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Wednesday, 2 April 2014
मनुष्यलोक के द्वीप समुद्र -
इस ४५ लाख योजन प्रमाण मनुष्यलोक के बीचोंबीच में जम्बूद्वीप है जो कि एक लाख योजन व्यास वाला गोलाकार है। इसको चारों तरफ से वेष्टित कर दो लाख योजन विस्तृत चूड़ी सदृश आकार वाला लवणसमुद्र है। इसे वेष्टित कर चार लाख योजन विस्तृत धातकीखण्ड है। इसे घेर कर आठ लाख योजन विस्तार वाला कालोद समुद्र है। इसको वेष्टित कर सोलह लाख योजन विस्तृत पुष्करवर द्वीप है। इस द्वीप के ठीक बीच में चूड़ी के सदृश आकार वाला एक मानुषोत्तर पर्वत है। इस पर्वत तक ही इस मनुष्य लोक की सीमा है इसलिए एक लाख योजन जम्बूद्वीप, दो-दो लाख दोनों तरफ का लवण समुद्र ऐसे चार लाख आदि सभी को जोड़ देने से १±२±२±४±४±८±८±८±८·४५ लाख योजन प्रमाण यह मनुष्यलोक हो जाता है।
ढाई द्वीप दो समुद्र - इस मनुष्य लोक में एक जम्बूद्वीप, द्वितीय धातकीखण्ड तथा तृतीय पुष्करवर द्वीप का आधा पुष्करार्ध द्वीप ये मिलकर ढाई द्वीप हैं। लवण समुद्र और कालोद समुद्र ये दो समुद्र हैं।
जम्बूद्वीप - एक लाख योजन विस्तृत इस जम्बूद्वीप के ठीक बीच में सुदर्शन मेरु पर्वत है। यह एक लाख चालीस योजन ऊंचा है, इसकी नींव एक हजार योजन है और चूलिका ४० योजन है। इसकी चौड़ाई पृथ्वी पर १० हजार योजन है, घटते हुए अग्रभाग पर ४ योजन मात्र है। इस जम्बूद्वीप में दक्षिण से लेकर भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक् , हैरण्यवत और ऐरावत ये सात क्षेत्र हैं। हिमवान्, महाहिमवान्, निषध, नील, रुक्मी और शिखरी इन छह पर्वतों से ये सात क्षेत्र विभाजित हैं। इन पर्वतों पर ठीक बीच-बीच में क्रम से पद्म, महापद्म, तिगिञ्छ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक ये छह सरोवर हैं। इन सरोवरों से १४ महानदियाँ निकलती हैं जो कि दो-दो युगल से सात क्षेत्रों में बहती हैं। उनके नाम-गंगा-सिन्धु, रोहित-रोहितास्या, हरित-हरिकान्ता, सीता-सीतोदा, नारी-नरकान्ता, सुवर्णवूâला-रूप्यवूâला और रक्ता-रक्तोदा हैं।
भरतक्षेत्र के छ: खण्ड -
भरतक्षेत्र में ठीक बीच में पूर्व-पश्चिम लंबा, ५० योजन चौड़ा और २५ योजन ऊंचा, तीन कटनी वाला विजयार्ध पर्वत है। हिमवान् पर्वत से गंगा-सिन्धु नदी निकलकर नीचे गिरकर इस विजयार्ध की गुफा से बाहर निकलकर क्षेत्र में बहती हुई पूर्व-पश्चिम की तरफ लवण समुद्र में प्रवेश कर जाती है। इससे भरतक्षेत्र के छ: खण्ड हो जाते हैं। इसमें से दक्षिण की तरफ के बीच का आर्यखण्ड है और शेष पांच म्लेच्छ खण्ड हैं। ऐसे ही ऐरावत क्षेत्र के भी छ: खण्ड हैं। इन भरत और ऐरावत के आर्यखण्ड में ही षट्काल परिवर्तन होता है। विदेहक्षेत्र-विदेह के ठीक बीच में सुदर्शन मेरु होने से उसके पूर्वविदेह-पश्चिम विदेह ऐसे दो भाग हो जाते हैं। सुदर्शन मेरु के दक्षिण में देवकुरु और उत्तर में उत्तरकुरु है वहां उत्तम भोगभूमि है। सुदर्शन मेरु की चारों विदिशाओं में एक-एक गजदंत हैं जो कि निषध, नील पर्वत को स्पर्श कर रहे हैं। पूर्व-पश्चिम विदेह में सोलह वक्षार और बारह विभंगा नदियों के निमित्त से ३२ देश हो जाते हैं। इन बत्तीसों विदेहों में भी मध्य में विजयार्ध और गंगा-सिन्धु नदियों के निमित्त से छ:-छ: खण्ड हो गये हैं। वहां के आर्यखण्ड में सदा ही चतुर्थकाल के प्रारम्भ जैसी कर्मभूमि रहती है इसीलिए ये बत्तीस शाश्वत कर्मभूमि हैं। वहां पर सदा ही तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण, बलभद्र होते ही रहते हैं। सदा ही केवलियों का और मुनियों का विहार चालू रहता है।
अन्य क्षेत्रों की व्यवस्था -
हैमवत और हैरण्यवत में जघन्य भोगभूमि है। वहां के मनुष्य युगल ही उत्पन्न होते हैं और साथ ही मरते हैं। इनकी एक पल्य की उत्कृष्ट आयु है और शरीर की ऊँचाई एक कोश है। ये मनुष्य दश प्रकार के कल्पवृक्षों से भोगोपभोग की सामग्री प्राप्त करते हैं। हरि और रम्यक क्षेत्र में मध्यम भोगभूमि है। वहां के मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु दो पल्य और शरीर की ऊँचाई दो कोश है। विदेह में स्थित देवकुरू-उत्तरकुरू में उत्तम भोगभूमि है। वहां के मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु तीन पल्य और शरीर की ऊँचाई तीन कोश है। ये छहों भोगभूमियां सदाकाल एक सी रहने से शाश्वत भोगभूमि कहलाती हैं।
जम्बू-शाल्मली वृक्ष -
उत्तरकुरु में ईशान कोण में पृथ्वीकायिक रत्नमयी जम्बूवृक्ष है और देवकुरु में आग्नेय कोण में शाल्मली वृक्ष है। काल परिवर्तन कहां-कहां-इस प्रकार जम्बूद्वीप में शाश्वत कर्मभूमि ३२, शाश्वत भोगभूमि ६ हैं। वहां षट्काल परिवर्तन नहीं है। भरत, ऐरावत के आर्यखण्डों में षट्काल परिवर्तन होता है। अवसर्पिणी, उत्सर्पिणी के भेद से काल दो प्रकार का है। सुषमा-सुषमा, सुषमा, सुषमादु:षमा, दु:षमा-सुषमा, दु:षमा और अतिदु:षमा, ये अवसर्पिणी के भेद हैं। ऐसे अतिदु:षमा से लेकर सुषमासुषमा तक उत्सर्पिणी के भेद हैं। भरत-ऐरावत के आर्यखण्ड में प्रथमकाल में उत्तम भोगभूमि की व्यवस्था है, द्वितीय काल में मध्यम एवं तृतीय काल में जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था रहती है। चतुर्थकाल में विदेह जैसी कर्मभूमि व्यवस्था हो जाती है। इस काल में तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदि महापुरुष होते हैं, केवलियों के सद्भाव में मोक्षगमन चालू रहता है। पुन: पंचमकाल में तीर्थंकर तथा केवलियों का अभाव होने से धर्म का ह्रास होने लगता है। छठे काल में धर्म, राजा और अग्नि का सर्वथा अभाव हो जाने से मनुष्य पशुवत् जीवन यापन करते हैं और बहुत ही दु:खी, घर, वस्त्र आदि से रहित होते हैं। यह काल परिवर्तन भरत, ऐरावत के सिवाय अन्यत्र नहीं होता है१।
