी (13) श्री सुविभूति जी (14) श्री कुकुद्भास जी (15) श्री सुवर्णनाथ जी (16) श्री हरिवासिक जी (17) श्री प्रियमित्र जी (18) श्री धर्मदेव जी (19) श्री प्रियरत जी (20) श्री नंदिनाथ जी (21) श्री अश्वानीक जी (22) श्री पूर्वनाथ जी (23) श्री पाश्र्वनाथ जी (24) श्री चित्रहृदय जी।
प्रश्न 22 - पश्चिमी धातकी खंड के ऐरावत क्षेत्र के भाविकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री रवीन्दु जी (2) श्री सोम कुमार जी (3) श्री पृथ्वीनाथ जी (4) श्री कुलरत्न जी (5) श्री धर्मनाथ जी जी (6) श्री सोमजिन जी (7) श्री वरूणेन्द्र जी (8) श्री अभिनंदन जी (9) श्री सर्वनाथ जी (10) श्री सुदृष्टि जी (11) श्री शिष्ट जी (12) श्री धन्य जिनेन्द्रजी (13) श्री सोमचन्द्र जी (14) श्री क्षेत्राधीश जी (15) श्री संदतिकनाथजी (16) श्री जयंतदेव जी (17) श्री तमोरिपुर जी (18) श्री निर्मित जी (19) श्री कृतपाश्र्व जी (20) श्री बोधिलाभ जी (21) श्री बहुनंद जी (22) श्री सृदृष्टि जी (23) श्री कुकुभनाथ जी (24) श्री वक्षेश जी।
प्रश्न 23 - पूर्वी पुष्करार्धद्वीप के भरत क्षेत्र के भूतकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री दमनेन्द्र जी (2) श्री मूर्तस्वामी जी (3) श्री विराग स्वामी जी (4) श्री प्रलंब जी (5) श्री पृथ्वीपति जी (6) श्री चारित्रनिधी जी (7) श्री अपराजित जी (8) श्री सुबोधक जी (9) श्री बुद्धिशजी जी (10) श्री बैतालिक जी (11) श्री त्रिमुष्टिनाथ जी (12) श्री मुनिबोध जी (13) श्री तीर्थस्वामी जी (14) श्री धर्मधीश जी (15) श्री धरणेश जी (16) श्री प्रभवदेव जी (17) श्री अनादिदेव जी (18) श्री अनादिप्रभु जी (19) श्री सर्वतीर्थनाथ जी (20) श्री निरूपमदेव जी (21) श्री कौमारिक जी (22) श्री विहार गृह जी (23) श्री धरण्ीपूवर जी (24) श्री विकासदेव जी।
प्रश्न 24 - पूर्वी पुष्करार्ध द्वीप के भरतक्षेत्र के वर्तमान काल के चैबीस तीर्थंकरों के नात बताइये।
उत्तर - (1) श्री जगन्नाथ जी (2) श्री प्रभासनाथ जी (3) श्री स्वरस्वामी जी (4) श्री भरतेश जी (5) श्री दीर्घाननजी जी (6) श्री विख्यात कीर्तिजी (7) श्री अवसानि जी (8) श्री प्रबोध जी (9) श्री तपोनाथ जी (10) श्री पावक जी (11) श्री त्रिपुरेश्वर जी (12) श्री सौगत जी (13) श्री वासव जी (14) श्री मनोहर जी (15) श्रीशुभकर्म जी (16) श्री इष्ट सेवित जी (17) श्री विमलेन्द्र जी (18) श्री धर्मवास जी (19) श्री प्रसाद जी (20) श्री प्रभामृगांक जी (21)श्री उज्झितकलंकजी (22) श्री स्फटिकप्रभा जी (23) श्री गजेन्द्र जी (24) श्री ध्यानजय जी।
प्रश्न 25 - पूर्वी पुष्करार्ध द्वीप के भरत क्षेत्र के भाविकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री बसंतध्व जी (2) श्री त्रिजयंत जी (3) श्री त्रिस्तम्भ जी (4) श्री परब्रह्म जी (5) श्री अबालिश जी (6) श्री प्रवादिक जी (7) श्री भूमानंद जी (8) श्री त्रिनयन जी (9) श्री विद्वान जी (10) श्री परमात्मप्रसंग जी (11) श्री भूमीन्द्र जी (12) श्री गौस्वामी जी (13) श्री कल्याण प्रकाशित जी (14) श्री मंडल जी (15) श्री महाबसू जी (16) श्री उदयभाज जी (17) श्री दिव्य ज्योति जी (18) श्री प्रवोधेश जी (19) श्री अभयांक जी (20) श्री प्रमित जी (21) श्री दिव्यस्कारकजी (22) श्री व्रतस्वामी जी (23) श्री निधान जी (24) श्री त्रिविक्रम जी।