म्लेच्छ खण्ड -
जम्बूद्वीप के विदेह के ५-५ म्लेच्छखंड ऐसे (३२²५·१६०) एक सौ साठ म्लेच्छखंड हैं तथा भरत और ऐरावत के ५-५ म्लेच्छ खण्ड मिलकर १७० म्लेच्छ खण्डों में सदा चतुर्थकाल के आदि जैसी एवं भरत-ऐरावत के म्लेच्छ खण्डों में चतुर्थकाल के आदि से लेकर अंत जैसी व्यवस्था रहती है।
विद्याधर श्रेणियां -
भरत-ऐरावत के विजयार्ध में दक्षिण श्रेणी में ५० और उत्तर श्रेणी में ६० ऐसी ११० नगरियां हैं जहां पर मनुष्यों का निवास है। ये मनुष्य कर्मभूमिज हैं। जाति, कुल और मन्त्रों से विद्याओं को प्राप्त कर विद्याधर कहलाते हैं। यहां पर तथा भरत-ऐरावत के ५-५ म्लेच्छखण्डों में चतुर्थकाल के आदि से अन्त तक परिवर्तन होता रहता है पुन: उत्सर्पिणी में चतुर्थकाल के अन्त से आदि तक व्यवस्था रहती है। ऐसे ही ३२ विदेहों के ३२ विजयार्धों पर दोनों श्रेणियों में ५५-५५ ऐसी ११०-११० नगरियों में विद्याधर मनुष्य रहते हैं। वहां पर सदा चतुर्थकाल के आदि जैसी ही व्यवस्था रहती है।
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वृषभाचल - पांच म्लेच्छ खण्डों के मध्य के म्लेच्छ खण्ड में एक वृषभाचल पर्वत है। चक्रवर्ती षट्खण्ड विजय करके इस पर अपनी प्रशस्ति लिखता है। ऐसे ३४ आर्यखण्ड के सदृश ३४ वृषभाचल हैं।
नाभिगिरि - हैमवत्, हरि, रम्यव्â और हैरण्यवत इन चारों क्षेत्रों में ठीक बीच में एक-एक नाभिगिरि पर्वत होने से ४ नाभिगिरि हैं।
अकृत्रिम चैत्यालय - सुदर्शन मेरु के १६±गजदंत के ४±जम्बू शाल्मलि वृक्ष के २±वक्षार के १६±विजयार्ध के ३४±और कुलाचलों के ६ ऐसे·७८ अकृत्रिम जिनमंदिर हैं।
धातकीखंड -
यह द्वितीय द्वीप चार लाख योजन विस्तृत है। इसके दक्षिण-उत्तर में चार लाख योजन चौड़े दो इष्वाकार पर्वत हैं। इनके निमित्त से धातकीखण्ड के पूर्व धातकीखण्ड और पश्चिम धातकीखण्ड ऐसे दो भाग हो गए हैं। दोनों भाग में विजय, अचल नाम के सुमेरु पर्वत, भरत, हैमवत् आदि सात क्षेत्र, हिमवान् आदि कुलाचल और गंगा आदि महानदियां हैं अत: धातकीखंड में प्रत्येक रचना जम्बूद्वीप से दूनी है। अन्तर इतना ही है कि वहां पर क्षेत्र आरे के समान आकार वाले हैं तथा दो इष्वाकार पर्वत के दो जिनमंदिर अधिक हैं। यहां पर जम्बूवृक्ष के स्थान पर धातकी वृक्ष हैं।
पुष्करार्ध द्वीप -
पुष्करार्ध द्वीप में भी दक्षिण और उत्तर में आठ लाख योजन लम्बे दो इष्वाकार पर्वत हैं। बाकी शेष रचना धातकीखण्डवत् है। यहां पर मेरु के मंदर मेरु और विद्युन्माली मेरु नाम हैं तथा यहां के क्षेत्र भी आरे के समान हैं। यहां जम्बूवृक्ष के स्थान पर पुष्कर वृक्ष है। जम्बूद्वीप के क्षेत्र पर्वतों की जितनी लम्बाई चौड़ाई है उनकी अपेक्षा धातकीखण्ड के क्षेत्रादि की अधिक है तथा पुष्करार्ध के क्षेत्रादि की उनसे भी अधिक है। जैसे जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र का विष्कम्भ ५२६,६/१९ योजन है। धातकीखण्ड के भरतक्षेत्र का बाह्य विष्कम्भ १८५४७, १५५/२१२ योजन है। पुष्करार्ध के भरतक्षेत्र का बाह्य विष्कम्भ ६५४४६, १३/२१२ योजन है।
कुभोगभूमि -
लवण समुद्र के अभ्यन्तर तट की दिशाओं में ५०० योजन जाकर १००-१०० योजन विस्तृत चार द्वीप हैं तथा चारों विदिशा में ५०० योजन जाकर ५५ योजन विस्तृत चार द्वीप हैं। इन दिशा-विदिशा के अंतराल में ५५० योजन जाकर ५०-५० योजन विस्तृत आठ द्वीप हैं तथा हिमवान पर्वत, भरत संबंधी विजयार्ध, शिखरी पर्वत और ऐरावत संबंधी विजयार्ध इन चारों पर्वतों के दोनों-दोनों तटों के निकट समुद्र में ६०० योजन जाकर २५-२५ योजन विस्तृत आठ द्वीप हैं। इस प्रकार ४±४±८±८·२४ कुमानुषद्वीप हैं। लवण समुद्र के बाह्य तट पर भी ऐसे ही २४ द्वीप हैं। इसी तरह कालोद समुद्र के अभ्यंतर और बाह्य दोनों तट सम्बन्धी २४-२४ द्वीप हैं। कुल मिलाकर २४±२४±२४±२४·९६ कुमानुष द्वीप हैं। ये सभी द्वीप जल से एक योजन ऊपर हैं। दिशागत द्वीप में जन्म लेने वाले मनुष्य क्रम से एक जंघा वाले, पूंछ वाले, सींग वाले और गूंगे होते हैं। विदिशागत द्वीपों में क्रम से शष्कुलि सदृश कर्ण वाले, कर्ण प्रावरण-जिन्हें ओढ़ लें ऐसे कान वाले, लम्बे कान वाले और खरगोश सदृश कान वाले मनुष्य हैं। आठ अन्तर दिशाओं में क्रम से सिंहमुख, अश्वमुख, भैंसामुख, सूकरमुख, व्याघ्रमुख, घुग्घूमुख और बन्दरमुख वाले मनुष्य हैं तथा पर्वतों के तट संबंधी पश्चिम दिशा में क्रम से कालमुख, गोमुख, विद्युतमुख और हाथीमुख वाले मनुष्य रहते हैं। दिशागत द्वीपों के मनुष्य गुफाओं में निवास करते हैं और वहां की अत्यन्त मीठी मिट्टी का भोजन करते हैं। विदिशागत आदि शेष द्वीपों के मनुष्य वृक्षों के नीचे निवास करते हैं और कल्पवृक्षों से प्रदत्त फलों का भोजन करते हैं। यहां पर युगलिया स्त्री-पुरुष जन्म लेते हैं और एक पल्य की आयु को भोगकर युगल ही मरण करते हैं। यहाँ की सारी व्यवस्था जघन्य भोगभूमि के सदृश है। इन मनुष्यों के जो कान और मुख के आकार पशु आदि के सदृश बताये हैं, उनसे अतिरिक्त शेष सभी शरीर का आकार मनुष्य सदृश ही है इसीलिए ये कुमानुष कहलाते हैं। यहां कर्मभूमि में कोई भी जीव कुत्सित पुण्य संचित करके कुमानुष योनि में जन्म ले लेते हैं१। इस प्रकार ढाई द्वीप और दो समुद्र में भोगभूमि, कुभोगभूमि, आर्यखण्ड, म्लेच्छखण्ड तथा विद्याधर श्रेणी की अपेक्षा मनुष्यों के निवास स्थान पांच प्रकार के हो गए हैं। जम्बूद्वीप में जितनी रचना है संख्या में उसकी अपेक्षा दूनी रचना धातकीखण्ड में तथा वैसी ही पुष्करार्ध में है। जैसे कि जम्बूद्वीप में भोगभूमि ६ है, तो धातकीखण्ड में १२ इत्यादि। सबका स्पष्टीकरण शाश्वत भोगभूमि ६²५·३० (हैमवत, हरि, देवकुरु, उत्तरकुरु, रम्यक, हैरण्यवत) शाश्वत कर्मभूमि ३२²५·१६० (विदेह सम्बन्धी) अशाश्वत भोगभूमि १० (५ भरत ५ ऐरावत के आर्यखण्ड में षट्काल परिवर्तन के ३-३ काल में) अशाश्वत भोगभूमि १० (५ भरत, ५ ऐरावत के आर्यखण्ड में षट्काल परिवर्तन के ३-३ काल में) अशाश्वत कर्मभूमि १० (५ भरत ५ ऐरावत के आर्यखण्ड के छह काल परिवर्तन के ३-३ काल में) आर्यखण्ड १७० (विदेह १६०±भरत ५±ऐरावत ५·१७०) म्लेच्छखण्ड ८५० (यहां के मनुष्य क्षेत्र से म्लेच्छ हैं, जाति और क्रिया से नहीं) विद्याधर श्रेणी २४० (यहां के मनुष्य आकाशगामी आदि विद्या से सहित होते हैं।) कुभोगभूमि ९६ (लवण समुद्र की ४८±कालोद समुद्र की ४८·९६)
ढाई द्वीप के मुख्य-मुख्य पर्वत-
१. सुमेरु पर्वत ५ २. जम्बू शाल्मली आदि वृक्ष १० ३. गजदंत २० ४. कुलाचल (हिमवान आदि) ३० ५. वक्षार ८० ६. विजयार्ध १७० ७. वृषभाचल १७० ८. इष्वाकार ४ ९. नाभिगिरि २०
अकृत्रिम चैत्यालय ३९८ हैं (ढाई द्वीप संबंधी)-
१. पांच सुमेरु के ८० २. जम्बू आदि दशवृक्ष के १० ३. बीस गजदंत के २० ४. तीस कुलाचल के ३० ५. अस्सी वक्षार के ८० ६. एक सौ सत्तर विजयार्ध के १७० ७. चार इष्वाकार के ४ ८. मानुषोत्तर पर्वत की चार दिशा के ४
कुल ८०±१०±२०±३०±८०±१७०±४±४·३९८, इन्हीं में नंदीश्वर द्वीप के ५२, कुण्डलगिरि के ४ और रुचकगिरि के ४ चैत्यालय मिला देने से मध्यलोक के सर्व जिनचैत्यालय ४५८ हो जाते हैं। इनको मेरा सिर झुकाकर नमस्कार होवे।
देवों के भेद
देवों के चार भेद हैं-भवनवासी, व्यंतरवासी, ज्योतिर्वासी और कल्पवासी।
भवनवासी देव
भवनवासी देवों के स्थान
रत्नप्रभा पृथ्वी के ३ भाग बताये जा चुके हैं। उसमें से खर भाग में राक्षस जाति के व्यंतर देवों को छोड़कर सात प्रकार के व्यंतर देवों के निवास स्थान हैं और भवनवासी के असुरकुमार जाति के देवों को छोड़कर नव प्रकार के भवनवासी देवों के स्थान हैं। रत्नप्रभा के पंकभाग नाम के द्वितीय भाग में असुरकुमार जाति के भवनवासी एवं राक्षस जाति के व्यंतरों के आवास स्थान हैं।
भवनवासी देवों के भेद
असुरकुमार, नागकुमार, सुपर्णकुमार, द्वीपकुमार, दिक्कुमार, उदधिकुमार, स्तनितकुमार, विद्युत्कुमार, अग्निकुमार और वायुकुमार।
भवनवासी देवों के भवनों का प्रमाण
असुरकुमार के ६४ लाख, नागकुमार के ८४ लाख, सुपर्णकुमार के ७२ लाख, वायुकुमार के ९६ लाख और शेष देवों के ७६-७६ लाख भवन हैं अत: ७६²६·४५६-६४±८४±७२±९६±४५६·७७२००००० (सात करोड़ बहत्तर लाख) भवन हैं।
जिनमंदिर
इन एक-एक भवनों में एक-एक जिनमंदिर होने से भवनवासी देवों के ७,७२,००००० प्रमाण जिनमंदिर हैं। उनमें स्थित जिनप्रतिमाओं को मन, वचन, काय से नमस्कार होवे।
भवनवासी देवो के इन्द्र
भवनवासी देवों के १० कुलों में पृथक्-पृथक् दो-दो इन्द्र होते हैं। सब मिलकर २० इन्द्र होते हैं, जो अपनी विभूति से शोभायमान हैं।
इन्द्र के परिवार देव
प्रत्येक इन्द्र के परिवार देव दस प्रकार हैं। प्रतीन्द्र, त्रायस्त्रिंश, सामानिक, लोकपाल, आत्मरक्ष, तीन पारिषद, सात अनीक, प्रकीर्णक, आभियोग्य और किल्विषक। इनमें से इन्द्र राजा के सदृश, प्रतीन्द्र युवराज के सदृश, त्रायस्त्रिंश देवपुत्र के सदृश, सामानिक देवपत्नी के तुल्य, चारों लोकपाल तंत्रपालों के सदृश और सभी तनुरक्षक देव राजा के अंगरक्षक के समान हैं। राजा की बाह्य, मध्य और अभ्यन्तर समिति के समान देवों में भी तीन प्रकार की परिषद होती हैं। इन तीनों परिषदों में बैठने वाले देव क्रमश: बाह्य पारिषद, मध्यमपारिषद और आभ्यन्तरपारिषद कहलाते हैं। अनीक देव सेना के तुल्य, प्रकीर्णक देव प्रजा के सदृश, आभियोग्य जाति के देव दास के सदृश और किल्विषक देव चाण्डाल के समान होते हैं। इनमें से प्रतीन्द्र इन्द्र के बराबर २० होते हैं। इसलिए भवनवासियों के २० इन्द्र और २० प्रतीन्द्र मिलकर ४० इन्द्र हो जाते हैं।
भवनवासियों के निवास स्थान के भेद
इन देवों के निवास स्थान के भवन, भवनपुर और आवास के भेद से तीन भेद होते हैं। रत्नप्रभा पृथ्वी में स्थित निवास स्थानों को भवन, द्वीप समुद्रों के ऊपर स्थित निवास स्थानों को भवनपुर और रमणीय तालाब, पर्वत तथा वृक्षादि के ऊपर स्थित निवास स्थानों को आवास कहते हैं। इनमें नागकुमार आदि देवों में से किन्हीं के तो भवन, भवनपुर और आवासरूप तीनों ही तरह के निवास स्थान होते हैंं परन्तु असुरकुमारों के केवल एक भवनरूप ही निवास स्थान हैं। इनमें भवनवासियों के भवन चित्रा पृथ्वी के नीचे दो हजार से एक लाख योजनपर्यन्त जाकर हैं। ये सब भवन समचतुष्कोण, तीन सौ योजन ऊँचे हैं और विस्तार में संख्यात एवं असंख्यात योजन प्रमाण वाले हैं।