प्रश्न 26 - पूर्वीपुष्करार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भूतकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री कृतिनाथ जी (2) श्री उपविष्ट जी (3) श्री देवादित्य जी (4) श्री आस्थानिक जी (5) श्री प्रचंद्र जी (6) श्री बेषिक जी (7) श्री त्रिभानु जी (8) श्री ब्रह्म जी (9) श्री व्रजांग जी (10) श्री उविरोधी जी (11) श्री अपाप जी (12) श्री लोकोत्तर जी (13) श्री जलधिशेष जी (14) श्री विद्योत जी (15) श्री सुमेरू जी (16) श्री विभावित जी (17) श्री वत्सल जी (18) श्री जिनालय जी (19) श्री तुषार जी (20) श्री भुवनस्वामि जी (21) श्री सुकाम जी (22) श्री देवाधिदेव जी (23) श्री अकारिम जी (24) श्री बिम्बित जी।
प्रश्न 27 - पूर्वी पुष्कार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के वर्तमान काल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री शंकर जी (2) श्री अक्षवास जी (3) श्री नम्नाधिक जी (4) श्री नग्नाधिपतीश जी (5) श्री नष्टपाखंड जी (6) श्री स्वप्नवेद जी (7) श्री तपोधन जी (8) श्री पुष्पकेतु जी (9) श्री धार्मिक जी (10) श्री चन्द्रकेतु जी (11) श्री अनुरक्त जी (12) श्री वीतराग जी (13) श्री उद्योत जी (14) श्री तमोपेक्ष जी (15) श्री मधुनाद जी (16) श्री मरूदेव जी (17) श्री दमनाथ जी (18) श्री वृषभस्वामि जी (19) श्री शिलातन जी (20) श्री विश्वनाथ जी (21) श्री महेन्द्र जी (22) श्री नंद जिनेन्द्र जी (23) श्री तमोहर जी (24) श्री ब्रह्मज जी।
प्रश्न 28 - पूर्वी पुष्कार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भाविकाल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री यशोधर जी (2) श्री सुकृतनाथ जी (3) श्री अभयघोष जी (4) श्री निर्वाण जी (5) श्री व्रतवास जी (6) श्री अतिराज जी (7) श्री अश्वदेव जी (8) श्री अर्जुन जी (9) श्री तपश्चन्द्र जी (10) श्री शरीरिक जी (11) श्री महेश जी (12) श्री सुग्रीव जी (13) श्री दृढ़प्रहार जी (14) श्री अम्बरीक जी (15) श्री दयातीत जी (16) श्री तुम्बर जी (17) श्री सर्वशील जी (18) श्री प्रतिजात जी (19) श्री जितेन्द्रीय जी (20) श्री तपादित्य जी (21) श्री रत्नाकर जी (22) श्री देवेश जी (23) श्री लांछन जी (24) श्री सुप्रदेश जी।
प्रश्न 29 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के भर क्षेत्र के भूत कालिक चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री पद्मचंद्र जी (2) श्री रत्नांग जी (3) श्री अयोगिकेश जी (4) श्री सर्वार्थ जी (5) श्री ऋषिनाथ जी (6) श्री हरिभद्र जी (7) श्री गुणाधिप जी (8) श्री पारत्रिक जी (9) श्री ब्रह्मनाथ जी (10) श्री मुनीन्द्र जी (11) श्री दीपक जी (12) श्री राजर्षि जी (13) श्री विशाख जी (14) श्री आनंदति जी (15) श्री रविस्वामी जी (16) श्री सोमदत्त जी (17) श्री जयस्वामी जी (18) श्री मोक्षनाथ जी (19) श्री अग्रभास जी (20) श्री धनुसंग जी (21) श्री रोमांचक जी (22) श्री मुक्ति नाथ जी (23) श्री प्रसिद्धनाथ जी (24) श्री जितेश जी।
प्रश्न 30 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के भरत क्षेत्र के वर्तमान काल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री सर्वांग स्वामी (2) श्री पद्माकर जी (3) श्री प्रभाकर जी (4) श्री बलनाथ जी (5) श्री योगीश्वर जी (6) श्री सूक्ष्मांगजी जी (7) श्री व्रत चलातीत जी (8) श्री कलम्बक जी (9) श्री परित्याग जी (10) श्री निषेधक जी (11) श्री पापापहारि जी (12) श्री सुस्वामि जी (13) श्री मुक्तिचन्द्र जी (14) श्री अप्रासिक जी (15) श्री जयचंद्र जी (16) श्री मलाधारि जी (17) श्री सुसंयत जी (18) श्री मलयसिन्धु जी (19) श्री अक्षधर जी (20) श्री देवधर जी (21) श्री देवगण जी (22) श्री आगमिक जी (23) श्री विनीत जी (24) श्री रतानंद जी।