जिनमंदिर
प्रत्येक भवन के मध्य में एक सौ योजन ऊँचे एक-एक वूâट हैं, इन वूâटों के ऊपर पद्मराग मणिमय कलशों से सुशोभित चार गोपुर, तीन मणिमय प्राकार, वनध्वजाओं एवं मालाओं से संयुक्त जिनगृह शोभित हैं। प्रत्येक जिनगृह में १०८-१०८ जिनप्रतिमाएं विराजमान हैं। जो देव सम्यग्दर्शन से युक्त हैं, वे कर्र्मक्षय के निमित्त नित्य ही जिन भगवान की भक्ति से पूजा करते हैं, इसके अतिरिक्त सम्यग्दृष्टि देवों से सम्बोधित किए गए अन्य मिथ्यादृष्टि देव भी कुलदेवता मानकर उन जिनेन्द्र प्रतिमाओं की नित्य ही बहुत प्रकार से पूजा करते हैं। देवप्रासाद-जिनमंदिर के चारों तरफ अनेक रचनाओं से युक्त सुवर्ण और रत्नों से निर्मित भवनवासी देवों के महल हैं। इन देवों की आयु आदि का वर्णन आगे यंत्र से समझ लेना चाहिए।
व्यन्तर देव
व्यंतर देव
रत्नप्रभा पृथ्वी के खरभाग में व्यंतर देवों के सात भेद रहते हैं-किन्नर, विंâपुरुष, महोरग, गंधर्व, यक्ष, भूत और पिशाच। पंक भाग में राक्षस जाति के व्यंतरों के भवन हैं। सभी व्यन्तरवासियों के असंख्यात भवन हैं। उनमें तीन भेद हैं-भवन, भवनपुर और आवास। खर भाग, पंक भाग में भवन हैं। असंख्यातों द्वीप समुद्रों के ऊपर भवनपुर हैं और सरोवर, पर्वत, नदी, आदिकों के ऊपर आवास होते हैं। मेरु प्रमाण ऊँचे मध्यलोक, ऊध्र्वलोक में व्यन्तर देवों के निवास हैं। इन व्यन्तरों में से किन्हीं के भवन हैं, किन्हीं के भवन और भवनपुर दोनो हैं एवं किन्हीं के तीनों ही स्थान होते हैं। ये सभी आवास प्राकार (परकोटे) से वेष्टित हैं।
जिनमंदिर
इस प्रकार व्यन्तरवासी देवों के स्थान असंख्यात होने से उनमें स्थित जिनमंदिर भी असंख्यात प्रमाण हैं। क्योंकि जितने भवन, भवनपुर और आवास हैं, उतने ही जिनमंदिर हैं।
इनके कार्य
ये व्यन्तर देव क्रीड़ाप्रिय होने से इस मध्यलोक में यंत्र-तंत्र शून्य स्थान, वृक्षों की कोटर, श्मशान भूमि आदि में भी विचरण करते रहते हैं। कदाचित्, क्वचित् किसी के साथ पूर्व जन्म का बैर होने से उसे कष्ट भी दिया करते हैं। किसी पर प्रसन्न होकर उसकी सहायता भी करते हैंं। जब सम्यग्दर्शन ग्रहण कर लेते हैं, तब पापभीरू बनकर धर्मकार्यों में ही रुचि लेते हैं।
व्यंतर इन्द्र
किन्नर, विंपुरुष आदि आठ प्रकार के व्यंतर देवों में प्रत्येक के दो-दो इन्द्र होते हैं। किन्नर जाति के दो इन्द्र-विंâपुरुष, किन्नर। विंâपुरुष जाति में-सत्पुरुष, महापुरुष। महोरग जाति में-महाकाय, अतिकाय। गंधर्व जाति में-गीतरति, गीतरस। यक्ष जाति में-मणिभद्र, पूर्णभद्र। राक्षस जाति में-भीम, महाभीम। भूत जाति में-स्वरूप, प्रतिरूप। पिशाच जाति में-काल, महाकाल। ऐसे व्यन्तर देवों में १६ इन्द्र होते हैं।
परिवार देव
इन १६ इन्द्रों में से प्रत्येक के प्रतीन्द्र, सामानिक, आत्मरक्ष, तीनों पारिषद, सात अनीक, प्रकीर्णक, किल्विषक और आभियोग इस प्रकार से परिवार देव होते हैं अर्थात् भवनवासी के जो इन्द्र, सामानिक आदि दस भेद बतलाये हैं, उनमें से इन व्यन्तरों में त्रायिंस्त्रश और लोकपाल ये दो भेद नहीं होते हैं अत: यहाँ आठ भेद कहे गये हैं। प्रत्येक इन्द्र के एक-एक प्रतीन्द्र होने से १६ इन्द्रों के १६ प्रतीन्द्र ऐसे व्यन्तरों के ३२ इन्द्र कहलाते हैं। इस प्रकार परिवार देवों से सहित, सुखों का अनुभव करने वाले व्यन्तर देवेन्द्र अपने-अपने पुरों में बहुत प्रकार की क्रीड़ाओं को करते हुए मग्न रहते हैं। व्यन्तर देवों का आहार-किन्नर आदि एवं उनकी देवियाँ दिव्य अमृतमय मानसिक आहार ग्रहण करते हैं। देवों को कवलाहार नहीं होता है। पल्य प्रमाण आयु वाले देवों का आहार ५ दिन में एवं दस हजार की आयु वालों का दो दिन बाद होता है।
देवों का उच्छ्वास
पल्य प्रमाण आयु वाले ५ मुहूर्त में एवं दस हजार वर्ष की आयु वाले, सात उच्छ्वास काल में उच्छ्वास लेते हैं। व्यन्तर देवों में जन्म लेने के कारण-जो कुमार्ग में स्थित हैं, दूषित आचरण वाले हैं, अकाम निर्जरा करने वाले हैं, अग्नि आदि द्वारा मरण को प्राप्त करते हैं, सम्यक्त्व से रहित, चारित्र के विघातक, पञ्चाग्नि तप करने वाले, मन्द कषायी हैं, ऐसे जीव मरकर व्यन्तर पर्याय में जन्म ले लेते हैं। ये देव कदाचित् वहाँ सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लेते हैं। सम्यक्त्व रहित देव कोई-कोई विशेष आर्तध्यान आदि से मरकर एकेन्द्रिय पर्याय में भी जन्म ले लेते हैं। व्यंतर देवों का अवधिज्ञान, शक्ति और विक्रिया-जघन्य आयु १०००० वर्ष प्रमाण वाले देवों का अवधिज्ञान का विषय ५ कोस है एवं उत्कृष्ट अवधि का विषय ५० कोस है। पल्योपम प्रमाण आयु वाले व्यन्तर देवों की अवधि का विषय नीचे व ऊपर एक लाख योजन प्रमाण है। जघन्य आयुधारक प्रत्येक व्यन्तर देव १०० मनुष्यों को मारने व तारने के लिए समर्थ हैंं तथा १५० धनुष तक विस्तृत क्षेत्र को अपनी शक्ति से उखाड़ कर अन्यत्र पेंâकने में समर्थ हैं। पल्य प्रमाण आयु वाले व्यन्तर देव छह खण्डों को उलट सकते हैं। जघन्य आयु वाले व्यन्तर देव उत्कृष्ट रूप से १०० रूपों की एवं जघन्य रूप से ७ रूपों की विक्रिया कर सकते हैं। बाकी देव अपने-अपने अवधिज्ञान के क्षेत्र को विक्रिया से पूर्ण कर सकते हैं। इन देवों की अवगाहना १० धनुष है। ये देव उपपाद शय्या पर जन्म लेकर अन्तर्मुहूर्त में १६ वर्ष के युवक के समान शरीर और पर्याप्तियों को पूर्ण कर लेते हैं।
ज्योतिर्वासी देव
ज्योतिष्क देवों के पाँच भेद हैं
सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र और तारा। इनके विमान चमकीले होने से इन्हें ज्योतिष्क देव कहते हैं, ये सभी विमान अर्धगोलक सदृश हैं। ये सभी देव मेरुपर्वत को ११२१ योजन (४४,८४००० मी.) छोड़कर नित्य ही प्रदक्षिणा के क्रम से भ्रमण करते हैं। इनमें चन्द्र, सूर्य और ग्रह ५१० ४८/८१ योजन प्रमाण गमन क्षेत्र में स्थित परिधियों के क्रम से पृथक्-पृथक् गमन करते हैं परन्तु नक्षत्र और तारे अपनी-अपनी परिधिरूप मार्ग में ही गमन करते हैं।
ज्योतिष्क देवों की ऊँचाई
पाँच प्रकार के देवों के विमान इस चित्रा पृथ्वी से ७९० योजन से प्रारंभ होकर ९०० योजन की ऊँचाई तक अर्थात् ११० योजन में स्थित हैं। सबसे प्रथम ताराओं के विमान हैं, जो सबसे छोटे १/४ कोस (२५० मी.) प्रमाण हैं। इन सभी विमानों की मोटाई अपने-अपने विमानों से आधी-आधी है। राहु के विमान चन्द्र के नीचे एवं केतु के विमान सूर्य के नीचे रहते हैं अर्थात् ४ प्रमाणांगुल (२००० उत्सेधांगुल) प्रमाण ऊपर चन्द्र-सूर्य के विमान स्थित होकर गमन करते हैं। ये राहु-केतु के विमान ६-६ महीने में पूर्णिमा एवं अमावस्या को क्रम से चन्द्र एवं सूर्य के विमानों को ढँक देते हैं, इसे ही ग्रहण कहते हैं। इस पृथ्वी से तारा आदि विमानों की ऊँचाई एवं उनका प्रमाण यंत्र में देखिए। (नोट-परिशिष्ट में चार्ट नम्बर १२ देखिए)।
वाहन जाति के देव
इन सूर्य, चन्द्र के प्रत्येक विमानों को आभियोग्य जाति के ४००० देव विमान के पूर्व में सिंह के आकार को धारण कर, दक्षिण में ४००० देव हाथी के आकार को, पश्चिम में ४००० देव बैल के आकार को एवं उत्तर में ४००० देव घोड़े के आकार को धारण कर ऐसे १६००० देव सतत खींचते रहते हैं, इसी प्रकार ग्रहों के ८०००, नक्षत्रों के ४००० एवं ताराओं के २००० वाहनजाति के देव होते हैं।
ज्योतिष्क देवों की गति
गमन में चन्द्रमा सबसे मंद है। सूर्य उसकी अपेक्षा तीव्रगामी, उससे शीघ्रतर ग्रह, इनसे शीघ्रतर नक्षत्र एवं नक्षत्रों से भी शीघ्रतर गति वाले तारागण हैं।
सूर्यादि की किरणें
ये विमान पृथ्वीकायिक (चमकीली धातु) से बने हुए अकृत्रिम हैं। सूर्य के बिम्ब में स्थित पृथ्वीकायिक जीव के आतप नामकर्म का उदय होने से उसकी किरणें उष्ण हैं। चन्द्र के बिम्ब में स्थित पृथ्वीकायिक के उद्योत नामकर्म का उदय होने से उनके मूल में शीतलता है और किरणें भी शीतल हैं, ऐसे ही तारा आदि के समझना।
विमान और जिनमंदिरों का प्रमाण
सभी ज्योतिर्वासी देवों के विमानों के बीचों-बीच में एक-एक जिनमंदिर है और चारों ओर देवों के निवास स्थान बने हुए हैं। ये विमान एक राजु प्रमाण चौड़े इस मध्यलोक तक हैं अत: असंख्यात हैं, इसी निमित्त से जिनमंदिर भी असंख्यात ही हो जाते हैं। उनमें स्थित १०८-१०८ प्रतिमाओं को मेरा नमस्कार होवे। सूर्य का गमन क्षेत्र-सूर्य का गमन क्षेत्र जम्बूद्वीप के भीतर १०८ योजन एवं लवण समुद्र में ३३० ४८/८१ योजन है अर्थात् समस्त गमन क्षेत्र ५१० ४८/८१ योजन (२०४३१४७ १३/६१) मील है। इतने प्रमाण में १८४ गलियाँ हैं। इन गलियों में दो सूर्य क्रमश: एक-एक गली में संचार करते हैं।
दक्षिणायन
उत्तरायण-जब सूर्य प्रथम गली में रहता है, तब श्रावण कृष्णा प्रतिपदा के दिन दक्षिणायन प्रारंभ होता है और जब वह अंतिम गली में पहुँचता है, तब उत्तरायण प्रारंभ होता है। एक मिनट में सूर्य का गमन-एक मिनट में सूर्य का गमन ४४७६२३ ११/१८ मील प्रमाण है। चक्रवर्ती द्वारा सूर्य के जिनबिम्ब का दर्शन-जब सूर्य पहली गली में आता है, तब अयोध्या नगरी के भीतर अपने भवन के ऊपर स्थित चक्रवर्ती सूर्य विमान में स्थित जिनबिम्ब का दर्शन कर लेते हैं। चक्रवर्ती की दृष्टि का विषय ४७२६३ ७/२० योजन (१८९०५३४००० मील) प्रमाण है। चन्द्र का गमन क्षेत्र-सूर्य के इसी गमन क्षेत्र में चन्द्र की १५ गलियाँ हैं। इनमें वह प्रतिदिन एक-एक गली में गमन करता है। एक मिनट में चन्द्र का गमन-एक मिनट में चन्द्रमा ४२२७९६ ३१/१६४७ मील तक गमन करता है।
कृष्णपक्ष-शुक्लपक्ष
जब चन्द्रबिम्ब पूर्ण दिखता है, तब पूर्णिमा होती है। राहु विमान चन्द्रविमान के नीचे गमन करता है। राहु प्रतिदिन एक-एक मार्ग में चन्द्रबिम्ब की एक-एक कला को ढँकते हुए १५ दिन तक १५ कलाओं को ढँक लेता है, तब अंतिम दिन की १६ कला में १ कला शेष रह जाती है, उसी का नाम अमावस्या है। फिर वह राहु प्रतिपदा के दिन में प्रत्येक गली में १-१ कला को छोड़ते हुए पूर्णिमा को १५ कलाओं को छोड़ देते हैं, तब पूर्णिमा हो जाती है। इस प्रकार कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का विभाग हो जाता है। एक चन्द्र का परिवार-इन ज्योतिषी देवों में चन्द्रमा इन्द्र है तथा सूर्य प्रतीन्द्र है अत: एक चन्द्रमा इन्द्र के एक सूर्य प्रतीन्द्र, ८८ ग्रह, २८ नक्षत्र, ६६ हजार ९७५ कोड़ा-कोड़ी तारे ये सब परिवार देव हैं। जम्बूद्वीप में दो चन्द्रमा और दो सूर्य हैं। दिन-रात्रि का विभाग-सूर्य के गमन से ही दिन-रात्रि का विभाग होता है। मानुषोत्तर पर्वत के अन्दर के ही सूर्य आदि ज्योतिषी देव गमन करते हैं। आगे के सभी ज्योतिष विमान स्थिर हैं।