प्रश्न 31 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के भरत क्षेत्र के भविष्यत कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री प्रभावक जी (2) श्री विनेन्द्र जी (3) श्री सुभावक जी (4) श्री दिनकर जी (5) श्री अगस्त्येज जी (6) श्री धनदत्त जी (7) श्री पौरव जी (8) श्री जिनदत्त जी (9) श्री पाश्र्वनाथ जी (10) श्री मुनि सिंधु जी (11) श्री आस्तिक जी (12) श्री भवानीक जी (13) श्री नृपनाथ जी (14) श्री नारायण जी (15) श्री प्रशमौक जी (16) श्री भूपति जी (17) श्री सुदृष्टि जी (18) श्री भवभीरू जी (19) श्री नंदन जी (20) श्री भार्गव जी (21) श्री सुबसू जी (22) श्री परावश जी (23) श्री वनवासिक जी (24) श्री भरतेश जी।
प्रश्न 32 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भूतकालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री उपशांत जी (2) श्री फाल्गुण जी (3) श्री पूर्वासजी जी (4) श्री सौधर्म जी (5) श्री गौरिक जी (6) श्री त्रिविकक्रम जी (7) श्री नरसिंह जी (8) श्री मृगबसू जी (9) श्री सोमेश्वर जी (10) श्री सुधासुर जी (11) श्री अपापमल्ल जी (12) श्री विवाध जी (13) श्री संधिक स्वामि जी (14) श्री मांधत्र जी (15) श्री अश्वतेज जी (16) श्री विद्याधर जी (17) श्री सुलोचन जी (18) श्री मौन निधि जी (19) श्री पुंडरीक जी (20) श्री चित्रगण जी (21) श्री मणिरिन्द्र जी (22) श्री सर्वकाल जी (23) श्री भूरिश्रवण जी (24) श्री पुण्यांग जी।
प्रश्न 33 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के वर्तमान काल के चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री गांगेयक जी (2) श्री नल्लवासव जी (3) श्री भमजिनेन्द्र जी (4) श्री दयाधिक जी (5) श्री सुभद्र जी (6) श्री स्वामिजी जी (7) श्री हनिक जी (8) श्री नंदिघोष जी (9) श्री रूपबीज जी (10) श्री वज्रनाभ जी (11) श्री संतोष जी (12) श्री सुधर्म जी (13) श्री फणीश्वर जी (14) श्री वीरचन्द्र जी (15) श्री मेधानिक जी (16) श्री स्वच्छनाथ जी (17) श्री कोपक्षय जी (18) श्री अकाम जी (19) श्री धर्मधाम जी (20) श्री सूक्तिसेन जी (21) श्री क्षेमंकर जी (22) श्री दयानाथ जी (23) श्री कीर्तिप जी (24) श्री शुभंकर जी।
प्रश्न 34 - पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के भविष्यत कालीन चैबीस तीर्थंकरों के नाम बताइये।
उत्तर - (1) श्री अदोषिक जी (2) श्री वृषभ जी (3) श्री विनयानंद जी (4) श्री मुनिभारत जी (5) श्री इंद्रक जी (6) श्री चन्द्रकेतु जी (7) श्री ध्वजादित्य जी (8) श्री वासुबोध जी (9) श्री मुक्तिगत जी (10) श्री धर्मबोध जी (11) श्री देवांग जी (12) श्री मारीचिक जी (13) श्री सुजीव जी (14) श्री यशोधर जी (15) श्री गौतम जी (16) श्री मुनिशुद्धि जी (17) श्री प्रवोधिक जी (18) श्री सदानीक जी (19) श्री चारित्रनाथ जी (20) श्री शतानंद जी (21) श्री वेदार्थ जी (22) श्री सुधानीक जी (23) श्री ज्योर्ति मुख जी (24) श्री सुरार्ध जी।
प्रश्न 35 - जम्बूद्वीप में कितनी चैबीस होती है?