कल्पवासी देव
१६ स्वर्गों के नाम
सौधर्म, ईशान, सनत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लांतव, कापिष्ठ, शुक्र, महाशुक्र, शतार, सहस्रार, आनत, प्राणत, आरण और अच्युत।
बारह कल्प
सौधर्म-ईशान युगल के २ इन्द्र, सनत्कुमार-माहेन्द्र युगल के २ इन्द्र, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर युगल का १ इन्द्र, लांतव-कापिष्ठ युगल का १ इन्द्र, शुक्र-महाशुक्र युगल का १ इन्द्र, शतार-सहस्रार युगल का १ इन्द्र, आनत-प्राणत युगल के २ इन्द्र और आरण-अच्युत युगल के २ इन्द्र ऐसे १२ इन्द्र होते है। इनके स्थानों की ‘कल्प’ संज्ञा होने से १२ कल्प कहलाते हैं।
कल्पातीत
बारह कल्प (१६ स्वर्ग) के ऊपर ९ ग्रैवेयक, ९ अनुदिश और ५ अनुत्तर विमान हैं, इनमें इन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंश आदि भेद न होने से ये कल्पातीत कहलाते हैं। यहाँ के सभी देव अहमिंद्र कहलाते हैं। नौ ग्रैवेयक-अधस्तन ३, मध्यम ३ और उपरिम ३ ऐसे नौ ग्रैवेयक हैं। अनुदिश-अर्चि, अर्चिमालिनी, वैर, वैरोचन ये चार दिशा मेें होने से श्रेणीबद्ध एवं सोम, सोमरूप, अंक और स्फटिक ये चार विदिशा में होने से प्रकीर्णक एवं मध्य में आदित्य नाम का विमान हैं, ऐसे ये ९ अनुदिश संज्ञक हैं।
पाँच अनुत्तर
विजय, वैजयन्त, जयंत और अपराजित ये चार विमान चार दिशा में एवं ‘सर्वार्थसिद्धि’ नाम का विमान मध्य में है। कल्प और कल्पातीतों के स्थान-मेरु तल से लेकर १ १/२ राजु में सौधर्म युगल, उसके उपर १ (१/२) राजु में सानत्कुमार युगल, आगे आधे-आधे राजु में ६ युगल हैं अत: १ १/२±११/२·३,१/२²६·३, ऐसे ६ राजु में ८ युगल हैं। इसके आगे १ राजु में ९ ग्रैवेयक, ९ अनुदिश, ५ अनुत्तर और सिद्धशिला है। विमानों की संख्या-सौधर्म स्वर्ग में ३२०००००, ईशान में २८०००००, सानत्कुमार में १२०००००, माहेन्द्र में ८०००००, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर युगल में ४०००००, लांतव-कापिष्ठ में ५०००००, शुक्र-महाशुक्र में ४००००, शतार-सहस्रार युगल में ६०००, आनत-प्राणत, आरण और अच्युत ऐसे चार कल्पों में ७००, तीन अधोग्रैवेयक में १११, तीन मध्यग्रैवेयक में १०७, तीन ऊध्र्व ग्रैवेयक में ९१, अनुदिश में ९ और पाँच अनुत्तर में ५ ऐसे सब मिलाकर ३२०००००±२८०००००±१२०००००±८०००००±४०००००±५००००±४०००० ±६००००±७००±१०७±९१±९±५·८४९७०२३ विमान हैं और एक-एक विमान में १±१ जिनमंदिर होने से इतने ही मंदिर हो जाते हैं। उनमें स्थित जिन प्रतिमाओं को मेरा मन, वचन, काय से नमस्कार होवे। ===विमानों के भेद===इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक ऐसे ३ भेद हैं। जो मध्य में है, वह इन्द्रक कहलाता है। दिशाओं के विमान श्रेणीबद्ध और अन्तरालसंंबंधी विमान प्रकीर्णक कहलाते हैं।
इन्द्रक की संख्या
इन्द्रक विमान को प्रतर भी कहते हैं। सौधर्म युगल में ३१, सनत्कुमार युगल में ७, ब्रह्मयुगल में ४, लांतव युगल में २, शुक्रयुगल में १, शतारयुगल में १, आनत आदि ४ कल्पों में ६, अधस्तन तीन ग्रैवेयक में ३, मध्यम तीन में ३, उपरिम तीन में ३, नव अनुदिश में १ और पाँच अनुत्तर में १ ऐसे मिलाकर ३१±७±४±२±१±१±६±३±३±३±१±१·६३ इन्द्रक विमान हैं। ऋतु, विमल, चन्द्र आदि इन इन्द्रकों के क्रम से अच्छे-अच्छे नाम हैं। विमानों का प्रमाण-सभी इन्द्र विमान संख्यात योजन विस्तार वाले हैं। सभी श्रेणीबद्ध विमान असंख्यात योजन विस्तार वाले हैं एवं प्रकीर्णक विमानों में कुछ संख्यात योजन वाले और कुछ असंख्यात योजन वाले हैं।
विमानों के वर्ण
सौधर्म युगल के विमान पाँच वर्ण वाले हैं। सानत्कुमार, माहेन्द्र में कृष्ण वर्ण के बिना चार वर्ण हैं। ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लांतव, कापिष्ठ में कृष्ण-नील बिना तीन वर्ण हैं। शुक्र, महाशुक्र, शतार, सहस्रार में कृष्ण, नील, लाल के बिना पीत और शुक्ल दो ही वर्ण हैं। आगे आनत से लेकर अनुत्तरपर्यंत एक शुक्ल वर्ण के ही विमान हैं।
विमानों के आधार
सौधर्म युग्म के विमान जल के आधार हैं। सानत्कुमार युग्म के विमान पवन के आधार हैं। ब्रह्म आदि आठ कल्प स्वर्ग के विमान जल और वायु दोनों के आधार हैं। आगे आनत से लेकर अनुत्तर पर्यन्त विमान आकाश के आधार हैं अर्थात् पुद्गल स्वंâध जल आदि के आकार परिणत हुए हैं, ऐसा समझना।
पृथ्वी आठ ही मानी गई हैं
सात नरक संबंधी एवं एक ‘ईषत्प्राग्भार’ नाम की सिद्ध पृथ्वी अत: ये विमान अधर ही माने गये हैं।
सौधर्म आदि नाम
सौधर्म इन्द्र जहाँ रहते हैं, उसका नाम सौधर्म स्वर्ग है ऐसे ही अन्यत्र जानना। देवों के प्रासाद-इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक विमानों के ऊपर समचतुष्कोण व दीर्घ विविध प्रकार के प्रासाद स्थित हैं। ये सब प्रासाद सुवर्णमय, स्फटिकमय आदि रत्नों से निर्मित, उपपादशय्या, आसन शाला आदि से परिपूर्ण अनादि निधन हैं।
परिवारदेव
सभी इन्द्रोके परिवार देव दस प्रकार के होते हैं-प्रतीन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंशदेव, लोकपाल, आत्मरक्ष, पारिषद, अनीक, प्रकीर्णक, आभियोग और किल्विषक। एक-एक इन्द्र के एक-एक प्रतीन्द्र होने से १२ इन्द्रों के १२ प्रतीन्द्र सहित २४ इन्द्र माने गये हैं। सौधर्म इन्द्र का परिवार-सौधर्म इन्द्र का १ प्रतीन्द्र, ८४००० सामानिक, ३३ त्रायस्त्रिंश, सोम, यम, वरुण तथा धनद ये ४ लोकपाल, ३३६००० आत्मरक्षक, आभ्यन्तर पारिषददेव १२०००, मध्यम पारिषद १४०००, बाह्य पारिषद १६००० हैं। वृषभ, अश्व, रथ, हाथी, पदाति, गन्धर्व और नर्तक इस प्रकार से सौधर्म इन्द्र की सात सेनाएँ होती हैं। इन सात सेनाओं में से प्रत्येक की ७-७ कक्षाएँ होती हैं। सौधर्म इन्द्र के १०६६८००० वृषभ होते हैं और प्रत्येक इतने ही होते हैं अर्थात् ७४६७६००० अनीक होते हैं। एक इन्द्र के प्रकीर्णक, आभियोग्य और किल्विषक देव असंख्यात कहे गये हैं। ऐरावत हाथी-सौधर्म इन्द्र के आभियोग्य देवों का स्वामी और ‘बालक’ नामक देव होता है। यह देव वाहनजाति का है, अपनी विक्रिया से १ लाख उत्सेध योजन प्रमाण ‘ऐरावत’ हाथी का शरीर बना लेता है। इसके दिव्य रत्न मालाओं से युक्त ३२ मुख होते हैं। एक-एक मुख में रत्नों से निर्मित ४-४ दाँत होते हैं। एक-एक दाँत पर एक-एक सरोवर एवं एक-एक सरोवर में एक-एक कमलवन होता है। एक-एक कमल खण्ड में विकसित ३२ महापद्म होते हैं और एक-एक महापद्म एक-एक योजन का होता है। इन एक-एक महाकमलोें पर एक-एक नाट्यशाला होती है। एक-एक नाट्यशाला में ३२-३२ अप्सराएँ नृत्य करती हैं, यह ऐरावत हाथी भगवान के जन्मोत्सव में आता है। सौधर्म इन्द्र की देवियाँ-सौधर्म इन्द्र की ‘शची’ नाम की ज्येष्ठ देवी होती है, ऐसे आठ अग्र देवी हैंं। ये शची आदि अपने रूप को विक्रिया से १६०००-१६००० बना लेती हैं। सौधर्म इन्द्र की अतिशय प्रिय वल्लभिका देवियाँ ३२००० हैं एवं एक-एक अग्रदेवी के १६०००-१६००० परिवार देवियाँ हैं। ये वल्लभिका और परिवार देवियाँ भी १६०००-१६००० प्रमाण विक्रिया कर सकती हैं। अर्थात् सौधर्म इन्द्र के १६००० देवी तथा ८ अग्रदेवी हैं। सौधर्म इन्द्र का राजांगण-इन्द्र की राजांगण भूमि ८४००० योजन प्रमाण है और सुवर्णमय वेदी से वेष्टित है। सुधर्मा-सभा-सौधर्म इन्द्र के भवन में ईशान दिशा में ३००० कोस ऊँची, ४०० कोसी लम्बी, २०० कोस विस्तृत ‘सुधर्मा’ नामक सभा है। इस रमणीय सुधर्मा सभा में बहुत प्रकार के परिवार से युक्त सौधर्म इन्द्र विविध सुखों को भोगता है। ===जिनभवन===उसी दिशा में अनुपम और रत्नमय जिनभवन हैं। शरीर की अवगाहना-सौधर्म युगल के देवों के शरीर की अवगाहना ७ हाथ, सानत्कुमार युगल की ६ हाथ, ब्रह्मयुगल और लांतव युगल में ५ हाथ, शुक्र, महाशुक्र में ४ हाथ, शतार-सहस्रार में ३ १/२ हाथ, आनत से अच्युत तक स्वर्गों में ३ हाथ, तीन अधोग्रैवेयक में २ १/२ हाथ, तीन मध्य ग्रैवेयक में २ हाथ, तीन उपरिम ग्रैवेयक में १ १/२ हाथ, नव अनुदिश एवं पाँच अनुत्तरों में १ हाथ प्रमाण होती है।
उत्कृष्ट आयु
सौधर्म युगल में उत्कृष्ट आयु २ सागर, सानत्कुमार युगल में ७ सागर, ब्रह्मयुगल में १० सागर, लांतव युगल में १४, शुक्र युगल में १६, शतार युगल में १८, आनत युुगल में २०, आरण युगल में २२ सागर है। आगे नव ग्रैवेयक तक १-१ सागर बढ़ते हुए अंतिम ग्रैवेयक में ३१ सागर, नव अनुदिश में ३२ सागर और पंचअनुत्तर में ३३ सागर प्रमाण है। विक्रिया और अवधिज्ञान-प्रथम स्वर्ग के देव ऊपर में अपने विमान के ध्वजदंड तक एवं नीचे प्रथम पृथ्वी तक अवधिज्ञान से जान लेते हैं। आगे बढ़ते-बढ़ते सर्वार्थसिद्धि के देव लोकनाड़ी तक जान लेते हैं। इन देवों को जहाँ तक अवधिज्ञान है, वहीं तक विक्रिया करने की शक्ति है। सोलह स्वर्ग तक के देव विक्रिया से यत्र-तत्र आते जाते हैं। आगे के देव जाने की शक्ति रखते हैं किन्तु जाते नहीं हैं।
प्रवीचार सुख
प्रवीचार का नाम कामसेवन है। सौधर्म युगल में काय प्रवीचार, आगे दो स्वर्ग में स्पर्श प्रवीचार, आगे चार स्वर्ग में रूप प्रवीचार, आगे चार स्वर्ग में शब्द प्रवीचार और आगे आनत आदि चार में मन: प्रवीचार है। इन स्वर्गों के आगे नवग्रैवेयक आदि में देवांगना भी नहीं है और उनके भोगों की इच्छा भी नहीं है।
देवियों के उत्पत्ति स्थान
सौधर्म-ईशान स्वर्ग तक ही देवियों की उत्पत्ति होती है, आगे नहीं। आगे के देव अपनी-अपनी देवियों की उत्पत्ति को अवधिज्ञान से जानकर अपने-अपने स्थान पर ले जाते हैं। विरह काल-सब इन्द्र, उनकी महादेवियाँ, लोकपाल और प्रतीन्द्र, इनका उत्कृष्ट विरहकाल छह मास है। अन्य सभी का यंत्र में देखिए।
देवों का आहार काल
जो देव जितने सागर तक जीवित रहते हैं, उतने ही हजार वर्षों में मानसिक आहार ग्रहण करते हैं। पल्य प्रमाण आयु वाले पाँच दिन में आहार ग्रहण करते हैं। श्वासोच्छ्वास ग्रहणकाल-सौधर्म युगल में आयु दो सागर की है अत: वहाँ उच्छ्वास का अन्तराल दो पक्ष का है, ऐसे ही जितने सागर की आयु है, उतने पक्ष बीतने पर श्वासोच्छ्वास ग्रहण करते हैं। लौकांतिकदेव-ब्रह्म स्वर्ग के अग्र भाग में इनके निवास होने से ये लौकान्तिक कहलाते हैं अथवा ये लोक-संसार का अन्त करने वाले एक भवावतारी हैं इसलिए लौकान्तिक कहलाते हैं। इनके सारस्वत, आदित्य, वन्हि, अरुण, गर्दतोय, तुषित, अव्याबाध और अरिष्ट ऐसे मुख्य आठ भेद हैं। इनके शरीर की ऊँचाई पाँच हाथ, आयु आठ सागर की और लेश्या शुक्ला होती है। ये भगवान के तपकल्याणक में वैराग्य की प्रशंसा करने के लिए भक्तिवश आते हैं, अन्य कल्याणकों में नहीं आते हैं, ये बालब्रह्मचारी हैं तथा देवर्षि कहलाते हैं। एक भवावतारी देव-सौधर्म इन्द्र आदि दक्षिण इन्द्र, शची इन्द्राणी, दक्षिण इन्द्रों के चारों लोकपाल, लौकान्तिक देव और सर्वार्थसिद्धि के देव, ये सब नियम से मनुष्य का एक भव प्राप्त कर तपश्चर्या के बल से कर्मों का नाशकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।