उत्तर - जम्बूद्वीप में छः चैबीसी होती हैं।
प्रश्न 36 - जम्बूद्वीप में छःचैबीस किस प्रकार होती है?
उत्तर - भूत, वर्तमान, भाविकाल की भरत क्षेत्र की तीन चैबीसी तथा ऐरावत क्षेत्र की तीनों कालों की तीन चैबीसी। इस प्रकार छः चैबीसी होती है।
प्रश्न 37 - धातकी खंड में कितनी चैबीसी होती है?
उत्तर - धातकी खंडमें 12 चैबीसी होती हैं।
प्रश्न 38 - धातकी खंडमें 12 चैबीसी किसी प्रकार होती हैं?
उत्तर - पूर्वी धातकी खंड के भरतक्षेत्र की तीन तथा ऐरावत क्षेत्र की तीन कुल छः, इसी प्रकार पश्चिमी धातकी खंड के भरतक्षेत्र की तीन तथा ऐरावत क्षेत्र की तीन। कुल मिलाकर 12 चैबीसी हुई।
प्रश्न 39 - पुष्करार्ध द्वीप में कितनी चैबीसी होती है?
उत्तर - पुष्करार्ध द्वीप में भी बारह चैबीसी होती हैं।
प्रश्न 40 - पुष्करार्ध द्वीप में बारह चैबीसी किस प्रकार होती है?
उत्तर - धातकी खंड के समान ही पूर्वी पुष्करार्ध द्वीप में छः तथा पश्चिमी पुष्करार्ध द्वीप में छः चैबीसी होती है।
प्रश्न 41 - मेरूओं के सम्बंध में तीस चैबीसी की गणना बताइये।
उत्तर - एक मेरू से सम्बंधित तीन भरत की तथा तीन ऐरावत की कुछ छः चैबीसी होती हैं। द्वाई द्वीप में मेरू पांच हैं। अतः 5 गुण 6 कुल तीस चैबीसी होती हैं।
Sunday, 1 March 2015
बारह देवलोको में कितने जिनमंदिर एवं जिनप्रतिमाएँ हैं
देवलोक जिनमंदिर जिन प्रतिमा
पहला देवलोक बत्तीस लाख सत्तावन करोड सात लाख
दूसरा देवलोक अट्ठावीस लाख पचास करोड चालीस लाख
तीसरा देवलोक बारह लाख इक्किस करोड साठ लाख
चौथा देवलोक आठ लाख चौदह करोड चालीस लाख
पांचवां देवलोक चार लाख सात करोड बीस लाख
छट्ठा देवलोक पचास हजार निब्बे लाख
सातवां देवलोक चालीस हजार बहत्तर लाख
आठवां देवलोक छह हजार एक लाख साठ हजार
नौवां-दसवां देवलोक चार सौ बहत्तर हजार
ग्यारहवां-बारहवां देवलोक तीन सौ चौपन हजार
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