देवों का जन्म
पुण्य के उदय से देवगति में उपपाद शय्या से जन्म होता है। जन्म लेते ही आनन्द वादित्र बजने लगते हैं। अन्तर्मुहूर्त में ही देव अपनी छहों पर्याप्तियों को पूर्ण कर नवयौवन सहित हो जाते हैं और अवधिज्ञान से सब जान लेते हैं, अनन्तर सरोवर में स्नान करके वस्त्रालंकार से भूषित होकर जिनमंदिर में जाकर भगवान की पूजा करते हैं। जो देव मिथ्यादृष्टि हैं, वे अन्य देवों की प्रेरणा से जिनदेव को कुल देवता मानकर पूजन करते हैं। सोलह स्वर्ग तक के देवगण तीर्थंकरों के कल्याणक आदि महोत्सव में आते हैं किन्तु आगे के अहमिन्द्र देव वहीं पर मस्तक झुकाकर नमस्कार करते हैं।
Monday, 24 March 2014
बारह देवलोको में कितने जिनमंदिर एवं जिनप्रतिमाएँ हैं
देवलोक जिनमंदिर जिन प्रतिमा
पहला देवलोक बत्तीस लाख सत्तावन करोड सात लाख
दूसरा देवलोक अट्ठावीस लाख पचास करोड चालीस लाख
तीसरा देवलोक बारह लाख इक्किस करोड साठ लाख
चौथा देवलोक आठ लाख चौदह करोड चालीस लाख
पांचवां देवलोक चार लाख सात करोड बीस लाख
छट्ठा देवलोक पचास हजार निब्बे लाख
सातवां देवलोक चालीस हजार बहत्तर लाख
आठवां देवलोक छह हजार एक लाख साठ हजार
नौवां-दसवां देवलोक चार सौ बहत्तर हजार
ग्यारहवां-बारहवां देवलोक तीन सौ चौपन हजार
मनुष्य की अवगाहना कितनी होती है ?
E पांच भरत एवं पांच ऐरावत कर्मभूमियों में अवसर्पिणी काल में उत्कृष्ट अवगाहना ।
1. पहले आरे में - 3 गाऊ
2. दूसरे आरे में - 2 गाऊ
3. तीसरे आरे में - 1 गाऊ
4. चौथे आरे में - 500 धनुष्य
5. पांचवें आरे में - 7 हाथ
6. छट्ठे आरे में - 2 हाथ
E पांच भरत एवं पांच ऐरावत कर्मभूमियों में उत्सर्पिणी काल में उत्कृष्ट अवगाहना ।
1. पहले आरे में - 2 हाथ
2. दूसरे आरे में - 7 हाथ
3. तीसरे आरे में - 500 धनुष्य
4. चौथे आरे में - 1 गाऊ
5. पांचवें आरे में - 2 गाऊ
6. छट्ठे आरे में - 3 गाऊ
E पांच महाविदेह क्षेत्र के मनुष्यों की उत्कृष्ट अवगाहना 500 धनुष्य प्रमाण की होती है ।
E पांच देवकुरु एवं पांच उत्तरकुरु के मनुष्यों की उत्कृष्ट अवगाहना तीन गाऊ की होती है ।
E पांच हरिवर्ष एवं पांच रम्यक् के मनुष्यों की उत्कृष्ट अवगाहना दो गाऊ की होती है ।
E पांच हिमवन्त एवं पांच हिरण्यवंत के मनुष्यों की उत्कृष्ट अवगाहना एक गाऊ की होती है ।
E छप्पन अन्तर्द्वीप के मनुष्यों की उत्कृष्ट अवगाहना 800 धनुष्य की होती है ।
ये सारी अवगाहना गर्भज पर्याप्ता मनुष्यों की कही गयी है ।
E गर्भज अपर्याप्ता मनुष्यों की, संमूर्च्छिम मनुष्यो की अवगाहना अंगुल के असंख्यातवें भाग जितनी होती है ।
मनुष्यों के मुख्य तीन भेद होते है
तीन भेदः- 1.कर्मभूमिज 2.अकर्मभूमिज 3.अन्तर्द्वीपज ।
कर्मभूमि किसे कहते है
जिस भूमि में असि-मसि और कृषि का कार्य होता है, उसे कर्म भूमि कहते है ।
1. असि – अस्त्र, शस्त्रादि का कार्य ।
2. मसि – पठन, लेखन का कार्य ।
3. कृषि – खेती, व्यापार का कार्य ।
अकर्मभूमि किसे कहते है ?
जिस भूमि में असि-मसि-कृषि का कार्य नहीं होता है, उसे अकर्मभूमि कहते है ।
अन्तर्द्वीप कहते है जिसके चारो तरफ जल हो, उसे अन्तर्द्वीप कहते है ।
कर्मभूमियों के पन्द्रह भेदः- पांच भरत, पांच महाविदेह, पांच ऐरावत ।
अकर्मभूमियों तीस भेदः- पांच हिमवन्त, पांच हिरण्यवंत, पांच हरिवर्ष, पांच रम्यक्, पांच देवकुरु, पांच उत्तरकुरु ।
अन्तर्द्वीप छप्पन । है
छप्पन अन्तर्द्वीप कहाँ पर है ?
भरत क्षेत्र की उत्तर दिशा में हिमवन्त नामक पर्वत है और ऐरावत क्षेत्र की उत्तर दिशा में शिखरी नामक पर्वत है । दोनों पर्वत पूर्व एवं पश्चिम दिशा में लवण समुद्र तक फैले हुए हैं । दोनों पूर्व एवं दोनो पश्चिम दिशाओं (प्रत्येक दिशा) में दो-दो दंष्ट्राकार भूमियाँ है । इस प्रकार कुल आठ दंष्ट्राकार भूमियाँ हुई । प्रत्येक दंष्ट्रा में सात-सात अन्तर्द्वीप स्थित हैं । इस प्रकार कुल छप्पन अन्तर्द्वीप हुए । भरत क्षेत्र की उत्तर दिशा में जो अट्ठावीस अन्तर्द्वीप हैं, उसी नाम के अट्ठावीस अन्तर्द्वीप ऐरावत क्षेत्र की उत्तर दिशा में स्थित हैं ।
जम्बुद्वीप में स्थित 269 शाश्वत पर्वत
1. जम्बुद्वीप में स्थित 269 शाश्वत पर्वत इस प्रकार है ।
वर्षधर पर्वत - 7
वृत्त वैताढ्य पर्वत - 4
दीर्घ वैताढ्य पर्वत - 34
वक्षस्कार पर्वत - 16
यमक पर्वत - 2
चित्र-विचित्र पर्वत - 2
कंचन पर्वत - 200
गजदन्त पर्वत - 4
कुल शाश्वत पर्वत - 269
2. जम्बुद्वीप में 14,56,000 शाश्वत नदियाँ हैं
3. जम्बुद्वीप में 84 शाश्वत महानदियाँ है
4. जम्बुद्वीप में 162 नदी-समुद्र संगम वाले शाश्वत तीर्थ हैं
5. जम्बुद्वीप में 34 विजय हैं
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